श्री कनक दुर्गा मन्दिर विजयवाड़ा, आंध्रप्रदेश! भाग :१३७,पँ० ज्ञानेश्वर हँस देव की क़लम से

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भारत के धार्मिक स्थल: श्री कनक दुर्गा मन्दिर विजयवाड़ा, आंध्रप्रदेश! भाग :१३७

आपने पिछले भाग में पढ़ा : भारत के प्रसिद्ध धार्मिकस्थल: श्री शनिदेव धाम मन्दिर,कोकिलावन, कोसीकलां, उत्तरप्रदेश ! यदि आपसे यह लेख छूट गया हो और आपमें पढ़ने की जिज्ञासा हो तो आप प्रजा टुडे की की धर्म-सहित्य पृष्ठ पर जा कर उक्त लेख पढ़ सकते हैं!

भारत के धार्मिक स्थल: श्री कनक दुर्गा मन्दिर विजयवाड़ा, आंध्रप्रदेश! भाग: १३७

श्री कनक दुर्गा माता मन्दिर भारतवर्ष के राज्य आंध्रप्रदेश की माता श्री कनकदुर्गा मन्दिर से जुड़ी पौराणिक कथा है : राक्षसों ने अपने बल-प्रयोग द्वारा पृथ्वी पर तबाही मचा दी थी! तब राक्षसों को मारने के लिए माता पार्वती ने अलग-अलग रूप धारण किए! उन्होंने शुम्भ और निशुम्भ को मारने के लिए कौशिकी, महिषासुर के वध के लिए महिषासुरमर्दिनी व दुर्गमासुर के वध के लिए शाकम्भरी देवी के रूप धारण किए!

श्री कनक दुर्गा ने अपने श्रद्धालु कीलाणु को पर्वत बनकर स्थापित होने का आदेश दिया, ताकि वह वहाँ वास कर सकें! महिषासुर का वध करते हुए इन्द्रकिलाद्रि पर्वत पर माँ आठ हाथों में अस्त्रयुक्त हो शेर पर सवार हैं! पास की ही एक चट्टान पर ज्योतिर्लिंग के रूप में शिवशँकर भोलेनाथ भी शिवलिँग के रूप में स्थापित हैं!परमपिता ब्रह्माजी ने यहाँ शिवशँकर की बेला के पुष्पों से आराधना की थी! इसलिए यहाँ स्थापित आदि देव महादेव शिवशँकर का एक नाम मलेश्वर स्वामी पड़ गया!

श्री कनक दुर्गा मन्दिर आंध्रप्रदेश के विजयवाड़ा में स्थित देवी दुर्गा का प्रसिद्ध मन्दिर है! मन्दिर कृष्णा नदी के किनारे, इन्द्रकीलाद्री पहाड़ी पर स्थित है! कालिका पुराण, दुर्गा सप्तशती और अन्य वैदिक साहित्याँ में इन्द्रकीलाद्री पर देवी श्री कनक दुर्गा के बारे में उल्लेख किया गया है और उन्होंने त्रिदेव कल्प में देवी को स्वायँभू:, स्वयं प्रकटहोनेवाली बताया गया है! श्री कनक दुर्गा को देवी शाकम्भरी का रूप भी माना जाता है यहाँ शाकम्भरी उत्सव मनाया जाता है देश मे माँ शाकम्भरी का मुख्य मन्दिर उत्तर प्रदेश के सहारनपुर के निकट शिवालिक पर्वत श्रृंखला मे है शाकम्भरी देवी ही कनक दुर्गा के नाम से विजयवाड़ा मे विख्यात है! जिसका उल्लेख हम कल करेंगे!

यहाँ पर इन्द्रदेव शीष झुकाने आते हैं, इसलिए इस पर्वत का इन्द्रकीलाद्री पड़ गया! विशेष बात यह भी है कि देवता के बाईं ओर देवियों को स्थापित करने के बजाय यहाँ मलेश्वर देव की दाईं ओर माता स्थापित हैं!

