बड़ा श्री गणेश मन्दिर लौहटिया रोड़ जैतपुरा वाराणसी, उत्तरप्रदेश भाग : ३६८,पण्डित ज्ञानेश्वर हँस “देव” की क़लम से

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बड़ा श्री गणेश मन्दिर, लौहटिया रोड़, जैतपुरा, वाराणसी, उत्तरप्रदेश भाग : ३६८

आपने पिछले भाग में पढ़ा होगा भारत के धार्मिकस्थल : सँकटमोचन हनुमान मन्दिर, पदमपुरी, जवाहर नगर कॉलोनी, बजेलपिर, वाराणसी, उत्तरप्रदेश। यदि आपसे उक्त लेख छूट गया या रह गया हो तो आप कृपया करके प्रजा टूडे की वेब साईट पर जाकर www.prajatoday.com धर्मसाहित्य पृष्ठ पढ़ सकते हैं! आज हम प्रजाटूडे समाचारपत्र के अति-विशिष्ट पाठकों के लिए लाए हैं:

बड़ा श्री गणेश मन्दिर, लौहटिया रोड़, जैतपुरा, वाराणसी, उत्तरप्रदेश भाग : ३६८

४० खम्भों वाला श्री गणेश त्रिनेत्र मन्दिर काशी नगरी में स्थापित भगवान श्री गणेश की त्रिनेत्र प्रतिमा का रहस्य जा3नें। भगवान श्री गणेश का स्वयँभू: त्रिनेत्र प्रतिमा वाला यह मन्दिर बनारस के लोहटिया नामक स्थान पर स्थित है। इन्हें बड़ा गणेश भी कहते हैं।

सङ्कट-चौथ या गणेश चतुर्थी के दिन भगवान श्रीगणेश के दर्शन का विशेष लाभ होता है। उत्तर प्रदेश की काशी नगरी, जिसे हम भोलेनाथ की नगरी के प्राचीन नाम से जाना जाता है। काशी में भगवान शिवशँकर के विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग की महिमा कौन नहीं जानता परन्तु काशी में ही माँ पार्वती और शिव शँकर जी के पुत्र भगवान श्री गणेश अपने विशेष रूप में स्थापित हैं। काशी में स्थापित स्वयँभू: भगवान श्री गणेश जी की यह मूर्ति त्रिनेत्र स्वरूप की है। मान्यता है कि गणेश चतुर्थी के दिन विघ्नहर्ता श्री गणेश भगवान जी के इस त्रिनेत्र रूप की उपासना से भक्तों के जीवन की सभी विघ्न और बाधाएँ दूर हो जाती हैं तथा भक्त की मनोकामनाओं की आपूर्ति होती हैं।

लोहटिया स्थित 40 खम्भों वाला मन्दिर:

भगवान श्रीगणेश का स्वयँभू: त्रिनेत्र प्रतिमा वाला यह मन्दिर बनारस के लोहटिया नामक स्थान पर स्थित है। इन्हें बड़ा गणेश भी कहते हैं। मान्यता है कि जब काशी में गङ्गा माँ के साथ मन्दाकिनी नदी भी बहती थी, उस समय भगवान श्री गणेश की यह प्रतिमा मिली थी। माना जाता है कि उस दिन माघ मास की संकष्टी चतुर्थी का दिन था, तब से इस दिन यहाँ मेले का आयोजन होता है। श्री गणेश जी का यह मन्दिर ४० खम्भों की विशेष शैली में बना है, जो यहां आने वाले सभी भक्तों को आश्चर्य में डाल देता है। मन्दिर की प्राचीनता के विषय में स्पष्ट रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता है।

बड़ा गणेश मन्दिर की महिमा :

