काँची कैलाश नाथ मन्दिर, काँचीपुरम, तमिलनाडु भाग :१७२ , पँ० ज्ञानेश्वर हँस “देव” की क़लम से

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भारत के धार्मिक स्थल: काँची कैलाश नाथ मन्दिर, काँचीपुरम, तमिलनाडु भाग :१७२

आपने पिछले भाग में पढ़ा भारत के धार्मिक स्थल : अचलेश्वर मन्दिर एवँ अच्ल साहिब गुरुद्वारा, बटाला, पँजाब! यदि आपसे उक्त लेख छूट गया अथवा रह गया हो और आपमें पढ़ने की जिज्ञासा हो तो आप प्रजा टूडे की वेब साईट पर जाकर, धर्म- साहित्य पृष्ठ पर जाकर पढ़ सकते हैं! आज हम आपके लिए लाए हैं : भारत के धार्मिक स्थल: काँची कैलाश नाथ मन्दिर, काँचीपुरम, तमिलनाडु भाग :१७२

काँची कैलाशनाथार मन्दिर, काँचीपुरम, कैलाशनाथार मन्दिर तमिलनाडु राज्य के काँचीपुरम शहर के पश्चिम दिशा में स्थित पपरम् पुनीत प्रचीन सबसे अति प्राचीन और दक्षिण भारत के सबसे शानदार मन्दिरों में एक है! निर्माता नरसिंह वर्मन द्वितीय, महेन्द्र वर्मन द्वितीय निर्माण काल ८वीं शताब्दी देवी-देवता शिव और पार्वती किरीकिरी पक्षी अभयारण्य, बेदानथंगल पक्षी अभयारण्य, बैकुंठ पेरुमल मन्दिर, वरदराज पेरुमल मन्दिर कैलाशनाथार मन्दिर में शिव और पार्वती की नृत्य प्रतियोगिता को दर्शाया गया है।

कैलाशनाथार मन्दिर तमिलनाडु राज्य के काँचीपुरम शहर के पश्चिम दिशा में स्थित काँचीपुरम का सबसे प्राचीन और दक्षिण भारत के सबसे शानदार और आलीशान मन्दिरों में से एक है! ८वीं शताब्दी में पल्लव वँश के राजा नरसिंह वर्मन द्वितीय ने अपनी पत्नी के लिए कैलाशनाथ मन्दिर का निर्माण करवाया था! इस मन्दिर के अग्रभाग का निर्माण राजा के पुत्र महेन्द्र वर्मन द्वितीय के करवाया था! कैलाश नाथार मन्दिर का कार्य नरसिंह वर्मन द्वितीय के समय में प्रारम्भ हुआ तथा महेन्द्र वर्मन द्वितीय के समय में इसकी रचना पूर्ण हुई!

इस मन्दिर में शिव और पार्वती की नृत्य प्रतियोगिता को बख़ूबी दर्शाया गया है! शिव हिंदू धर्म ग्रंथ पुराणों के अनुसार भगवान शिवशँकर ही समस्त सृष्टि के आदि कारण हैं! उन्हीं से ब्रह्मा, विष्णु सहित समस्त सृष्टि का उद्भव हुआ है!प्रलयकाल के पश्चात् सृष्टि के आरम्भ में भगवान नारायण की नाभि से एक कमल प्रकट हुआ और उस कमल से ब्रह्माजी प्रकट हुए!

ब्रह्मा जी अपने कारण का पता लगाने के लिये कमलनाल के सहारे नीचे उतरे। वहाँ उन्होंने शेषशायी भगवान नारायण को योगनिद्रा में लीन देखा; उन्होंने भगवान नारायण को जगाकर पूछा- आप कौन हैं? नारायण ने कहा कि मैं लोकों का उत्पत्तिस्थल और लयस्थल पुरुषोत्तम हूँ! ब्रह्मा ने कहा- किन्तु सृष्टि की रचना करने वाला तो मैं हूँ ब्रह्माजी के ऐसा कहने पर भगवान विष्णु ने उन्हें अपने शरीर में व्याप्त सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का दर्शन कराया!

