मत्स्य मन्दिर, वलसाड़, गुजरात! भाग: २१२ , पँ० ज्ञानेश्वर हँस “देव” की क़लम से

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भारत के धार्मिक स्थल: मत्स्य मन्दिर, वलसाड़, गुजरात! भाग: २१२

आपने पिछले भाग में पढ़ा भारत के धार्मिक स्थल: मतस्य नारायण पेरुमल भगवान मन्दिर, चैन्नई! यदि आपसे उक्त लेख छूट गया अथवा रह गया हो और आपमें पढ़ने की जिज्ञासा हो तो आप प्रजा टूडे की वेब साईट www. prajatoday.com पर जाकर, धर्म- साहित्य पृष्ठ पर जाकर सकते हैं! आज हम आपके लिए लाए हैं : भारत के धार्मिक स्थल: मत्स्य मन्दिर, वलसाड़, गुजरात! भाग: २१२

भारतवर्ष में आपने ऐसे कई मन्दिर देखे होंगे या उनके बारे में सुना होगा जो अपने आप में बेहद अनोखे हैं! देवी-देवताओं के अनेक मंदिर हैं, जो चमत्कारी कथाओं और मान्यताओं की वजह से प्रसिद्ध हैं! लेकिन आज हम बात करेंगे एक ऐसे मन्दिर की जहाँ देवी-देवताओं की नहीं बल्कि व्हेल मछली की हड्डियों की पूजा होती है! मन्दिर गुजरात में वलसाड तहसील के मगोद डुंगरी गांव में स्थित है! जिसे मत्स्य माता मंदिर कहा जाता है!

मत्स्य मन्दिर से जुड़ी कथा :

बताया जाता है कि करीब ३०० वर्ष पुराने इस मन्दिर का निर्माण गाँव के मछुआरों ने ही करवाया था! आज भी मछुआरे मछली पकड़ने के लिए समुद्र में जाने से पहले मन्दिर में मत्स्य माता के सामने माथा टेकते हैं! ऐसा मानते हैं कि, मछली पकड़ने जाने से पहले अगर कोई मछुआरा मन्दिर में दर्शन नहीं करता है तो उसके साथ कोई दुर्घटना घटित हो जाती है!

मछली को मानते हैं देवी का अवतार :

इस मन्दिर से जुड़ी रोचक कथा ये है कि, यहाँ के रहने वाले प्रभु टंडेल ने लगभग ३०० वर्ष पहले सपना देखा था कि, समुद्र तट पर एक विशाल मछली आई हुई है! वह मछली देवी का रुप धारणकर तट पर पहुंचती है, लेकिन वहां आने पर उनकी मौत हो जाती है!

सुबह गाँव वाले और टंडेल जब समुद्र के तट पर पहुंचे तो देखा वहां सच में एक बड़ी मछली मरी हुई पड़ी थी! व्हेल मछली के विशाल आकार को देखते ही गाँव वाले हैरान रह गए! तब टंडेल ने अपने सपने के बारे में लोगों को बताया! इसके बाद लोगों ने उसे देवी का अवतार मान लिया और वहां मत्स्य माता के नाम से एक मन्दिर बनवाया!स्थानीय लोगों के अनुसार, प्रभु टंडेल ने मन्दिर के निर्माण से पहले व्हेल मछली को समुद्र तट पर ही दबा दिया था! जब मन्दिर का निर्माण का हो गया तो उसने व्हेल की हड्डियों को वहां से निकालकर मन्दिर में रख दिया! तब से हड्डियों की ही पूजा की जाती है!

यद्यपि कुछ लोगों ने मछली की हड्डी की पूजा का विरोध भी किया था, इसी वजह से उन्होंने मन्दिर के किसी भी कार्य में हिस्सा नहीं लिया, कहा जाता हैं जिन लोगों को मत्स्य देवी पर विश्वास नहीं था, उनके कारण केवल उन्हें नहीं बल्कि पूरे गाँव वालों को गम्भीर नतीजा भुगतना पड़ा था! गाँव में बीमारी फैल गई थी! तब टंडेल के कहने पर ग्रामवासियों ने मन्दिर में जाकर मत्स्य देवी से क्षमा मांगते हुए बीमारी से छुटकारा दिलाने की प्रार्थना की ; तब माता के चमत्कार से सारे सभी लोग ठीक हो गए! तब से गाँव के सभी लोग मन्दिर में प्रतिदिन पूजा-अर्चना करते हैं!

मत्स्य देवी मन्दिर हवाईमार्ग से कैसे पहुँचें:

फ्लाइट से वलसाड़ तक पहुंचने के लिए नई दिल्ली की दूरी लगभग १२३७ किलोमीटर है!

मत्स्य देवी मन्दिर रेलमार्ग से3 कैसे पहुँचें:

मुंबई से वलसाड ट्रेनों की सूची, उनके शेड्यूल, टाइम टेबल, सीट की उपलब्धता और टिकट का किराया: मुम्बई से वलसाड के बीच लगभग २८ ट्रेनें लगभग १६५ किलोमीटर की दूरी तय करती हुई पाई जाती हैं! मुंबई से वलसाड ऑनलाइन ट्रेन टिकट बुकिंग पर सर्वोत्तम मूल्य प्राप्त करें! इसके अलावा, वलसाड से मुंबई ट्रेन टिकट ऑनलाइन बुक करके अपनी वापसी यात्रा की योजना बनाएं!

मत्स्य देवी मन्दिर सड़कमार्ग से कैसे पहुँचें:

आप दिल्ली से बस अथवा कार से आते हो तो १२२०.३ किलोमीटर की दूरी तय करके २१ घण्टे ७ मिनट्स में पहुँच जाओगे मत्स्य देवी मन्दिर!

मत्स्य देवी की जय हो! जयघोष हो!!

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