श्री नाथ जी मन्दिर उदयपुर, राजस्थान भाग: ११०,पं० ज्ञानेश्वर हँस “देव” की कलम से

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भारत के धार्मिक स्थल: श्री नाथ जी मन्दिर उदयपुर, राजस्थान भाग: ११०

आपने पिछले भाग में पढ़ा : भारत के प्रसिद्ध धार्मिकस्थल :मुरुदेश्वर मन्दिर, मंगलूरु, कर्नाटक! यदि आपसे यह लेख छूट गया हो और आपमें पढ़ने की जिज्ञासा हो तो आप प्रजा टुडे की वेबसाइट पर धर्म-सहित्य पृष्ठ पर जा कर पढ़ सकते हैं! आज हम आपको बता रहे हैं:

भारत के धार्मिक स्थल: श्री नाथ जी मन्दिर उदयपुर, राजस्थान ! भाग: ११०

श्री नाथ जी श्री कृष्ण भगवान के ७ वर्ष की अवस्था के बाल रूप ही हैं! श्री नाथ जी भगवान श्री कृष्ण का एक ही मोहक रूप हैं, जो सात साल के बालक के रूप में प्रकट होते हैं! श्रीनाथजी का प्रमुख मन्दिर राजस्थान के उदयपुर शहर से ४९ किलोमीटर उत्तर-पूर्व में स्थित नाथद्वारा के मन्दिर शहर में स्थित है!

श्रीनाथजी वैष्णव सम्प्रदाय के केन्द्रीय पीठासीन देव हैं जिन्हें कृपामार्ग या वल्लभाचार्य द्वारा स्थापित वल्लभ सम्प्रदाय के रूप में जाना जाता है! नाथ द्वारा विराजित श्री नाथ जी वल्लभाचार्य के पुत्र विठ्ठलनाथ जी ने नाथद्वारा में श्री नाथ जी की पूजा को सँस्थागत रूप दिया! श्री नाथ जी की लोकप्रियता के कारण, नाथद्वारा शहर को ‘श्रीनाथजी’ के नाम से जाना जाता है!

लोग इसे बाबा की श्री नाथ जी बावा नगरी भी कहते हैं! प्रारम्भ में, बाल कृष्ण रूप को देव दमन (देवताओं का विजेता – कृष्ण द्वारा गोवर्धन पहाड़ी के उठाने में इंद्र की अति-शक्ति का उल्लेख) के रूप में संदर्भित किया गया था! वल्लभाचार्य ने उनका नाम गोपाल रखा और उनकी पूजा का स्थान ‘गोपालपुर’ रखा! बाद में, विट्ठलनाथजी ने उनका नाम श्रीनाथजी रखा! श्रीनाथजी की सेवा दिन के ८ भागों में की जाती है!

कृष्ण जी के अनुयायी बताते हैं कि स्वरूप का हाथ और चेहरा पहले गोवर्धन पहाड़ी से उभरा था और उसके बाद माधवेंद्र पुरी के आध्यात्मिक नेतृत्व में स्थानीय निवासियों यानी ब्रजवासियों ने गोपाल (कृष्ण) देवता की पूजा शुरू की! इन्हीं बाल गोपाल देवता को श्रीनाथजी कहा गया! इस प्रकार, माधवेन्द्र पुरी को गोवर्धन के पास गोपाल देवता की खोज के लिए मान्यता दी जाती है, जिसे बाद में वल्लभाचार्य द्वारा श्रीनाथजी के रूप में अनुकूलित और पूजा गया! प्रारंभ में, माधवेंद्र पुरी ने देवता के ऊपर उठे हुए हाथ और बाद में, चेहरे की पूजा की! पुष्टिमार्ग साहित्य के अनुसार, श्रीनाथजी ने श्री वल्लभाचार्य को हिंदू विक्रम संवत १५४९ में दर्शन दिए और वल्लभाचार्य को निर्देश दिया कि वे गोवर्धन पर्वत पर शुरू करें! वल्लभाचार्य ने उन देवता की पूजा के लिए व्यवस्था की, और इस परम्परा को उनके पुत्र विठ्ठलनाथजी ने आगे बढ़ाया!

श्री नाथ जी के दर्शनार्थ जो भी नवविहाहित भक्तजन आते हैं उनकी औलाद बहुत सुन्दर सुशील प्यारा नन्हें श्री नाथ जी की कृपा से मनवान्छित सन्तान प्राप्त होती है!

श्री नाथ जी मधुराष्टकं :

मीठे होंठ, मीठी आँखें, मीठी मुस्कान
हृदयं मधुरम गमनं मधुरम मधुराधिपते राखिलम मधुरम

शब्द मधुर हैं, पात्र मधुर हैं, शब्द मधुर हैं, शब्द मधुर हैं
चलितं मधुरम भ्रामितं मधुरम मधुराधिपते राखिलम मधुरम

वेणुरमाधुरो रेनूरमाधुर: पनिरमाधुर: पडौ मधुरौ
नृत्य मधुर, मधुर, मधुर, मधुर, मधुर, मधुर होते हैं

गीत मधुर हैं, मधुर मधुर हैं, मधुर मधुर हैं, मधुर मधुर हैं
रूपं मधुरं तिलकंम मधुराधिपते हिमम मधुरं

तैरने के लिए मीठा, तैरने के लिए मीठा, आनंद लेने के लिए मीठा
वमितं मधुरं शमितं मधुरं मधुराधिपते हिमीलं मधुरं

गुंजा मधुरा माला मधुरा यमुना मधुरा विची मधुरं
सलिलं मधुरं कमलं मधुरं मधुराधिपते बरकरारं मधुरं

हवाई मार्ग से कैसे पहुँचें श्री नाथ जी मन्दिर:

श्री नाथ जी मन्दिर,उदयपुर, राजस्थान, सबसे निकटतम हवाईअड्डा है : उदयपुर ह! यहां से कैब द्वारा आप ४५.४ किलोमीटर दूर ५५ मिन्ट्स से पहले ही पहुँच जाओगे!

रेलमार्ग से कैसे पहुँचें श्री नाथ जी मन्दिर:

श्री नाथ जी मन्दिर,उदयपुर, राजस्थान, सबसे निकटतम रेलपथ पर स्थित एक रेलवे स्टेशन मालवी जंक्शन है! रेल्वे स्टेशन से ४५.४ किलोमीटर दूर है! आप कैब द्वारा १ घण्टे से पहले पहुँच जाओगे!

सड़क मार्ग से कैसे पहुँचें श्री नाथ जी मन्दिर:

श्रीनाथजी मन्दिर दिल्ली से ५७५.६ किलोमीटर दूर है! आप से आसानी से ९ घण्टे ३० मिन्ट्स में राष्ट्रीय राजमार्ग NH ५८ द्वारा दिल्ली से श्री नाथ जी मन्दिर पहुँच जाओगे!

श्री नाथ जी की जय हो! जयघोष हो!!:

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