लोहटिया स्थित भगवान गणेश के मन्दिर में दूर-दूर से भक्त आते हैं। यहां पर भगवान गणेश अपनी दोनों पत्नियां ऋद्धि- सिद्धि और संतानों शुभ-लाभ के साथ विराजमान हैं। मान्यता है कि गणेश जी के इस रूप की उपासना करने से व्यक्ति को ऋद्धि- सिद्धि तथा शुभ-लाभ की प्राप्ति होती है। इस मन्दिर में गणेश जी की बन्द कपाट पूजा का विशेष महत्व है, जिसे देखने की अनुमति किसी को भी नहीं है। यहाँ मन्नत मानने वालों और अपने कष्ट दूर करने की मुराद लेकर आने वाले भक्तों की हमेशा भीड़ लगी रहती है। गणेश चतुर्थी के दिन भगवान श्री गणेश जी के दर्शन का विशेष लाभ होता है।

श्री गणेश चतुर्थी की ४ पौराणिक एवँ प्रचलित कथाएँ : व्रत में सुनने से दूर होंगे सारे संकट, मिलेगी अपार सुख समृद्धि :

‘श्री गणेशाय नम:’ सँकष्टी गणेश चतुर्थी व्रत करने से घर-परिवार में आ रही विपदा दूर होती है, कई दिनों से रुके माँगलिक कार्य सँपन्न होते है तथा भगवान श्री गणेश जी असीम सुखों की प्राप्ति कराते हैं। किसी भी माह की चतुर्थी के दिन भगवान श्री गणेश की पूजा के दौरान संकष्टी गणेश चतुर्थी व्रत की कथा पढ़ना अथवा सुनना सनातनियों के लिए लाभप्रद होता है। इससे सम्बन्धित चार कथाएँ प्रचलित हैं।

श्री गणेश व्रत ४ कथाएँ :

पहली कथा :- पौराणिक एवँ प्रचलित श्री गणेश कथा के अनुसार एक बार देवता कई विपदाओं में घिरे थे। तब वह मदद मांगने भगवान शिव के पास आए। उस समय शिव के साथ कार्तिकेय तथा गणेशजी भी बैठे थे। देवताओं की बात सुनकर शिव जी ने कार्तिकेय व गणेश जी से पूछा कि तुम में से कौन देवताओं के कष्टों का निवारण कर सकता है। तब कार्तिकेय व गणेश जी दोनों ने ही स्वयं को इस कार्य के लिए सक्षम बताया।

इस पर भगवान शिव ने दोनों की परीक्षा लेते हुए कहा कि तुम दोनों में से जो सबसे पहले पृथ्वी की परिक्रमा करके आएगा वही देवताओं की मदद करने जाएगा।

भगवान शिव के मुख से यह वचन सुनते ही कार्तिकेय अपने वाहन मोर पर बैठकर पृथ्वी की परिक्रमा के लिए निकल गए, परंतु गणेश जी सोच में पड़ गए कि वह चूहे के ऊपर चढ़कर सारी पृथ्वी की परिक्रमा करेंगे तो इस कार्य में उन्हें बहुत समय लग जाएगा। तभी उन्हें एक उपाय सूझा। गणेश अपने स्थान से उठें और अपने माता-पिता की सात बार परिक्रमा करके वापस बैठ गए। परिक्रमा करके लौटने पर कार्तिकेय स्वयं को विजेता बताने लगे। तब शिव जी ने श्री गणेश से पृथ्वी की परिक्रमा ना करने का कारण पूछा।

तब गणेश ने कहा – ‘माता-पिता के चरणों में ही समस्त लोक हैं।’ यह सुनकर भगवान शिव ने गणेश जी को देवताओं के संकट दूर करने की आज्ञा दी। इस प्रकार भगवान शिव ने गणेश जी को आशीर्वाद दिया कि चतुर्थी के दिन जो तुम्हारा पूजन करेगा और रात्रि में चंद्रमा को अर्घ्य देगा उसके तीनों ताप यानी दैहिक ताप, दैविक ताप तथा भौतिक ताप दूर होंगे। इस व्रत को करने से व्रतधारी के सभी तरह के दुख दूर होंगे और उसे जीवन के भौतिक सुखों की प्राप्ति होगी। चारों तरफ से मनुष्य की सुख-समृद्धि बढ़ेगी। पुत्र-पौत्रादि, धन-ऐश्वर्य की कमी नहीं रहेगी।

