श्री अरुणाचलेश्वर शिव मन्दिर तिरुवन्नामलाई, तमिलनाडु भाग : १६३ ,पँ० ज्ञानेश्वर हँस “देव” की क़लम से

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भारत के धार्मिक स्थल : श्री अरुणाचलेश्वर शिव मन्दिर तिरुवन्नामलाई, तमिलनाडु भाग :१६३

आपने पिछले भाग में पढा भारत के धार्मिक स्थल: होयसलेश्वर मन्दिर, हलेबिदु, कर्नाटक यदि आपसे उक्त लेख छूट गया अथवा रह गया हो और आपमें उक्त लेख पढ़ने की जिज्ञासा हो तो आप प्रजा टुडे की वेबसाईट पर जाकर धर्म-साहित्य पृष्ठ पर जाकर पढ़ सकते हैं!

आज हम आपके लिए लाए हैं : भारत के धार्मिक स्थल : श्री अरुणाचलेश्वर शिव मन्दिर तिरुवन्नामलाई, तमिलनाडु भाग :१६३

श्री अरुणाचलेश्वर शिवालय मन्दिर: विश्व भर में भगवान शिव का सबसे बड़ा मन्दिर, ‘पंच भूत स्थलों’ में एक, २१७ फुट ऊँचा ‘राज गोपुरा, तमिलनाडु के तिरुवन्नामलाई में स्थित श्री अरुणाचलेश्वर मंदिर तमिलनाडु के तिरुवन्नामलाई में स्थित श्री अरुणाचलेश्वर शिवालय भगवान शिवशँकर की पूजा भूतनाथ के रूप में भी की जाती है; भूतनाथ का अर्थ है ब्रह्मांड के पाँच तत्वों, पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश के स्वामी!

इन्हीं पँचतत्वों के स्वामी के रूप में भगवान शिव को समर्पित पाँच मन्दिरों की स्थापना दक्षिण भारत के पाँच शहरों में की गई है! ये शिवालय, भारत भर में स्थापित द्वादश ज्योतिर्लिंगों के समान ही पूजनीय हैं! इन्हें संयुक्त रूप से पँच महाभूत स्थल कहा जाता है!

तमिलनाडु के तिरुवन्नामलाई में अन्नामलाई की पहाड़ी स्थित श्री अरुणाचलेश्वर मन्दिर इन्हीं पँच भूत स्थलों में से एक है, जहाँ अग्नि रूप में भगवान शिव की पूजा होती है और यहाँ स्थापित शिवलिंग को अग्निलिंगम कहा जाता है!

श्री अरुणाचलेश्वर का पौराणिक इतिहास :

मन्दिर में भगवान शिव के अग्नि रूप में उत्पन्न होने का इतिहास युगों पुराना है! पौराणिक मान्यताओं के अनुसार एक बार जब माता पार्वती ने चँचलतापूर्वक भगवान शिव से अपने नेत्र बन्द करने के लिए कहा तो उन्होंने अपने नेत्र बन्द कर लिए और इस कारण पूरे ब्रह्मण्ड में कई हज़ारों वर्षों के लिए अँधकार छा गया! इस अँधकार को दूर करने के लिए भगवान शिव के भक्तों ने कड़ी तपस्या की, जिसके कारण महादेव अन्नामलाई की पहाड़ी पर एक अग्नि-स्तंभ के रूप में दिखाई दिए! इसी कारण यहाँ भगवान शिव की आराधना अरुणाचलेश्वर के रूप में की जाती है!

मन्दिर की स्थापना की सही तिथि के विषय में मतभेद है लेकिन मन्दिर में स्थापित प्रतिमाओं और अन्य पुरातात्विक अध्ययनों से अन्दाज़ा लगाया जाता है कि मन्दिर का निर्माण ७वीं शताब्दी में हुआ था, जिसका जीर्णोद्धार ९वीं शताब्दी में चोल राजाओं के द्वारा कराया गया! इसके अलावा पल्लव और विजयनगर साम्राज्य के राजाओं द्वारा भी मन्दिर में कराए गए निर्माण कार्य की जानकारी मिलती है! मन्दिर का इतिहास तमिल ग्रंथों थेवरम और थिरुवसागम में उपलब्ध है!

