जगन्नाथपुरी मन्दिर, ओडिशा! भाग : १५९,पँ० ज्ञानेश्वर हँस “देव” की क़लम से

Share News

भारत के धार्मिक स्थल : जगन्नाथपुरी मन्दिर, ओडिशा! भाग : १५९

आपने पिछले भाग में पढ़ा भारत के धार्मिक स्थल : कोणार्क सूर्य मन्दिर, ओडिशा! यदि आपसे उक्त लेख छूट गया अथवा रह गया हो तो आप प्रजा टुडे की वेब साईट पर जाकर धर्म साहित्य पृष्ठ पर जाकर पढ़ सकते हैं!

आज हम आपके लिए लाएँ हैं भारत के धार्मिक स्थल : जगन्नाथपुरी मन्दिर, ओडिशा! भाग : १५९

भगवान श्री कृष्ण जी का जगगन्नाथ मन्दिर पुरी शहर में स्थित है! इस शहर का नाम जगन्नाथ पुरी से निकल कर पुरी बना है! यहाँ वार्षिक रूप से रथ यात्रा उत्सव भी आयोजित किया जाता है! पुरी की गिनती हिन्दू धर्म के चार धाम में होती है!

जगन्नाथ (दायें) बलभद्र (बायें) तथा सुभद्रा (मध्य में) एक छोटे आकार का जगन्नाथ, बलभद्र तथा देवी सुभद्रा के साथ भुवनेश्वर में रथ यात्रा महोत्सव युनाटिड स्टेट्स ऑफ अमेरिका के न्यूयॉर्क शहर में इस्कॉन द्वारा आयोजित रथ यात्रा उत्सव जगन्नाथ पुरी की तरह ही मनाया जाता है!

जगन्नाथ, सुभद्रा, बलभद्र एवं सुदर्शन चक्र भगवान रत्न जटित सिंहासन के ऊपर, ओड़िशा राज्य के नयागढ़ शहर मे जो कि पुरी शहर से ४ घण्टे कि दूरी पर है! जगन्नाथ से जुड़ी दो रोचक कहानियाँ हैं! पहली कहानी में श्री कृष्ण अपने परम भक्त राज इन्द्रद्युम्न के सपने में आए और उन्हे आदेश दिया कि पुरी के दरिया किनारे पर पडे एक पेड़ के तने में से वे श्री कृष्ण का विग्रह बनाएँ! राजा ने इस कार्य के लिए बढ़ई की तलाश शुरु की! कुछ दिनो बाद एक रहस्यमय बूढ़ा ब्राह्मण आया और उसने कहा कि प्रभु का विग्रह बनाने की जिम्मेदारी वो लेना चाहता है!

लेकिन उसकी एक शर्त थी – कि वो विग्रह बन्द कमरे में बनायेगा और उसका काम खत्म होने तक कोई भी कमरे का द्वार नहीं खोलेगा, नहीं तो वो काम अधूरा छोड़ कर चला जायेगा! ६-७ दिन बाद काम करने की आवाज़ आनी बन्द हो गई तो राजा से रहा न गया और ये सोचते हुए कि ब्राह्मण को कुछ हो गया होगा, उसने द्वार खोल दिया! पर अन्दर तो सिर्फ़ भगवान का अधूरा विग्रह ही मिला और बूढ़ा ब्राह्मण लुप्त हो चुका था! तब राजा को आभास हुआ कि ब्राह्मण और कोई नहीं बल्कि देवों का वास्तुकार विश्वकर्मा ही था! राजा को आभास हो गया क्योंकि विग्रह के हाथ और पैर नहीं थे और वह पछतावा करने लगा कि उसने द्वार क्यों खोला! पर तभी वहाँ पर ब्राह्मण के रूप में नारद मुनि पधारे और उन्होंने राजा से कहा कि भगवान इसी स्वरूप में अवतरित होना चाहते थे और दरवाज़ा खोलने का विचार स्वयँ श्री कृष्ण ने राजा के दिमाग में डाला था! इसलिए उसे आघात चिन्तन करने का कोइ कारण नहीं है और वह निश्चिन्त हो जाए!