गणेश चतुर्थी व्रत की दूसरी कथा :- एक समय की बात है राजा हरिश्चंद्र के राज्य में एक कुम्हार था। वह मिट्टी के बर्तन बनाता, लेकिन वे कच्चे रह जाते थे। एक पुजारी की सलाह पर उसने इस समस्या को दूर करने के लिए एक छोटे बालक को मिट्टी के बर्तनों के साथ आंवा में डाल दिया।

उस दिन संकष्टी चतुर्थी का दिन था। उस बच्चे की मां अपने बेटे के लिए परेशान थी। उसने गणेशजी से बेटे की कुशलता की प्रार्थना की।

दूसरे दिन जब कुम्हार ने सुबह उठकर देखा तो आंवा में उसके बर्तन तो पक गए थे, लेकिन बच्चे का बाल बांका भी नहीं हुआ था। वह डर गया और राजा के दरबार में जाकर सारी घटना बताई।

इसके बाद राजा ने उस बच्चे और उसकी मां को बुलवाया तो मां ने सभी तरह के विघ्न को दूर करने वाली संकष्टी चतुर्थी का वर्णन किया। इस घटना के बाद से महिलाएं संतान और परिवार के सौभाग्य के लिए संकट चौथ का व्रत करने लगीं।


तीसरी कथा :- एक समय की बात है कि विष्णु भगवान का विवाह लक्ष्‍मीजी के साथ निश्चित हो गया। विवाह की तैयारी होने लगी। सभी देवताओं को निमंत्रण भेजे गए, परंतु गणेश जी को निमंत्रण नहीं दिया, कारण जो भी रहा हो। अब भगवान विष्णु की बारात जाने का समय आ गया। सभी देवता अपनी पत्नियों के साथ विवाह समारोह में आए। उन सबने देखा कि गणेशजी कहीं दिखाई नहीं दे रहे हैं। तब वे आपस में चर्चा करने लगे कि क्या गणेशजी को नहीं न्योता है? या स्वयं गणेश जी ही नहीं आए हैं? सभी को इस बात पर आश्चर्य होने लगा। तभी सबने विचार किया कि विष्णु भगवान से ही इसका कारण पूछा जाए।

विष्णु भगवान से पूछने पर उन्होंने कहा कि हमने गणेश जी के पिता भोलेनाथ महादेव को न्योता भेजा है। यदि गणेशजी अपने पिता के साथ आना चाहते तो आ जाते, अलग से न्योता देने की कोई आवश्यकता भी नहीं थीं। दूसरी बात यह है कि उनको सवा मन मूंग, सवा मन चावल, सवा मन घी और सवा मन लड्डू का भोजन दिनभर में चाहिए। यदि गणेशजी नहीं आएंगे तो कोई बात नहीं। दूसरे के घर जाकर इतना सारा खाना-पीना अच्छा भी नहीं लगता।

इतनी वार्ता कर ही रहे थे कि किसी एक ने सुझाव दिया- यदि गणेश जी आ भी जाएं तो उनको द्वारपाल बनाकर बैठा देंगे कि आप घर की याद रखना। आप तो चूहे पर बैठकर धीरे-धीरे चलोगे तो बारात से बहुत पीछे रह जाओगे। यह सुझाव भी सबको पसंद आ गया, तो विष्णु भगवान ने भी अपनी सहमति दे दी।

होना क्या था कि इतने में गणेश जी वहां आ पहुंचे और उन्हें समझा-बुझाकर घर की रखवाली करने बैठा दिया। बारात चल दी, तब नारद जी ने देखा कि गणेश जी तो दरवाजे पर ही बैठे हुए हैं, तो वे गणेश जी के पास गए और रुकने का कारण पूछा। गणेश जी कहने लगे कि विष्णु भगवान ने मेरा बहुत अपमान किया है। नारद जी ने कहा कि आप अपनी मूषक सेना को आगे भेज दें, तो वह रास्ता खोद देगी जिससे उनके वाहन धरती में धंस जाएंगे, तब आपको सम्मानपूर्वक बुलाना पड़ेगा।

