रमेश बैस ने ‘बाल विवाह’ विषय पर आयोजित परिचर्चा में भाग लिया

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@ रांची झारखंड

राज्यपाल महोदय ने बाल विवाह उन्मूलन हेतु आली संस्था से जुड़कर कार्य करने वाली तीन बालिकाओं श्वेता कुमारी, पलामू, सपना कुमारी, गढ़वा एवं गीता कुमारी, देवघर को 2-2 लाख रुपए की प्रोत्साहन राशि देने की घोषणा की।हर परिवार चाहता है कि उन्हें बहु पढ़ी-लिखी मिले, लेकिन बेटियों को पढ़ाने को तैयार नहीं है।अगर हम बेटी को पढ़ा नहीं सकते तो शिक्षित बहु की उम्मीद करना अनुचित है।

भारतीय संविधान सभी नागरिकों को समानता, भेदभाव रहित और गरिमा के साथ जीवन जीने का अधिकार देता है। बाल विवाह इन अधिकारों का पूरी तरह हनन करता है।एक आंकड़ों के मुताबिक मार्च 2020 से जून 2020 के बीच लॉक डाउन के पहले चार महीनों में भारत में बाल विवाह के कुल 5,214 मामले दर्ज हुए।इस सामाजिक कुरीति का कारण दहेज-प्रथा व लड़कियों के प्रति कुछ लोगों में गलत सामाजिक सोच भी है।

इस तथ्य के बावजूद कि भारत में दहेज को पाँच दशक पूर्व ही प्रतिबंधित कर दिया गया है, दूल्हे या उसके परिवार द्वारा दहेज की मांग करना एक आम प्रथा बनी हुई है।‘बेटा-बेटी एक समान’, हमारा मंत्र होना चाहिये। सबको समझना होगा कि ‘बेटी जन्म नहीं लेगी, तो बहु कहाँ से आयेगी।‘ इसलिए हर किसी को सामूहिक जिम्मेदारी के साथ संवेदनशील एवं जागरूक होना होगा।

बाल विवाह का बाल वधुओं के स्वास्थ्य पर भी गंभीर प्रभाव पड़ता है, क्योंकि वे न तो शारीरिक रूप और न ही मानसिक रूप से किसी की पत्नी अथवा किसी की माता बनने के लिए तैयार नहीं होती हैं।शोध के मुताबिक, 15 वर्ष से कम आयु की लड़कियों में मातृ मृत्यु का जोखिम सबसे अधिक रहता है।इसके अलावा बाल वधुओं पर हृदयघात, मधुमेह, कैंसर और स्ट्रोक आदि का खतरा 23 प्रतिशत अधिक होता है। साथ ही वे मानसिक विकारों के प्रति भी काफी संवेदनशील होती हैं।

 बाल विवाह जैसी कुप्रथा का उन्मूलन सतत विकास लक्ष्य-5 का हिस्सा है। यह लैंगिक समानता प्राप्त करने तथा सभी महिलाओं एवं लड़कियों को सशक्त बनाने से संबंधित है।लड़कियों को प्रायः सीमित आर्थिक भूमिका में देखा जाता है।महिलाओं का काम घर तक ही सीमित रहता है और उसे भी कोई विशेष महत्व नहीं दिया जाता है।कम आयु में विवाह करने वाले बच्चे प्रायः विवाह के दायित्वों को समझने में असमर्थ होते हैं जिसके कारण प्रायः परिवार के सदस्यों के बीच समन्वय का अभाव देखा जाता है।

कम आयु में विवाह करने से लड़कियाँ अपने बुनियादी अधिकारों से वंचित हो जाती हैं। ‘बाल अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन’ में उल्लिखित बुनियादी अधिकारों में शिक्षा का अधिकार और यौन शोषण से सुरक्षा का अधिकार आदि शामिल हैं।मुझे खुशी है कि आज का यह कार्यक्रम ‘बाल विवाह’ जैसे गंभीर व महत्वपूर्ण विषय पर है। यह देखकर प्रसन्नता हो रही है कि हमारे राज्य में बाल विवाह जैसी सामाजिक कुरीति के उन्मूलन के लिए युवतियाँ इस अभियान का नेतृत्व कर रही हैं, इस प्रकार के मुहिम की मैं सराहना करता हूँ।

बाल विवाह को रोकने के लिए एकजुट होकर काम करने की जरूरत है।बालिकाओं को अपने अधिकारों के बारे में जागरूक करने की आवश्यकता है। रूढ़िवादी सोच को जड़ से ख़त्म कर शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार आदि विभिन्न अधिकारों के प्रति लड़कियों को भी जागरूक करना होगा।मैं मानता हूँ कि राज्य में ऐसी बातें होती हैं कि अपराध होता है परंतु प्राथमिकी दर्ज नहीं होता है,टालने की कोशिश होती है।मैं राज्य में आने के बाद प्रशासन में चुस्ती लाने का प्रयास कर रहा हूँ। मुख्य सचिव एवं पुलिस महानिदेशक को बुलाकर निरंतर परामर्श देता हूँ। मैंने थाना में प्राथमिकी दर्ज नहीं करने वाले अधिकारियों को निलंबित करने हेतु कहा है।

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