सँरचना एवं स्थापत्य कला :

भगवान शिवशँकर की उपासना को समर्पित यह श्री अरुणाचलेश्वर शिवालय, विश्व भर में भगवान शिव का सबसे बड़ा मन्दिर कहलाया है! लगभग २४ एकड़ क्षेत्रफल में अपने विस्तार के कारण यह भारत का आठवाँ सबसे बड़ा मन्दिर माना जाता है! मन्दिर के निर्माण के लिए ग्रेनाइट एवं अन्य कीमती पत्थरों का उपयोग किया गया है!

मंदिर परिसर में मुख्य मंदिर के अतिरिक्त 5 अन्य मंदिरों का निर्माण किया गया है। अन्नामलाई की पहाड़ी की तलहटी पर स्थित इस पूर्वाभिमुख मंदिर में चार प्रवेश द्वार हैं और यहाँ चार बड़े गोपुरम बनाए गए हैं, जिनमें से सबसे गोपुरम को ‘राज गोपुरा’ भी कहा जाता है, जिसकी ऊँचाई लगभग 217 फुट है और यह भारत का तीसरा सबसे बड़ा प्रवेश द्वार है।-श्री अरुणाचलेश्वर मंदिर में हजार स्तंभों का एक हॉल भी है, जिसका निर्माण विजयनगर साम्राज्य के राजा कृष्णदेव राय के द्वारा कराया गया। इस हॉल के इन सभी हजार स्तंभों में नायक वंश के शासकों के द्वारा नक्काशी कराई गई।

यह नक्काशी अद्भुत है और भारतीय स्थापत्य कला का बेजोड़ नमूना है, जो बहुत कम मंदिरों में देखने को मिलती है। मुख्य मंदिर तक पहुँचने के मार्ग में कुल 8 शिवलिंग स्थापित हैं। इंद्र, अग्निदेव, यम देव, निरुति, वरुण, वायु, कुबेर और ईशान देव द्वारा पूजा करते हुई आठ शिवलिंगों के दर्शन करना अत्यंत पवित्र माना गया है। मंदिर के गर्भगृह में 3 फुट ऊँचा शिवलिंग स्थापित है, जिसका आकार गोलाई लिए हुए चौकोर है। गर्भगृह में स्थापित शिवलिंग को लिंगोंत्भव कहा जाता है और यहाँ भगवान शिव अग्नि के रूप में विराजमान हैं, जिनके चरणों में भगवान विष्णु को वाराह और ब्रह्मा जी को हंस के रूप में बताया गया है।

प्रमुख त्यौहार ;

महाशिवरात्रि के अतिरिक्त श्री अरुणाचलेश्वर शिव मन्दिर का प्रमुख त्यौहार कार्तिक पूर्णिमा है! इसे मन्दिर में कार्तिक दीपम कहा जाता है, जो सदियों से मन्दिर में मनाया जा रहा है! इस दिन मन्दिर में विशाल दीपदान किया जाता है और हजारों की सँख्या में दीपक जलाए जाते हैं!

एक विशाल दीपक मंदिर की पहाड़ी पर प्रज्ज्वलित किया जाता है, जिसे ३ किलोमीटर की दूरी से भी देखा जा सकता है! इसके अलावा प्रत्येक पूर्णिमा को श्रद्धालु अन्नामलाई पर्वत की १५ किलोमीटर लम्बी परिक्रमा नँगे पैर करते हैं! इसे ‘गिरिवलम‘ के नाम से जाना जाता ह! इसके अलावा मंदिर में ब्रह्मोत्सवम और तिरुवूडल नाम के त्यौहार भी मनाए जाते हैं, जिनके दौरान मंदिर में कई तरह के अनुष्ठान संपन्न किए जाते हैं!