अब तो गणेश जी ने अपनी मूषक सेना जल्दी से आगे भेज दी और सेना ने जमीन पोली कर दी। जब बारात वहां से निकली तो रथों के पहिए धरती में धंस गए। लाख कोशिश करें, परंतु पहिए नहीं निकले। सभी ने अपने-अपने उपाय किए, परंतु पहिए तो नहीं निकले, बल्कि जगह-जगह से टूट गए। किसी की समझ में नहीं आ रहा था कि अब क्या किया जाए।

तब तो नारद जी ने कहा- आप लोगों ने गणेश जी का अपमान करके अच्छा नहीं किया। यदि उन्हें मनाकर लाया जाए तो आपका कार्य सिद्ध हो सकता है और यह संकट टल सकता है। शंकर भगवान ने अपने दूत नंदी को भेजा और वे गणेश जी को लेकर आए। गणेश जी का आदर-सम्मान के साथ पूजन किया, तब कहीं रथ के पहिए निकले। अब रथ के पहिए निकल को गए, परंतु वे टूट-फूट गए, तो उन्हें सुधारे कौन?

पास के खेत में खाती काम कर रहा था, उसे बुलाया गया। खाती अपना कार्य करने के पहले ‘श्री गणेशाय नम:’ कहकर गणेश जी की वंदना मन ही मन करने लगा। देखते ही देखते खाती ने सभी पहियों को ठीक कर दिया।

तब खाती कहने लगा कि हे देवताओं! आपने सर्वप्रथम गणेशजी को नहीं मनाया होगा और न ही उनकी पूजन की होगी इसीलिए तो आपके साथ यह संकट आया है। हम तो मूरख अज्ञानी हैं, फिर भी पहले गणेश जी को पूजते हैं, उनका ध्यान करते हैं। आप लोग तो देवतागण हैं, फिर भी आप गणेश जी को कैसे भूल गए? अब आप लोग भगवान श्री गणेश जी की जय बोलकर जाएं, तो आपके सब काम बन जाएंगे और कोई संकट भी नहीं आएगा। ऐसा कहते हुए बारात वहां से चल दी और विष्णु भगवान का लक्ष्मी जी के साथ विवाह संपन्न कराके सभी सकुशल घर लौट आए।

हे गणेश जी महाराज! आपने विष्णु को जैसो कारज सारियो, ऐसो कारज सबको सिद्ध करजो। बोलो गजानन भगवान की जय।

चौथी कथा : – श्री गणेश चतुर्थी व्रत की पौराणिक कथा के अनुसार एक बार भगवान शिव तथा माता पार्वती नर्मदा नदी के किनारे बैठे थे। वहां माता पार्वती ने भगवान शिव से समय व्यतीत करने के लिए चौपड़ खेलने को कहा। शिव चौपड़ खेलने के लिए तैयार हो गए, परंतु इस खेल में हार-जीत का फैसला कौन करेगा, यह प्रश्न उनके समक्ष उठा तो भगवान शिव ने कुछ तिनके एकत्रित कर उसका एक पुतला बनाकर उसकी प्राण-प्रतिष्ठा कर दी और पुतले से कहा- ‘बेटा, हम चौपड़ खेलना चाहते हैं, परंतु हमारी हार-जीत का फैसला करने वाला कोई नहीं है इसीलिए तुम बताना कि हम दोनों में से कौन हारा और कौन जीता?’

उसके बाद भगवान शिव और माता पार्वती का चौपड़ खेल शुरू हो गया। यह खेल ३ बार खेला गया और संयोग से तीनों बार माता पार्वती ही जीत गईं। खेल समाप्त होने के बाद बालक से हार-जीत का फैसला करने के लिए कहा गया, तो उस बालक ने महादेव को विजयी बताया।

यह सुनकर माता पार्वती क्रोधित हो गईं और क्रोध में उन्होंने बालक को लंगड़ा होने, कीचड़ में पड़े रहने का श्राप दे दिया। बालक ने माता पार्वती से माफी मांगी और कहा कि यह मुझसे अज्ञानतावश ऐसा हुआ है, मैंने किसी द्वेष भाव में ऐसा नहीं किया।

बालक द्वारा क्षमा मांगने पर माता ने कहा- ‘यहां गणेश पूजन के लिए नागकन्याएं आएंगी, उनके कहे अनुसार तुम गणेश व्रत करो, ऐसा करने से तुम मुझे प्राप्त करोगे।’ यह कहकर माता पार्वती शिव के साथ कैलाश पर्वत पर चली गईं।