इस पर ब्रह्मा जी ने कहा- इसका तात्पर्य है कि इस सँसार के सृष्टा मैं और आप दोनों हैं ,भगवान विष्णु ने कहा- ब्रह्माजी! आप भ्रम में हैं! सबके परम कारण परमेश्वर ईशान भगवान शिव को आप नहीं देख रहे हैं! आप अपनी योगदृष्टि से उन्हें देखने का प्रयत्न कीजिये! हम सबके आदि कारण देवाधिदेव भगवान सदाशिव आपको दिखायी देंगे! जब ब्रह्मा जी ने योगदृष्टि से देखा तो उन्हें त्रिशूल धारण किये परम तेजस्वी नीलवर्ण की एक मूर्ति दिखायी दिए!

उन्होंने नारायण से पूछा- ‘ये कौन हैं? नारायण ने बताया ये ही देवाधिदेव भगवान महादेव हैं! ये ही सबको उत्पन्न करने के उपरान्त सबका भरण-पोषण करते हैं और अन्त में सब इन्हीं में लीन हो जाते हैं! इनका न कोई आदि है न अन्त, ये ही अनन्त हैं! यही सम्पूर्ण जगत में व्याप्त हैं!’ इस प्रकार ब्रह्मा जी ने भगवान विष्णु की कृपा से सदाशिव का दर्शन किए!

शिव का परिवार बहुत बड़ा:

एकादश रुद्राणियाँ, चौंसठ योगिनियाँ तथा भैरवादि इनके सहचर और सहचरी हैं! माता पार्वती की सखियों में विजया आदि प्रसिद्ध हैं!गणपति-परिवार में उनकी सिद्धि, बुद्धि नामक दो पत्नियाँ तथा क्षेम और लाभ दो पुत्र हैं! उनका वाहन मूषक है! भगवान कार्तिकेय की पत्नी देवसेना तथा वाहन मयूर है! भगवती पार्वती का वाहन सिंह है तथा भगवान शिव स्वयँ धर्मावतार नन्दी पर आरूढ़ होते हैं!

यद्यपि भगवान शिव सर्वत्र व्याप्त हैं, तथापि काशी और कैलास- ये दो उनके मुख्य निवास स्थान कहे गये हैं! भगवान शिव देवताओं के उपास्य तो हैं ही, साथ ही उन्होंने अनेक असुरों- अन्धक, दुन्दुभी, महिष, त्रिपुर, रावण, निवात-कवच आदि को भी अतुल ऐश्वर्य प्रदान किया! कुबेर आदि लोकपालों को उनकी कृपा से यक्षों का स्वामित्व प्राप्त हुआ! सभी देवगणों तथा ऋषि-मुनियों को दु:खी देखकर उन्होंने कालकूट विष का पान किया! इसी से वे नीलकण्ठ कहलाये! इस प्रकार भगवान शिव की महिमा और नाम अनन्त हैं!शिव, पार्वती, गणेश और कार्तिकेय, उनके अनेक रूपों में उमा-महेश्वर, अर्द्धनारीश्वर, पशुपति, कृत्तिवासा, दक्षिणामूर्ति तथा योगीश्वर आदि अति प्रसिद्ध हैं!

महाभारत, आदिपर्व के अनुसार पाँचाल नरेश द्रुपद की पुत्री द्रौपदी पूर्वजन्म में एक ऋषि कन्या थी! उसने श्रेष्ठ पति पाने की कामना से भगवान शिव की तपस्या की थी! शंकर ने प्रसन्न होकर उसे वर देने की इच्छा की! उसने शिवशँकर से पाँच बार कहा कि वह सर्वगुणसंपन्न पति चाहती है! शँकरजी ने कहा कि अगले जन्म में उसके पाँच भरतवँशी पति होंगे, क्योंकि उसने पति पाने की कामना पाँच बार दोहरायी!भगवान शिव की ईशान, तत्पुरुष, वामदेव, अघोर तथा अद्योजात पाँच विशिष्ट मूर्तियाँ और शर्व, भव, रुद्र, उग्र, भीम, पशुपति, ईशान और महादेव- ये अष्टमूर्तियाँ प्रसिद्ध हैं!

