शनि मन्दिर क्यासरा, राजस्थान भाग : १५०,पँ० ज्ञानेश्वर हँस “देव” की क़लम से

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भारत के धार्मिक स्थल: शनि मन्दिर क्यासरा, राजस्थान भाग :१५०

आपने पिछले भाग में पढ़ा भारत के प्रसिद्ध धार्मिक स्थल : सिद्ध शक्तिपीठ ज्वाला माँ मन्दिर, हिमाचल प्रदेश! यदि यह लेख आपसे छूट गया या रह गया हो तो आप प्रजाटूडे की वेबसाईट पर धर्म साहित्य पृष्ठ पर जाकर, पढ़ सकते हैं! अब आप पढ़ें:

भारत के धार्मिक स्थल: शनि मन्दिर क्यासरा, राजस्थान भाग :१५०

राजस्थान-मध्यप्रदेश सीमा रेखा से लगभग २० किलोमीटर डग, बड़ोद से भवानी मण्डी मार्ग पर राजस्थान के झालावाड़ ज़िले की गन्धार तहसील में भगवान काया ईश्वर नाम से प्रसिद्ध महादेव का मन्दिर हैं! इस महादेव मन्दिर के विषय में यहाँ पर पूजा अर्चना करने वाले यहाँ का इतिहास बताते हैं कि यह एक चमत्कारी मन्दिर है! लगभग ५००० वर्ष से अधिक पुराना है यह मन्दिर!

राजा जन्मेजय द्वारा बनाया गया है! मान्यतानुआर एक बार राजा जन्मेजय शिकार के लिए यहाँ आये, और एक हिरण का पीछा करते हुए वह हिरण यहाँ से निकलता है उस हिरण को कोढ़ था और वह ठीक हो जाता है! इसके साथ ही राजा आश्चर्यचकित होता है और सोचता है! कि यदि हिरण ठीक हो गया तो खुद राजा भी कोढ़ से ग्रसित था! इसलिए राजा ने यहाँ पर स्थित कुण्ड में स्नान किया! जिससे उसका कोढ़ ठीक हो गया, राजा ने देखा तो वहाँ एक अँगुष्ठ प्रमाण मूर्ति प्राप्त हुई! राजा ने सोचा कि इनके चमत्कार से मेरी काया ठीक हो गई है! इसलिए राजा ने इन्हें काया ईश्वर महादेव नाम दीया और मन्दिर का निर्माण कराया यह मूर्ति स्वयँभू हैं!

क्यासरा धाम आज बहुत प्रसिद्ध है! यहाँ पर श्रावण में भक्तों का तांता लगा रहा रहता है! आए दिन कई भक्त यहाँ पूजा पाठ करने आते हैं! क्यासरा के बाबा महादेव सभी भक्तों की इच्छा पूरी करते हैं! यहाँ क्यासरा धाम में शनि मन्दिर, सरस्वती मन्दिर, दुर्गा मन्दिर और हनुमान मन्दिर भी स्थित हैं! यहाँ पर पहाड़ी पर बहुत ही रोमांचिक दृश्य देखने को मिलता है! प्रकृति की गोद में परमेश्वर अपनी लीला बिखेरे हुए विद्यमान हैं!

श्री शनि देव को प्रसन्न करें चालीसा से :

श्री शनि देव चालीसा हिन्दी अनुवाद सहित :– शनिवार के दिन शनि मन्दिर में श्री शनि चालीसा का पूर्ण विश्वास के साथ श्रद्धा पूर्वक पाठ करने से शनि देव से व्यक्ति जिस चीज़ की कामना करता है मिलने लगती है! इस शनि चालीसा का पाठ शनि देव के सामने खड़े होकर करना चाहिए! शानि देव को प्रसन्न करने के लिए शनि चालीसा या पाठ किया जाता है! इसे करने से घर में सुख- समृद्धि आती है! साथ ही घर में धन की कमी नहीं होती है! इस पाठ को करने से सभी परेशानियां दूर हो जाती है. पाठ करने से आपको क्रोध कम आता है और मन में शाँति का अनुभव होता है!