एक वर्ष के बाद उस स्थान पर नागकन्याएं आईं, तब नागकन्याओं से श्री गणेश के व्रत की विधि मालूम करने पर उस बालक ने २१ दिन लगातार गणेश जी का व्रत किया। उसकी श्रद्धा से गणेश जी प्रसन्न हुए। उन्होंने बालक को मनोवांछित फल मांगने के लिए कहा। उस पर उस बालक ने कहा- ‘हे विनायक! मुझमें इतनी शक्ति दीजिए कि मैं अपने पैरों से चलकर अपने माता-पिता के साथ कैलाश पर्वत पर पहुंच सकूं और वे यह देख प्रसन्न हों।’

तब बालक को वरदान देकर श्री गणेश अंतर्ध्यान हो गए। इसके बाद वह बालक कैलाश पर्वत पर पहुंच गया और कैलाश पर्वत पर पहुंचने की अपनी कथा उसने भगवान शिव को सुनाई। चौपड़ वाले दिन से माता पार्वती शिवजी से विमुख हो गई थीं अत: देवी के रुष्ट होने पर भगवान शिव ने भी बालक के बताए अनुसार २१ दिनों तक श्री गणेश का व्रत किया। इस व्रत के प्रभाव से माता पार्वती के मन से भगवान शिव के लिए जो नाराजगी थी, वह समाप्त हो गई।

तब यह व्रत विधि भगवान शँकर ने माता पार्वती को बताई। यह सुनकर माता पार्वती के मन में भी अपने पुत्र कार्तिकेय से मिलने की इच्छा जागृत हुई। तब माता पार्वती ने भी २१ दिन तक श्री गणेश का व्रत किया तथा दूर्वा, फूल और लड्डूओं से गणेशजी का पूजन-अर्चन किया। व्रत के २१वें दिन कार्तिकेय स्वयं माता पार्वतीजी से आ मिले। उस दिन से श्री गणेश चतुर्थी का यह व्रत समस्त मनोकामनाओं की पूर्ति करने वाला व्रत माना जाता है। इस व्रत को करने से मनुष्‍य के सारे कष्ट दूर होकर मनुष्य को समस्त सुख-सुविधाएं प्राप्त होती हैं।

पता :

बड़ा श्री गणेश मन्दिर, लोहटिया रोड़, मैदागिन, लोहटिया, कबीर नगर चौराहा, जैतपुरा, वाराणसी, उत्तरप्रदेश पिनकोड : 221001 भारत।

हवाई मार्ग से कैसे पहुँचें:

हवाई मार्ग द्वारा बड़ा श्री गणेश मन्दिर पहुँचने के लिए निकटतम हवाई अड्डा बनारस का लाल बहादुर शास्त्री एयरपोर्ट है। यहाँ के एयरपोर्ट से मन्दिर लगभग २४.४ किलोमीटर दूर है। टैक्सी या कैब से मन्दिर ५० मिनट्स में पहुँचा जा सकता है सँकटमोचन श्री हनुमान मन्दिर।

लोहपथगामिनी मार्ग से कैसे पहुँचें :

रेल मार्ग से सँकटमोचन हनुमान मन्दिर, पहुँचने के लिए निकटतम रेलवे स्टेशन वाराणसी जँक्शन रेलवे स्टेशन से ६.४ किलोमीटर की दूरी से वाया धौलपुर दुर्गाकुंड रोड़ होते हुएपहुँच जाओगे सँकटमोचन श्री हनुमान मन्दिर।

सड़क मार्ग से कैसे पहुँचें :

आप अपनी कार बाईक या बस से अंतर्राज्यीय बस स्थानक दिल्ली से आते हैं तो आप ८४९.८ किलोमीटर की यात्रा करके वाया आगरा-लखनऊ एक्सप्रेस वे राष्ट्रीय राजमार्ग से १२ घण्टे ४६ मिनट्स में पहुँच जाओगे।

श्री गणपति गणेश जी की जय हो। जयघोष हो।।

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