कनकदुर्गा स्तुति :

ॐ कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगेन्द्रहारम् ।
सदा बसन्तं हृदयारविन्दे भवँ भवानीसहितं नमामि ।।
माया कुण्डलिनी क्रिया मधुमती, काली कला मालिनी ।
मातंगी विजया जया भगवती, देवी शिवा शम्भवी ।
शक्ति शंकर वल्लभा त्रिनयना, वाग्वाहिनी भैरवी ।
ओमकारा त्रिपुरा परार्मयि, भगवती माता कुमारेश्वरी ।।

देवी माँ की आरती :

ओम जय अंबे गौरी, मैया जय आनंद करणी।
तुमको निशदिन ध्यावत, मैयाजी को पल-पल सेवत हरि ब्रह्मा शिवरी ।।
ओम जय अंबे गौरी । १ ।

मांग सिन्दूर विराजत टीको मृगमद को, मैया टीको मृगमद को
उज्जवल है दो‌य नैना, निर्मल है दो‌य नैना चन्द्रवदन नीको ।।
ओम जय अंबे गौरी । २ ।

कनक समान कलेवर रक्ताम्बर राजै, मैया रक्ताम्बर राजै
रक्तपुष्प गल माला, लालपुष्प गल माला कण्ठन पर साजै ।।
ओम जय अंबे गौरी । ३ ।

कानो में कुण्डल शोभित, नासाग्रे मोती मैया नासाग्रे मोती
कोटिक चन्द्र दिवाकर, कोटिक चन्द्र दिवाकर झिगमिग से ज्योति ।।
ओम जय अंबे गौरी । ४ ।

केहरि वाहन शोभित, खड्ग खप्परधारी मैया खड्ग खप्परधारी
सुर-नर मुनि-जन ध्यावत, सुर-नर मुनि-जन सेवत जिनके दुखहारी ।।
ओम जय अंबे गौरी । ५ ।

दोय भुज चार चतुरभुज दस भुजते सोहे, मैया दस भुजते सोहे
मैयाजी का रूप निरखता, अंबाजी का रूप निरखता त्रिभुवन मन मोहे ।।
ओम जय अंबे गौरी । ६ ।

शुम्भ-निशुम्भ पछाडित महिषासुर घाती, मैया महिषासुर घाती
धूम्र विलोचन नैना, मधुर विलोचन नैना निशदिन मदमाती ।।
ओम जय अंबे गौरी । ७ ।

तुम ब्रहमाणी तुम रुद्राणी तुम कमला राणी, मैया तुम कमला राणी
आगमहि-निगम-बखाणी, आगमहि-निगम-बखाणी तुम शिव पटराणी ।।
ओम जय अंबे गौरी । ८ ।

चौंसठ योगिनी ध्यावत नृत्य करत भैरूं, मैया नृत्य करत भैरूं
बाजत ताल मृदंगा – बाजत ढोल मृदंगा और बाजत डमरु ।।
ओम जय अंबे गौरी । ९ ।

कंचन थाल विराजत, अगर कपूर बाती मैया अगर कपूर बाती
श्रीमालकेतु में राजत अंबे भवन में राजत कोटि रतन ज्योति ।।
ओम जय अंबे गौरी । १० ।

ओम जय अंबे गौरी, मैया जय आनंद करणी, मैया जय मंगल मूर्ति,
मैया जय शामा शक्ति, मैया जय संकट हरणी,
भय दुख भंजन हारी- भय दुख भंजन हारी रहे सद मतवाली ।।
ओम जय अंबे गौरी । ११ ।

श्री अंबाजी की आरती जो को‌ई नर गावै, ज्योरे मन शुद्ध होय जावे,
ज्योरे पाप परा जावे, ज्योरे सुख सम्पत्ति आवै, ज्योरे दुख दरिद्र जावे,
ज्योरे घर नवनिधि आवे, ज्योरे घर लक्ष्मी आवे, ज्योरे बंधन कट जावे,
भणत भोलानंद स्वामी, रटत शिवानन्द स्वामी, मन इच्छा फल पावे ।।
ओम जय अंबे गौरी । १२ ।

हवाई मार्ग से श्री कनकदुर्गा माता मन्दिर कैसे पहुँचें :

आप विजयवाड़ा अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे से कैब द्वारा पहुँच जाओगे २४.७ किलोमीटर की दूरी से श्री कनकदुर्गा मन्दिर!

रेल मार्ग से श्री कनकदुर्गा माता मन्दिर कैसे पहुँचें :

रेल से आप विजयवाड़ा रेलवे स्टेशन उतर कर आप बीस मिन्ट्स में कैब से ही आसानी से पहुँच जाओगे मन्दिर! विजयवाड़ा के केंद्र में स्थित यह मन्दिर रेलवे स्टेशन से दस किलोमीटर दूरी पर स्थित है!

सड़क मार्ग से श्री कनकदुर्गा माता मन्दिर कैसे पहुँचें :

दिल्ली से आप अपनी कार से अथवा बस से ३० घण्टे की यात्रा करके १८५०.३ किलोमीटर की दूरी से पहुँच जाओगे, श्री कनकदुर्गा मन्दिर!

श्री कनकदुर्गा माता की जय हो! जयघोष हो!!

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