श्री शनि चालीसा हिन्दी अनुवाद सहित :

॥दोहा॥

जय गणेश गिरिजा सुवन, मङ्गल करण कृपाल।
दीनन के दुःख दूर कर, कीजै शनिनाथ निहाल॥
जयजय श्री शनिदेव प्रभु, सुनहु विनय महाराज।
करहु कृपा हे रवि तनय, राखहु – जन की लाज॥

हे माता पार्वती के पुत्र भगवान श्री गणेश, आपकी जय हो। आप कल्याणकारी है, सब पर कृपा करने वाले हैं, दीन लोगों के दुख दुर कर उन्हें खुशहाल करें भगवन। हे भगवान श्री शनिदेव जी आपकी जय हो, हे प्रभु, हमारी प्रार्थना सुनें, हे रविपुत्र हम पर कृपा करें व भक्तजनों की लाज रखें।

॥चौपाई॥

जयति जयति शनिदेव दयाला।
करत सदा भक्तन – प्रतिपाला॥
चारि भुजा, तनु श्याम विराजै।
माथे – रतन मुकुट छवि छाजै॥
परम -विशाल मनोहर – भाला।
टेढ़ी -दृष्टि भृकुटि – विकराला॥
कुण्डलश्रवण चमाचम चमके।
हिये माल मुक्तन मणि दमके॥
कर में – गदा, त्रिशूल कुठारा।
पल बिच करैं अरिहिं संहारा॥

हे दयालु शनिदेव महाराज आपकी जय हो, आप सदा भक्तों के रक्षक हैं उनके पालनहार हैं। आप श्याम वर्णीय हैं व आपकी चार भुजाएं हैं। आपके मस्तक पर रतन जड़ित मुकुट आपकी शोभा को बढा रहा है। आपका बड़ा मस्तक आकर्षक है, आपकी दृष्टि टेढी रहती है! शनिदेव को यह वरदान प्राप्त हुआ था कि जिस पर भी उनकी दृष्टि पड़ेगी उसका अनिष्ट होगा इसलिए आप हमेशा टेढी दृष्टि से देखते हैं ताकि आपकी सीधी दृष्टि से किसी का अहित न हो! आपकी भृकुटी भी विकराल दिखाई देती है! आपके कानों में सोने के कुंडल चमचमा रहे हैं। आपकी छाती पर मोतियों व मणियों का हार आपकी आभा को और भी बढ़ा रहा है! आपके हाथों में गदा, त्रिशूल व कुठार हैं, जिनसे आप पल भर में शत्रुओं का सँहार करते हैं!

पिंगल, कृष्णों, छाया, नन्दन।
यम,कोणस्थरौद्र,दुःखभंजन॥
सौरी, मन्द, शनि, दशनामा।
भानुपुत्र पूजहिं सब कामा॥
जा पर प्रभु प्रसन्न है जाहीं।
रंक-हुं राव करैं क्षण माहीं॥
पर्वत -हू तृण होई निहारत।
तृणहू को पर्वत करिडारत॥

पिंगल, कृष्ण, छाया नंदन, यम, कोणस्थ, रौद्र, दु:ख भंजन, सौरी, मंद, शनि ये आपके दस नाम हैं। हे सूर्यपुत्र आपको सब कार्यों की सफलता के लिए पूजा जाता है। क्योंकि जिस पर भी आप प्रसन्न होते हैं, कृपालु होते हैं वह क्षण भर में ही रंक से राजा बन जाता है। पहाड़ जैसी समस्या भी उसे घास के तिनके सी लगती है लेकिन जिस पर आप नाराज हो जांए तो छोटी सी समस्या भी पहाड़ बन जाती है।

राज मिलत वन रामहिं- दीन्हो।
कैकेइ-हुं की मति हरि- लीन्हो॥
बन-हूं में, मृग, कपट – दिखाई।
मातु – जानकी, गई – चतुराई॥
लखनहिं शक्तिविकलकरडारा।
मचिगा – दल में, हा-हा-कारा॥
रावण – की गति – मति बौराई।
श्री राम -चन्द्र सों, बैर- बढ़ाई॥
दियो कीट करि कंचन- लंका।
बजि बजरँग – बीर की डंका॥
नृप विक्रम पर तुहि पगु धारा।
चित्र – मयूर, निगलि गै-हारा॥
हार नौ – लाखा, लाग्यो चोरी।
हाथ – पैर, डरवायो – तोरी॥
भारी दशा नि-कृष्ट दिखायो।
तेलिहिं घर कोल्हू चलवायो॥
विनय राग दीपक महँ कीन्हों।
तबप्रसन्न प्रभुहवै सुखदीन्हों॥

