श्री रँग नाथ जी मन्दिर, वृन्दावन भाग: १०७,पं० ज्ञानेश्वर हँस “देव” की कलम से

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भारत के धार्मिक स्थल: श्री रँग नाथ जी मन्दिर, वृन्दावन भाग: १०७

आपने पिछले भाग में पढ़ा : भारत के प्रसिद्ध धार्मिकस्थल : श्री गोपेश्वर महादेव मन्दिर, वृन्दावन उत्तर प्रदेश! यदि आपसे यह लेख छूट गया हो और आपमें पढ़ने की जिज्ञासा हो तो आप प्रजा टुडे की वेबसाइट पर धर्म-सहित्य पृष्ठ पर जा कर पढ़ सकते हैं! आज हम आपको बता रहे हैं:

भारत के धार्मिक स्थल: श्री रँग नाथ जी मन्दिर, वृन्दावन भाग: १०७

रँगनाथ जी मन्दिर, भारतवर्ष के वृन्दावन, ज़िला मथुरा, उत्तर प्रदेश में स्थित है! यहाँ ब्रह्मोत्सव का आयोजन होता है! इस महोत्सव में भगवान श्री रँग नाथ जी का रथ वर्ष में केवल एक बार चैत्र माह में बाहर निकाला जाता है! भगवान जी का रथ लकड़ी का बना हुआ होता है और विशालकाय भी!-यह रथ वर्ष में केवल एक बार ‘ब्रह्मोत्सव’ के समय में चैत्र में बाहर निकाला जाता है! यह ब्रह्मोत्सव-मेला दस दिन तक लगता है!

श्री रँग नाथ जी मन्दिर अथवा रंगनाथ जी मन्दिर उत्तर प्रदेश के मथुरा ज़िले के वृन्दावन नगर में स्थित है! श्री सम्प्रदाय के सँस्थापक रामानुजाचार्य के विष्णु-स्वरूप भगवान रँगनाथ या रँगजी के नाम उक्त मन्दिर सेठ लखमीचन्द के भाई सेठ गोविन्द दास और राधावकृष्ण दास द्वारा निर्माण कराया गया था! उनके महान् गुरु सँस्कृत के उद्भट आचार्य स्वामी रँगाचार्य द्वारा दिये गये मद्रास के रँग नाथ मन्दिर की शैली के मान चित्र के आधार पर यह बना था! इसकी लागत पैंतालीस लाख रुपये आई थी! इसकी बाहरी दीवार की लम्बाई ७७३ फ़ुट और चौड़ाई ४४० फ़ुट है! मन्दिर के अतिरिक्त एक सुन्दर सरोवर और एक बाग़ भी अलग से इससे सँलग्न किया गया है! मन्दिर के द्वार का गोपुर काफ़ी ऊँचा है!

भगवान रँगनाथ के सामने साठ फ़ुट ऊँचा और लगभग बीस फ़ुट भूमि के भीतर धँसा हुआ ताम्बे का एक ध्वज स्तम्भ बनाया गया! इस अकेले स्तम्भ की लागत दस हज़ार रुपये आई थी! मन्दिर का मुख्य द्वार ९३ फ़ुट ऊँचे मण्डप से ढका हुआ है! यह मथुरा शैली का है! इससे थोड़ी दूर एक छत से ढका हुआ निर्मित भवन है, जिसमें भगवान जी का रथ रखा जाता है! यह लकड़ी का बना हुआ है और विशालकाय है! यह रथ वर्ष में केवल एक बार ब्रह्मोत्सव के समय चैत्र में बाहर निकाला जाता है! यह ब्रह्मोत्सव-मेला दस दिन तक लगता है! प्रतिदिन मन्दिर से भगवान रथ में जाते हैं! सड़क से चल कर रथ ६९० ग़ज़ रँग जी के बाग़ तक जाता है जहाँ स्वागत के लिए बना हुआ है!

