अच्लेश्वर मन्दिर एवँ अच्ल साहिब गुरद्वारा, बटाला, पँजाब भाग :१७१ , पँ० ज्ञानेश्वर हँस “देव” की क़लम से

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भारत के धार्मिक स्थल: अच्लेश्वर मन्दिर एवँ अच्ल साहिब गुरद्वारा, बटाला, पँजाब भाग :१७१

आपने पिछले भाग में पढ़ा भारत के धार्मिक स्थल : पँच मन्दिर, कपूरथला, पँजाब! यदि आपसे उक्त लेख छूट गया अथवा रह गया हो और आपमें पढ़ने की जिज्ञासा हो तो आप प्रजा टूडे की वेब साईट पर जाकर, धर्म- साहित्य पृष्ठ पर जाकर पढ़ सकते हैं! आज हम आपके लिए लाए हैं : भारत के धार्मिक स्थल: भाग :१७१

तिरँगे का रँग यहाँ शिवलिँग में देखने को मिलता है :

हिन्दुओं और सिक्खों की एकता का प्रबल प्रतीक है बटाला का श्री अच्लेश्वर धाम व गुरुद्वारा श्री अच्ल साहिब! शिवशँकर के पुत्र कार्तिकेय से जुड़ी है यह कथा:बटाला में है श्री अच्लेश्वर धाम मन्दिर और अच्ल साहिब गुरुद्वारा! यहाँ पर सभी धर्मों के लोग माथा टेकने के लिए आते हैं! दोनों ही धार्मिक स्थानों पर श्रद्धालु माथा टेकते हैं साथ ही एक ही सरोवर में स्नान करते हैं!

बटाला में श्री अच्लेश्वर धाम में उमड़ी श्रद्धालुओं की भीड़!हिन्दू-सिख एकता का प्रतीक श्री अच्लेश्वर धाम मन्दिर और अच्ल साहिब गुरुद्वारा, जहाँ पर सभी धर्मों के लोग माथा टेकने के लिए आते हैं! दोनों ही धार्मिक स्थानों पर श्रद्धालु माथा तो टेकते हैं साथ ही एक ही सरोवर में जात-पात मन्दिर परिसर के बाहर छोड़ कर एक साथ स्नान करते हैं! यह परम्परा आज से नहीं बल्कि सदियों से चल्ती चली आ रही है!

श्री अच्लेश्वर मन्दिर में भगवान शिवशँकर समस्त देवी-देवताओं के साथ पहुंचे; तो वहीं पहले गुरु नानक देव जी ने भी गुरुद्वारा श्री अच्ल साहिब पहुँच कर सिखों के साथ मन्त्रणा कर उन्हें सच्चाई के रास्ते चलने के लिए उपदेश दिया! देश भर से आने वाले श्रद्धालु मन्दिर और गुरुद्वारा साहिब में माथा टेकते हैं! श्रद्धालुजन चाहे किसी भी धर्म के हों वह दोनों ही धार्मिक स्थानों पर पूरी श्रद्धा के साथ अपना शीश निवाते हैं! जबकि माथा टेकने से पहले एक ही सरोवर में स्नान कर आपसी भाईचारे की मिसाल पैदा करते हैं! शिवलिँग अलग अलग तीन रँगों में देख सकते हैं!

गणेश मूशक, कार्तिकेय मोर पर स्वार हो कर तीनों लोकों की यात्रा पर निकल पड़े:-

श्री अच्लेश्वर धाम मन्दिर भगवान भोलेनाथ के औरस पुत्र श्री कार्तिकेय जी का स्थान है और यहाँ पर प्रति वर्ष कार्तिक माह की नौवीं तिथि को लगने वाले भारत के प्रमुख मेले में भारी सँख्या में देश-विदेश से श्रद्धालु पहुँचते हैं और अपनी मनोकामना के लिए पूजा करते हैं!मान्यतानुसार जब भगवान शिवशँकर भोलेनाथ और माता पावर्ती ने दोनों पुत्रों भगवान श्री कार्तीकेय और श्री गणेश में से एक को अपना उत्तराधिकारी बनाने के लिए बुलाया तो भगवान भोलेनाथ ने कहा कि जो भी तीन लोकों का चक्कर काट कर सब से पहले पहुँचेगा वही हमारा उत्तराधिकारी होगी! जिसके बाद श्री गणेश मूशक पर स्वार हो कर तो भगवान श्री कार्तिकेय मोर पर स्वार हो कर तीनों लोकों की यात्रा पर निकल पड़े!

जब शिवशँकर भोलेनाथ को पता चला तो वह समस्त देवी देवताओं के साथ आए और कार्तिकेय को मनाने लगे! लेकिन कार्तिकेय नहीं माने और इसी जगह अच्ल होने की बात कही! जिसके बाद भगवान भोलेनाथ ने कार्तिकेय को वर दिया कि इस जगह हर साल नवमीं-दसवीं की रात को समस्त देवी-देवता आया करेंगे और यहां पर बने सरोवर में स्नान करने वाले भक्तों को अपना आशीर्वाद दिया करेंगे! तभी से ही इस जगह का नाम श्री अच्लेश्वर धाम मन्दिर पड़ा है!