दूसरी कहानी महाभारत में से है जो बताती है कि जगन्नाथ के रूप का रहस्य क्या है! माता यशोदा, सुभद्रा और देवकी जी, वृन्दावन से द्वारका आये हुए थे! रानियों ने उनसे निवेदन किया कि वे उन्हे श्री कृष्ण की बाल लीलाओं के बारे में बताएँ! सुभद्रा जी द्वार पर पहरा दे रही थी, कि अगर कृष्ण और बलराम आ जाएंगे तो वो सबको आगाह कर देगी! लेकिन वो भी कृष्ण की बाल लीलाओं को सुनने में इतनी मग्न हो गई, कि उन्हे कृष्ण बलराम के आने का विचार ही नहीं रहा! दोनो भाइयों ने जो सुना, उस से उन्हे इतना आनन्द मिला की उनके बाल सीधे खडे हो गए, उनकी आँखें बड़ी हो गई, उनके होठों पर बहुत बड़ा स्मित छा गया और उनके शरीर भक्ति के प्रेमभाव वाले वातावरण में पिघलने लगे! सुभद्रा बहुत ज्यादा भाव विभोर हो गई थी इस लिए उनका शरीर सबसे ज़्यादा पिघल गया और इसी लिए उनका कद जगन्नाथ के मन्दिर में सबसे छोटा है! तभी वहाँ नारद मुनि पधारे और उनके आने से सब लोग वापस आवेश में आएँ! श्री कृष्ण का ये रूप देख कर नारद बोले कि “हे प्रभु, आप कितने सुन्दर लग रहे हो! आप इस रूप में अवतार कब लेंगे?” तब श्री कृष्ण ने कहा कि कलियुग में वो ऐसा अवतार लेंगे और उन्होंने कलियुग में राजा इन्द्रद्युम्न को निमित बनाकर जगन्नाथ अवतार लिया!

भारत वर्ष की ओडिशा की पूरी के जगन्नाथ मन्दिर का नाम तो विश्व प्रसिद्ध है! इसे हिन्दुओं के चार धामों में से एक माना जाता है! ओडिशा के तटवर्ती शहर पुरी में स्थित यह विश्व प्रसिद्ध मन्दिर भगवान श्री विष्णु के अवतार भगवान श्री कृष्ण चन्द्र जी को समर्पित है! यहाँ प्रति वर्ष लाखों श्रद्धालु पूरी दुनियाँ जहान से भगवान श्री जगन्नाथ जी के दर्शन के लिए आते हैं! ८०० वर्ष से भी ज्यादा पुराने इस पवित्र मन्दिर से जुड़ी ऐसी कई रहस्यमय और चमत्कारी बातें हैं, जो विस्मयकारी और आश्चर्यचकित कर देती हैं!

जगन्नाथ पुरी मन्दिर के बारे में जानते हैं: –

१.जगन्नाथ पुरी मंदिर का ध्वज हवा के विपरीत उड़ता है!
२.जगन्नाथ पुरी मन्दिर का सुदर्शन चक्र का रहस्य!
३.समुद्र की आवाज़ मन्दिर में नहीं सुनेगी!
४.कोई भी पक्षी या जहाज़ मन्दिर के ऊपर से नहीँ जाता
५.जगन्नाथ पुरी मन्दिर का महाप्रसाद

१.जगन्नाथ पुरी मन्दिर का ध्वज हवा के विपरीत उड़ता है :

जगन्नाथ मन्दिर का सबसे बड़ा रहस्य ये है कि इसके शिखर पर स्थित झंडा हमेशा हवा की विपरीत दिशा में लहराता है! वैसे आमतौर पर दिन के समय हवा समुद्र से धरती की तरफ चलती है और शाम को धरती से समुद्र की तरफ, लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी कि यहां यह प्रक्रिया उल्टी है! अब ऐसा क्यों है, ये रहस्य आज तक कोई नहीं जान पाया है!

२.जगन्नाथ पुरी मन्दिर का सुदर्शन चक्र का रहस्य :

जगन्नाथ मन्दिर के शिखर पर एक सुदर्शन चक्र लगा है, जिसके बारे में कहा जाता है कि उसे किसी भी दिशा से खड़े होकर देखें, पर ऐसा लगता है कि चक्र का मुंह आपकी ही तरफ है! इसी तरह एक और रहस्य ये है कि मन्दिर के शिखर की छाया हमेशा अदृश्य ही रहती है। उसे जमीन पर कभी कोई नहीं देख पाता!

३.जगन्नाथ पुरी मन्दिर में समुद्र की आवाज़ नहीं सुनेगी :

मन्दिर के अंदर समुद्र की लहरों की आवाज किसी को भी सुनाई नहीं देती है, जबकि समुद्र पास में ही है, लेकिन आप जैसे ही मंदिर से एक कदम बाहर निकालेंगे, वैसे ही समुद्र के लहरों की आवाज स्पष्ट सुनाई देने लगती है। वाकई यह किसी आश्चर्य से कम नहीं है जगन्नाथ पुरी मन्दिर!