इस जलूस के साथ संगीत, सुगन्ध सामग्री और मशालें रहती हैं! जिस दिन रथ प्रयोग में लाया जाता है, उस दिन अष्टधातु की मूर्ति रथ के मध्य स्थापित की जाती है! इसके दोनों ओर चौरधारी ब्राह्मण खड़े रहते हैं! भीड़ के साथ सेठ लोग भी जब-तब रथ के रस्से को पकड कर खींचतें हैं! लगभग ढ़ाई घन्टे के अन्तराल में काफ़ी ज़ोर लगाकर यह दूरी पार कर ली जाती है! अगामी दिन शाम की बेला में आतिशबाजी का शानदार प्रदर्शन किया जाता है! आसपास के दर्शनार्थियों की भीड़ भी इस अवसर पर एकत्र होती है! अन्य दिनों जब रथ प्रयोग में नहीं आता तो भगवान की यात्रा के लिए कई वाहन रहते हैं- कभी जड़ाऊ पालकी तो कभी पुण्य कोठी, तो कभी सिंहासन होता है! कभी कदम्ब तो कभी कल्पवृक्ष रहता है! कभी-कभी किसी उपदेवता को भी वाहन के रूप में प्रयोग किया जाता है१ जैसे- सूरज, गरुड़, हनुमान या शेषनाग! कभी घोड़ा, हाथी, सिंह, राजहंस या पौराणिक शरभ जैसे चतुष्पद भी प्रयोग में लाये जाते हैं!

गुग्गल के सौजन्य से प्राप्त हुआ: इस समारोह में लगभग पॉँच हज़ार रुपये की धनराशि व्यय की जाती है! वर्ष भर के रख-रखाव का व्यय सत्तावन हज़ार से कम नहीं होता! इसमें से तीस हज़ार की सबसे बड़ी मद तो भोग में ही ख़र्च होती है! भगवान के सामने रखा जाने वाला यह भोग पुजारियों द्वारा प्रयोग कर लिया जाता है या दान कर दिया जाता है! प्रतिदिन पाँच सौ श्री संम्प्रदाय अनुयायी वैष्णवों को जिमाया जाता है! प्रत्येक सवेरे दस बजे तक आटे का पात्र किसी भी प्रार्थना कर्त्ता को दे दिया जाता है! मन्दिर से ३३ गाँवों की जायदाद लगी हुई है! इससे एक लाख सत्रह हज़ार रुपये की आय होती है!

इसमें से शासन चौसठ हज़ार रुपये लेता है। इन तैंतीस गाँवों में से चौथाई वृन्दावन समेत तेरह गाँव मथुरा में पड़ते हैं और बीस आगरा ज़िले में! साल भर में भेंट चढ़ावा बीस हज़ार रुपये के लगभग मूल्य आता है, निधियों में लगाए गए धन से ग्यारह हज़ार आठ सौ रुपये का ब्याज मिलता है! सन् १८६८ में स्वामी ने पूरी जमींदारी एक प्रबंध समिति को हस्तान्तिरित कर दी थी! इसमें दो हज़ार रुपये की टिकटें लगीं थी! स्वामी के बाद श्री निवासाचार्य को नामज़द किया गया था, जो अपने पूर्वज की भाँति विद्वान् न होकर सामान्य जन की भाँति शिक्षित था! उसके दुराचरण के कारण व्यवस्था करने की आवश्यकता आ पड़ी! उसकी लम्पटता जगज़ाहिर और कुख्यात थी! उसकी फ़िज़ूलख़र्ची की कोई सीमा नहीं थी! अपने पिता के निधन के बाद वह कुछ गुज़ारा भत्ता पाता रहा!