श्री गुरु नानक देव जी शिवरात्रि को आए थे यहाँ :

मन्दिर के सामने ही बने गुरुद्वारा श्री अच्ल साहिब में पहले सिख गुरु नानक देव जी शिवरात्रि के दिन यहाँ आए थे! इस स्थान पर सिद्ध योगी रहा करते थे और शिवरात्रि को यहाँ पर भारी तादाद में लोग पहुंचते थे! जब शिवरात्रि के दिन श्री गुरु नानक देव जी पहुँचे तो गुरु जी के दर्शन के लिए लोग दौड़े! इस दौरान वहाँ पर सिद्धों को ईष्या हो गई और सिद्ध अपने गुरु भगर नाथ के साथ श्री गुरु नानक देव जी से विचार करने पहुंच गए!

गुरु जी ने भगर नाथ से कहा कि आप ने अपने सँसार को त्याग दिया है, अपना गुज़ारा करने के लिए लोगों से भीख माँग कर करते हो, तो फिर आप श्रेष्ठ कैसे हो! गुरु जी की बात सुन कर भगरनाथ ने चमत्कार दिखाने की कोशिश की लेकिन वह अपनी शक्तियों का इस्तेमाल नहीं कर सका! भगरनाथ गुरु जी के पैरों में गिर गया, जिसके बाद गुरु जी ने वहां पर आए लोगों का परमात्मा का नाम जपने के लिए कहा!

इस दौरान गुरुजी ने इस स्थान पर एक बेरी भी लगाई थी और कहा था कि यह बेरी १२ महीने फल देगी! जो आज भी गुरुद्वारा साहिब में मौजूद है! इसी जगह पर सिखों के छठे गुरू श्री हरगोबिंद साहिब भी अपने सबसे बड़े बेटे बाबा गुरदित्ता की शादी में बटाला आए थे और इस जगह पर आठ कोनों वाला कुआं भी खुदवाया था जो आज भी गुरुद्वारा साहिब के सामने है!

कैसे पहुंचा जाये :

आपको इस मंदिर के निकटतम रेलवे स्टेशन आबू रेलवे स्टेशन पर उतरना होगा, फिर आप शहर और होटलों के बीचों-बीच पहुँचने के लिए बस, टैक्सी, ऑटो आदि ले सकते हैं, जहाँ से आप आगे टैक्सी, बस या कार ले सकते हैं। यह मन्दिर! कभी-कभी ऐसे वाहन होते हैं जो आपको खड़ी पहाड़ पर चढ़ने में मदद करते हैं!अचलेश्वर मन्दिर एवँ अच्ल गुरुद्वारा साहिब के बारे में रोचक तथ्य और सामान्य ज्ञान शब्दों की व्युत्पत्ति अचल के लिए “अचल” से, भगवान के लिए “ईश्वर” और भगवान शिव के लिए एक और नाम महादेव से उत्पन्न होती है!

यहाँ का शिवलिंग पूरे दिन के दौरान तीन अलग-अलग रँगों का होता है, केसरिया, सफेद और लाल! इस प्रतिमा के सही भूमिगत विस्तार की गणना अभी बाकी है! लोग कहते हैं कि एक खास तरह की इच्छा यहां बहुत बार दी जाती है, मनोवृत्ति के अनुसार ही अविवाहित पुरुषों तथा स्त्रियों के लिए एक आत्म-साथी जीवन साथी यहाँ से अवश्य ही मिल जाता है!

वायु मार्ग से कैसे पहुँचें मन्दिर:

राजा साँसी हवाईअड्डे के लिए उड़ान भर सकते हैं। बटाला ३४ किलोमीटर दूर राजा सांसी हवाई अड्डा (एटीक्यू), अमृतसर,पँजाब बटाला!

रेल मार्ग से कैसे पहुँचें मन्दिर :

देश के अन्य प्रमुख शहरों से बटाला के लिए नियमित ट्रेनें हैं। रेलवे स्टेशन (ओं): बटाला जंक्शन (बीएटी)

सड़क मार्ग से कैसे पहुँचें मन्दिर :

बटाला नियमित बसों के माध्यम से देश के अन्य प्रमुख शहरों से अच्छी तरह जुड़ा हुआ है। बस स्टेशन: बटाला (गुरदासपुर) है! दिल्ली से अपनी कार अथवा बस से आप ७ घण्टे ४१ मिन्ट्स में राष्ट्रीय राजमार्ग NH-४४ से आसानी से पहुँच जाओगे!

अच्लेश्वर एवँ अच्ल की जय हो! जयघोष हो!!

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