४.कोई भी पक्षी या जहाज़ मन्दिर के ऊपर से नहीँ जाता :

आमतौर पर मन्दिरों के ऊपर से पक्षी गुजरते ही हैं या कभी-कभी उसके शिखर पर भी बैठ जाते हैं, लेकिन जगन्नाथ मन्दिर इस मामले में सबसे रहस्यमय है, क्योंकि इसके ऊपर से कोई भी पक्षी नहीं गुजरता! सिर्फ यही नहीं, मन्दिर के ऊपर से हवाई जहाज़ भी नहीँ उड़ते हैं!

५.जगन्नाथ पुरी मन्दिर का महाप्रसाद :

इस मन्दिर की रसोई भी सबको हैरान कर देती है! दरअसल, यहां भक्तों के लिए प्रसाद पकाने के लिए सात बर्तन एक-दूसरे के ऊपर रखे जाते हैं, लेकिन हैरानी की बात ये है कि सबसे ऊपर रखे बर्तन में ही प्रसाद सबसे पहले पकता है! फिर नीचे की तरफ एक के बाद एक बर्तन में रखा प्रसाद पकता जाता है! इसके अलावा यह भी कहा जाता है कि यहाँ हर दिन बनने वाला प्रसाद भक्तों के बीच कभी कम नहीं पड़ता! चाहे १०-२० हज़ार लोग आएँ या लाखों लोग, सबको लँगर प्रसाद मिलता ही है, लेकिन जैसे ही मन्दिर का द्वार बन्द होता है, वैसे ही प्रसाद भी खत्म हो जाता है!

श्री जगन्नाथपुरी मन्दिर खुलने व आरती का समय :

मन्दिर के ऊपर लगा झण्डा रोजाना शाम को बदला जाता है! खास बात यह है कि इसे बदलने वाला व्यक्ति उल्टा चढ़कर झण्डे को बदलता है! जिस समय झण्डा बदला जाता है, मन्दिर के प्राँगण में इस दृश्य को देखने वालों की भारी भीड़ जमा होती है! झण्डे के ऊपर भगवान शिव का चँद्र बना होता है!

मन्दिर परिसर में पुजारियों द्वारा प्रसादम को पकाने का अद्भुत और पारंपरिक तरीका है! प्रसाद पकाने के लिए सात बर्तनों को एक दूसरे के ऊपर रखा जाता है और लकड़ी का उपयोग करके इसे पकाया जाता है! ऊपर के बर्तन का प्रसाद सबसे पहले और बाकी अन्त में पकता है!

जगन्नाथ पुरी में हवा की दिशा में भी विशेषता देखने को मिलती है! अन्य समुद्री तटों पर प्रायः हवा समुद्र की ओर से जमीन की ओर आती है लेकिन पुरी के समुद्री तटों पर हवा जमीन से समुद्र की ओर आती है! इसके कारण पुरी अनोखा है! आमतौर पर किसी भी मंदिर के गुंबद की छाया उसके प्रांगण में बनती है! लेकिन जगन्नाथ पुरी मंदिर के गुंबद की छाया अदृश्य ही रहती है! मन्दिर के गुंबद की छायी लोग कभी नहीं देख पाते हैं! वैसे तो हम अक्सर आकाश में पक्षियों को उड़ते हुए देखते हैं! लेकिन जगन्नाथ मन्दिर की विशेषता यह है कि इस मन्दिर के गुंबद के ऊपर से होकर कोई पक्षी नहीं उड़ता है और यहां तक कि हवाई जहाज भी मन्दिर के ऊपर से होकर नहीं गुजरता है! अर्थात् भगवान से ऊपर कुछ भी नहीं है! हिंदू पौराणिक कथाओं में भोजन को बर्बाद करना एक बुरा संकेत माना जाता है! मन्दिर के संचालक इसका अनुसरण करते है! मन्दिर जाने वाले लोगों की कुल सँख्या हर दिन २,000 से २, 00,000 लोगों के बीच होती है! लेकिन मन्दिर का प्रसादम रोजाना इस चमत्कारिक ढंग से तैयार किया जाता है कि कभी भी व्यर्थ नहीं होता है और ना ही कम पड़ता है! इसे प्रभु का चमत्कार माना जाता है! जगन्नाथ मन्दिर का रथयात्रा त्यौहार जगन्नाथ पुरी मन्दिर का रथयात्रा उत्सव पूरे विश्व में प्रसिद्ध है! वर्ष में एक बार जून-जुलाई के महीने में भगवान जगन्नाथ की यात्रा निकाली जाती है! इसमें मन्दिर के तीनों मुख्य देवता, भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलभद्र और भगिनी सुभद्रा तीनों लोगों को तीन अलग-अलग भव्य और सुसज्जित रथों में विराजमान करके मंदिर से बाहर नगर की यात्रा पर निकाला जाता है! रथयात्रा निकालने का उत्सव मध्यकाल से ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है! इसके साथ ही भारत के कई वैष्णव कृष्ण मंदिरों में रथयात्रा निकाली जाती है। यह रथयात्रा महोत्सव १० दिनों तक चलता है! रथों को मन्दिरों के तरह ही बनाया एवँ सजाया जाता है। रथों का निर्माण जनवरी एवं फरवरी माह से ही शुरू हो जाता है! जगन्नाथ मन्दिर सप्ताह के सातों दिन खुला रहता है। इस मन्दिर की पूजा एवं रस्म प्रणाली बहुत विस्तृत है और अनुष्ठान कराने के लिए मन्दिर परिसर में सैकड़ों पण्डे और पुजारी मौजूद हैं!