आदि शँकराचार्य द्वारा शिव स्तुति :

पशूनां पतिं पापनाशं परेशं गजेन्द्रस्य कृत्तिं वसानं वरेण्यम।
जटाजूटमध्ये स्फुरद्गाङ्गवारिं महादेवमेकं स्मरामि स्मरारिम।।
महेशं सुरेशं सुरारातिनाशं विभुं विश्वनाथं विभूत्यङ्गभूषम्।
विरूपाक्षमिन्द्वर्कवह्नित्रिनेत्रं सदानन्दमीडे प्रभुं पञ्चवक्त्रम्।।
गिरीशं गणेशं गले नीलवर्णं गवेन्द्राधिरूढं गुणातीतरूपम्।
भवं भास्वरं भस्मना भूषिताङ्गं भवानीकलत्रं भजे पञ्चवक्त्रम्।।
शिवाकान्त शंभो शशाङ्कार्धमौले महेशान शूलिञ्जटाजूटधारिन्।
त्वमेको जगद्व्यापको विश्वरूप: प्रसीद प्रसीद प्रभो पूर्णरूप।।
परात्मानमेकं जगद्बीजमाद्यं निरीहं निराकारमोंकारवेद्यम्।
यतो जायते पाल्यते येन विश्वं तमीशं भजे लीयते यत्र विश्वम्।।


न भूमिर्नं चापो न वह्निर्न वायुर्न चाकाशमास्ते न तन्द्रा न निद्रा।
न गृष्मो न शीतं न देशो न वेषो न यस्यास्ति मूर्तिस्त्रिमूर्तिं तमीड।
अजं शाश्वतं कारणं कारणानां शिवं केवलं भासकं भासकानाम्।
तुरीयं तम:पारमाद्यन्तहीनं प्रपद्ये परं पावनं द्वैतहीनम।।
नमस्ते नमस्ते विभो विश्वमूर्ते नमस्ते नमस्ते चिदानन्दमूर्ते।
नमस्ते नमस्ते तपोयोगगम्य नमस्ते नमस्ते श्रुतिज्ञानगम्।।
प्रभो शूलपाणे विभो विश्वनाथ महादेव शंभो महेश त्रिनेत्।
शिवाकान्त शान्त स्मरारे पुरारे त्वदन्यो वरेण्यो न मान्यो न गण्य:।।
शंभो महेश करुणामय शूलपाणे गौरीपते पशुपते पशुपाशनाशिन्।
काशीपते करुणया जगदेतदेक-स्त्वंहंसि पासि विदधासि महेश्वरोऽसि।।
त्वत्तो जगद्भवति देव भव स्मरारे त्वय्येव तिष्ठति जगन्मृड विश्वनाथ।
त्वय्येव गच्छति लयं जगदेतदीश लिङ्गात्मके हर चराचरविश्वरूपिन।।
इति श्रीमच्छंकराचार्यविरचितो वेदसारशिवस्तवः संपूर्णः ॥

वायु मार्ग से कैसे पहुँचें मन्दिर :

तिरुवन्नामलाई का निकटतम हवाईअड्डा चेन्नई में स्थित है, जो मन्दिर से लगभग १७५ किलोमीटर की दूरी पर स्थित है! अँतरराष्ट्रीय सभी प्रमुख राष्ट्रीय और अँतरराष्ट्रीय गन्तव्यों से लगातार उड़ानें यहाँ से उड़ान भरती हैं! आप कैब से आसानी से पहुँच जकते हो,श्री अरुणाचलेश्वर शिवालय!

रेल मार्ग से कैसे पहुँचें मन्दिर :

तिरुचिरापल्ली रेल मुख्यालय में स्थित तिरुवन्नामलाई रेलवे स्टेशन मन्दिर का निकटतम रेलवे स्टेशन है, जो श्री अरुणाचलेश्वर शिवालय श्री अरुणाचलेश्वर शिव मन्दिर से लगभग २किलोमीटर की दूरी पर स्थित है!

सड़क मार्ग से कैसे पहुँचें मन्दिर :

दिल्ली से आप बस या अपनी कार से राष्ट्रीय राजमार्ग NH-४५ से २,३०३.३ किलोमीटर की दूरी तय करके महज़ ४० घण्टे में पहुँच जाओगे श्रीअरुणाचलेश्वर शिवालय मन्दिर! सड़क मार्ग से तिरुवन्नामलाई पहुँचना सबसे आसान है क्योंकि यहाँ ८ ऐसी सड़के हैं, जो इसे तमिलनाडु के चेन्नई और विलुप्पुरम समेत बेंगलुरु, पुडुचेरी और मैंगलोर जैसे शहरों से जोड़ती हैं!

श्री अरुणाचलेश्वर शिव की जय हो! जयघोष हो!

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