मन्दिर की व्यवस्था-सेवा के लिए मद्रास से दूसरे गुरु लाये गये। जमींदारी पूरी तरह छ: सदस्यों की एक समिति के नियंत्रण में रही! इनमें से सबसे उत्साही सेठ नारायण दास थे१ सेठ को न्यासियों का मुख़्तार आम बनाया गया था! मन्दिर की बीस लाख की सम्पत्ति इसी सेठ के नाम कर दी गई! इस सुप्रबन्ध के बाद उत्सव समारोहों के आयोजनों में कोई गिरावट नहीं आने पाई और न दातव्यों की उदारता ही घटी बल्कि दफ़्तर के वैतनिक व्यय में भी कमी हुई! प्राभूत वाले गाँवों में से तीन गाँव महावन में और दो जलेसर में थे!

जयपुर नरेश मानसिंह ने रंगजी मन्दिर को ये दान किये थे! यद्यपि वह राज सिंहासन का वैधानिक उत्तराधिकारी था फिर भी वह उस पर कभी न बैठा! राजा पृथ्वीसिंह की रानी के गर्भ से वह उसके निधनोपरांत पैदा हुआ था! सन् १७७९ ई. में पृथ्वीसिंह की मृत्यु के बाद उनके भाई प्रताप सिंह ने उत्तराधिकार का दावा किया! दौलतराव सिंधिया ने इससे भतीजे मानसिंह का अधिकार रोक दिया! मान सिंह युवा राजकुमार था और साहित्य और धर्म के प्रति समर्पित था! तीस हज़ार रुपये वार्षिक आय के आश्वासन पर राजा की उपाधि त्यागकर वह वृन्दावन वास करने लगा! उसने कठिन धार्मिक नियमों के पालन में शेष जीवनकाल यहीं व्यतीत किया! सत्तर वर्ष की आयु में सन् १८४८ में उसका वहीं निधन हुआ! सत्ताईस वर्ष पर्यंत पालथी मारे एक ही मुद्रा में बैठा रहा! वह अपने आसन से नहीं उठता था! सप्ताह में बस एक बार ही प्राकृतिक विवशता वश आसन छोड़ता था। पाँच दिन पूर्व ही उसने अपने अन्त की भविष्यवाणी की थी और अपने बूढे सेवकों की देखभाल करने की प्रार्थना सेठ से की थी, उनमें से क्ष्मी नारायण व्यास नामक एक सेवक सन् १८७४ तक अपनी मृत्यु पर्यन्त मन्दिर की जमींदारी का प्रबन्धक बना रहा!

क्या है रँग नाथ मन्दिर खुलने का समय :

गर्मियों में: सुबह ५ बजे से ११ बजे तक और शाम को ३ बजे से ९ बजे तक! सर्दियों में: सुबह ६ बजे से १२ बजे दोपहर तकऔर शाम को ३ बजे और ८:३० बजे तक खुला रहता है!

हवाईमार्ग द्वारा रँग नाथ मन्दिर कैसे पहुंचें :

आगरा का हवाईअड्डा सबसे नज़दीकी हवाईअड्डा है, जो कि यहाँ से ७३ किलोमीटर की दूरी पर स्थित है! कैब के जरिए यहां १घण्टा २५ मिन्ट्स में आसानी से पहुँचा जा सकता है!

रेल मार्ग द्वारा रँग नाथ मन्दिर कैसे पहुंचें :

मथुरा रेलवेस्टेशन सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन है! यहाँ से ५ किलोमीटर ऑटो रिक्शा, बस तथा कैब द्वारा आसानी से पहुँचा जा सकता है!

सड़क मार्ग द्वारा रँग नाथ मन्दिर कैसे पहुंचें :

वृन्दावन मुख्य राजमार्गों से जुड़ा हुआ है और यहाँ बस या निजी वाहन से आसानी से पहुँचा जा सकता है! वृन्दावन यमुना एक्सप्रेस वे से जुड़ा हुआ है! दिल्ली से ३ घण्टे ३० मिन्ट्स में १८३ किलोमीटर की यात्रा करके पहुँचा जा सकता है!

श्री रँग नाथ की जय हो! जय घोष हो!

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