हे प्रभु आपकी दशा के चलते ही तो राज के बदले भगवान श्री राम को भी वनवास मिला था। आपके प्रभाव से ही केकैयी ने ऐसा बुद्धि हीन निर्णय लिया। आपकी दशा के चलते ही वन में मायावी मृग के कपट को माता सीता पहचान न सकी और उनका हरण हुआ। उनकी सूझबूझ भी काम नहीं आयी। आपकी दशा से ही लक्ष्मण के प्राणों पर संकट आन खड़ा हुआ जिससे पूरे दल में हाहाकार मच गया था। आपके प्रभाव से ही रावण ने भी ऐसा बुद्धिहीन कृत्य किया व प्रभु श्री राम से शत्रुता बढाई। आपकी दृष्टि के कारण बजरंग बलि हनुमान का डंका पूरे विश्व में बजा व लंका तहस-नहस हुई। आपकी नाराजगी के कारण राजा विक्रमादित्य को जंगलों में भटकना पड़ा। उनके सामने हार को मोर के चित्र ने निगल लिया व उन पर हार चुराने के आरोप लगे। इसी नौलखे हार की चोरी के आरोप में उनके हाथ पैर तुड़वा दिये गये। आपकी दशा के चलते ही विक्रमादित्य को तेली के घर कोल्हू चलाना पड़ा। लेकिन जब दीपक राग में उन्होंनें प्रार्थना की तो आप प्रसन्न हुए व फिर से उन्हें सुख समृद्धि से संपन्न कर दिया।

हरिश्चन्द्र नृप – नारि बिकानी।
आपहुं भरे डोम – घर पानी॥
तैसे नल पर, दशा – सिरानी।
भूंजी — मीन कूद गई पानी॥
श्री शंकरहि गहयो जब जाई।
माँ – पार्वती को सती कराई॥
तनिक विलोकत ही करि रीसा।
नभ उड़ि गयो गौरिसुत सीसा॥
पाण्डव पर भै – दशा तुम्हारी।
बची – द्रोपदी होति – उधारी॥
कौरव के भी गति मति मारयो।
युद्ध महा-भारत करि डारयो॥
रविकहं मुखमहं धरितत्काला।
लेकर कूदि – परयो पाताला॥
शेष देव – लखि विनती लाई।
रवि को मुख ते दियो छुड़ाई॥

आपकी दशा पड़ने पर राजा हरिश्चंद्र की स्त्री तक बिक गई, स्वयं को भी डोम के घर पर पानी भरना पड़ा। उसी प्रकार राजा नल व रानी दयमंती को भी कष्ट उठाने पड़े, आपकी दशा के चलते भूनी हुई मछली तक वापस जल में कूद गई और राजा नल को भूखों मरना पड़ा। भगवान शंकर पर आपकी दशा पड़ी तो माता पार्वती को हवन कुंड में कूदकर अपनी जान देनी पड़ी। आपके कोप के कारण ही भगवान गणेश का सिर धड़ से अलग होकर आकाश में उड़ गया। पांडवों पर जब आपकी दशा पड़ी तो द्रौपदी वस्त्रहीन होते होते बची। आपकी दशा से कौरवों की मति भी मारी गयी जिसके परिणाम में महाभारत का युद्ध हुआ। आपकी कुदृष्टि ने तो स्वयं अपने पिता सूर्यदेव को नहीं बख्शा व उन्हें अपने मुख में लेकर आप पाताल लोक में कूद गए। देवताओं की लाख विनती के बाद आपने सूर्यदेव को अपने मुख से आजाद किया।

वाहन -प्रभु के सात – सुजाना।
दिग्ज हय गर्दभ मृग – स्वाना॥
जम्बुक सिंह आदि नख धारी।
सोफलज्योतिष कहतपुकारी॥
गज -वाहन लक्ष्मी गृह आवैं।
हयते सुख सम्पत्ति उपजावै॥
गर्दभ हानि करै बहु – काजा।
सिंह सिद्धकर राज समाजा॥
जम्बुक बुद्धि – नष्ट कर डारै।
मृग देअ, कष्ट- प्राण सँहारै॥
जबआवहिं प्रभु श्वानसवारी।
चोरी आदि होय – डर भारी॥
तैसहि चारि चरण यह नामा।
स्वर्ण लौह चाँजी अरु तामा॥
लौह चरण पर जबप्रभुआवैं।
धन जन सम्पत्ति नष्ट करावै॥
समता ताम्र रजत शुभकारी।
स्वर्ण सर्वसुख मंगल कारी॥