सोमनाथ, मल्लिकार्जुन, महाकालेश्वर, ओंकारेश्वर, केदारेश्वर, भीमशंकर, विश्वेश्वर, त्र्यंबक, वैद्यनाथ, नागेश, रामेश्वर तथा घुश्मेश्वर– ये प्रसिद्ध बारह ज्योतिर्लिंग हैं! भगवान शिव के मन्त्र-उपासना में पंचाक्षर नम: शिवाय तथा महामृत्युंजय विशेष प्रसिद्ध है! इसके अतिरिक्त भगवान शिव की पार्थिव-पूजा का भी विशेष महत्त्व है! शिव हिन्दू धर्म के प्रमुख देवताओं में से हैं! वेद में इनका नाम रुद्र है! यह व्यक्ति की चेतना के अर्न्तयामी हैं!

इनकी अर्द्धांगिनी (शक्ति) का नाम पार्वती और इनके पुत्र स्कन्द और गणेश हैं! शिव योगी के रूप में जाते हैं और उनकी पूजा शिवलिंग के रूप में होती है!भगवान शिव सौम्य एवं रौद्ररूप दोनों के लिए जाने जाते हैं!सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति एवँ सँहार के अधिपति हैं! त्रिदेवों में भगवान शिव सँहार के देवता माने जाते हैं! शिव का अर्थ कल्याण कारी माना गया है, लेकिन वे उनका लय और प्रलय दोनों पर समान अधिकार है! भक्त पूजन में शिव जी की आरती की जाती है!शिव जी के अन्य भक्तों में त्रिहारिणी भी थे और शिव जी त्रिहारिणी को अपने पुत्रों से भी अधिक प्यार करते थे! शिव हिंदू धर्म ग्रंथ पुराणों के अनुसार भगवान शिव ही समस्त सृष्टि के आदि कारण हैं! उन्हीं से ब्रह्मा, विष्णु सहित समस्त सृष्टि का उद्भव होता हैं!

वायु मार्ग से कैसे पहुँचें मन्दिर:

काँचीपुरम में कोई घरेलू हवाई अड्डा नहीं है, लेकिन पहुंचने योग्य हवाई अड्डा चेन्नई हवाई अड्डा है जो १६५ किलोमीटर की दूरी पर स्थित है, इसके बाद बैंगलोर है! सभी प्रमुख शहरों और देशों के लिए और के लिए उड़ानें उपलब्ध हैं। कोई भी आसानी से चेन्नई या बैंगलोर हवाई अड्डे के लिए उड़ान भर सकता है!

रेल मार्ग से कैसे पहुँचें मन्दिर :

रेल द्वारा तिरुवन्नामलाई पहुंच सकता है! यह शहर देश के विभिन्न हिस्सों से अच्छी तरह जुड़ा हुआ है! विल्लुपुरम, काटपाडी, मदुरै, तिरुपति, खड़गपुर और पुरुलिया जैसे शहरों से विभिन्न प्रकार की ट्रेनें उपलब्ध हैं! राज्य के बाहर कुछ अन्य प्रमुख शहर हैं, जहां से आप यहां पहुंचने के लिए ट्रेनों में सवार हो सकते हैं!

सड़क मार्ग से कैसे पहुँचें मन्दिर :

दिल्ली से आप बस या कार से ३९ घण्टों में २,२७३.७ किलोमीटर की दूरी तय करके पहुँच जाओगे मन्दिर!

कैलाशनाथ भगवान की जय हो! जयघोष हो!!

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