यदि आप जगन्नाथ पुरी मन्दिर में दर्शन पूजन के लिए जाना चाहते हैं तो आपकी सुविधा के लिए यह बता दें कि यह मंदिर सुबह पाँच बजे से रात ग्यारह बजे तक दर्शन के लिए खुला रहता है!

जगन्नाथ मन्दिर में पूजा का समय :

सुबह पाँच बजे मन्दिर खुलने के बाद सबसे पहले द्वारका पीठ और मन्गला आरती होती है! इसके बाद सुबह छह बजे मैलम होता है! भगवान जगन्नाथ के कपड़े और फूलों को हटाने को मैलम कहा जाता है! इस समय कुछ विशेष सेवक पिछली रात पहनायी गई भगवान के शरीर से कपड़े, तुलसी के पत्ते और फूलों को हटाते हैं! सुबह नौ बजे मन्दिर में गोपाल बल्लव पूजा होती है, जिसमें भगवान को नाश्ता कराया जाता है! जिसमें दही, स्वीट पॉपकॉर्न, खोवा लड्डू आदि का भोग लगाया जाता है! सुबह ११ बजे मध्हाह्न धूप पूजा होती है! इसमें सुबह की अपेक्षा अधिक मात्रा में खाद्य पदार्थों से भगवान को भोग लगाया जाता है! इस समय जगन्नाथ मन्दिर में दर्शन करने के लिए श्रद्धालुओं को मात्र ₹ १०/= का टिकट देना पड़ता है! प्रातः मन्दिर खुलने से लेकर रात में मन्दिर बन्द होने तक इसी प्रकार पूरे दिन अलग अलग तरह की पूजा और आरती होती रहती है! शाम के समय मंदिर में भोग और प्रसाद का वितरण होता है!

हवाईजहाज़ मार्ग से दिल्ली से कैसे पहुंचे :

पुरी का निकटतम हवाई अड्डा भुबनेश्वर है जो पुरी से ६० किलोमीटर की दूरी पर है! आप भुवनेश्वर एयरपोर्ट से बस, टैक्सी या कार बुक करके पुरी पहुंच सकते हैं!

रेल मार्ग से दिल्ली से कैसे पहुंचे :

पुरी ईस्ट कोस्ट रेलवे पर एक टर्मिनस है जो नई दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, ओखा, अहमदाबाद, तिरुपति आदि के साथ सीधे एक्सप्रेस और सुपर फास्ट ट्रेनों द्वारा जुड़ा है! कुछ महत्वपूर्ण ट्रेनें कोलकाता (हावड़ा) पुरी हावड़ा एक्सप्रेस, जगन्नाथ एक्सप्रेस, नई दिल्ली पुरुषोत्तम एक्सप्रेस आदि हैं! पुरी से ४४ किलोमीटर दूर खुर्दा रोड स्टेशन चेन्नई और पश्चिमी भारत के लिए रेल का सुविधाजनक रेलमार्ग है! स्टेशन शहर से लगभग एक किलोमीटर उत्तर में है! इसके बाद रिक्शा और ऑटो रिक्शा से आप मन्दिर तक पहुँच सकते हैं!

सड़क मार्ग से कैसे पहुँचें मन्दिर :

दिल्ली से जगन्नाथपुरी मन्दिर आने के लिए यदि आप बस अथवा अपनी कार से आना चाहते हो तो आपको ३४ घण्टे लगेंगे! आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे से १,८२८.९ किलोमीटर की यात्रा करके कोणार्क मन्दिर पहुँच जाओगे!गुंडिचा मन्दिर के पास बस स्टैंड हैं जहां से पुरी जाने के लिए बसें मिलती हैं! इसके अलावा भुबनेश्वर, कटक से भी बस द्वारा यहाँ पहुँचा जा सकता है! कोलकाता और विशाखापट्टनम से भी पुरी के लिए कई बसें चलती हैं!

जगन्नाथ जी की जय हो! जयघोष हो!

Leave a Reply

Your email address will not be published.

LIVE OFFLINE
track image
Loading...