हे प्रभु आपके सात वाहन हैं। हाथी, घोड़ा, गधा, हिरण, कुत्ता, सियार और शेर जिस वाहन पर बैठकर आप आते हैं उसी प्रकार ज्योतिष आपके फल की गणना करता है। यदि आप हाथी पर सवार होकर आते हैं घर में लक्ष्मी आती है। यदि घोड़े पर बैठकर आते हैं तो सुख संपत्ति मिलती है। यदि गधा आपकी सवारी हो तो कई प्रकार के कार्यों में अड़चन आती है, वहीं जिसके यहां आप शेर पर सवार होकर आते हैं तो आप समाज में उसका रुतबा बढाते हैं, उसे प्रसिद्धि दिलाते हैं। वहीं सियार आपकी सवारी हो तो आपकी दशा से बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है व यदि हिरण पर आप आते हैं तो शारीरिक व्याधियां लेकर आते हैं जो जानलेवा होती हैं। हे प्रभु जब भी कुत्ते की सवारी करते हुए आते हैं तो यह किसी बड़ी चोरी की और ईशारा करती है। इसी प्रकार आपके चरण भी सोना, चांदी, तांबा व लोहा आदि चार प्रकार की धातुओं के हैं! यदि आप लौहे के चरण पर आते हैं तो यह धन, जन या संपत्ति की हानि का संकेतक है। वहीं चांदी व तांबे के चरण पर आते हैं तो यह सामान्यत शुभ होता है, लेकिन जिनके यहां भी आप सोने के चरणों में पधारते हैं, उनके लिये हर लिहाज से सुखदायक व कल्याणकारी होते है!

जो यह शनि चरित्र नित गावै।
कबहुं न दशा निकृष्ट सतावै॥
अदभुत -नाथ दिखावैं लीला।
करैं शत्रु के नशि बलि ढीला॥
जो पण्डित -सुयोग्य बुलवाई।
विधिवत शनि-ग्रह शाँति-कराई॥
पीपलजल-शनिदिवस-चढ़ावत।
दीप – दान दै, बहु सुख पावत॥
कहत राम – सुन्दर – प्रभु दासा।
शनिसुमिरत सुखहोत प्रकाशा॥

जो भी इस शनि चरित्र को हर रोज गाएगा उसे आपके कोप का सामना नहीं करना पड़ेगा, आपकी दशा उसे नहीं सताएगी। उस पर भगवान शनिदेव महाराज अपनी अद्भुत लीला दिखाते हैं व उसके शत्रुओं को कमजोर कर देते हैं। जो कोई भी अच्छे सुयोग्य पंडित को बुलाकार विधि व नियम अनुसार शनि ग्रह को शांत करवाता है। शनिवार के दिन पीपल के वृक्ष को जल देता है व दिया जलाता है उसे बहुत सुख मिलता है। प्रभु शनिदेव का दास रामसुंदर भी कहता है कि भगवान शनि के सुमिरन सुख की प्राप्ति होती है व अज्ञानता का अंधेरा मिटकर ज्ञान का प्रकाश होने लगता है।

॥दोहा॥
पाठ शनिश्चर -देव को,
की हों ज्ञानेश्वर तैयार।
करें पाठ चालीस दिन,
हों भव – सागर पार॥

हवाई मार्ग से कैसे पहुँचें मन्दिर :

हवाई जहाज से इन्दौर हवाई अड्डा- १५४ किलोमीटर भोपाल हवाईअड्डा-१९० किलोमीटर, डबोक हवाईअड्डा २३६ किलोमीटर तथा सांगानेर हवाईअड्डा ३५५ किलोमीटर की दूरी पर है!

रेल मार्ग से कैसे पहुँचें मन्दिर :

रेल से १० किलोमीटर से कम में क्यासरा के पास कोई भी रेलवे स्टेशन नहीं है! उज्जैन जँक्शन रेल मार्ग स्टेशन क्यासर के आस पास ९८ किलोमीटर प्रमुख रेलवे स्टेशन है: आस-पास के रेलवे स्टेशन :- नाथूखेरी २४ किलोमीटर, सुवासरा २५ किलोमीटर, चौ महला २८ किलोमीटर,-तलावली २९ किलोमीटर है!

सड़क मार्ग से कैसे पहुँचें मन्दिर :

आप दिल्ली से अपनी कार, बाईक या बस से राष्ट्रीय राजमार्ग NH-४८ से ६८४ किलोमीटर की दूरी तय करके १३ घण्टे ३६ मिन्ट्स में पहुँच जाओगे मन्दिर!

शनि देव की जय है! जयघोष है!

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