श्री शनिदेव धाम मन्दिर कोकिलावन कोसीकलां, उत्तरप्रदेश भाग: १३६,पँ० ज्ञानेश्वर हँस देव की क़लम से

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भारत के धार्मिक स्थल: श्री शनिदेव धाम मन्दिर कोकिलावन कोसीकलां, उत्तरप्रदेश भाग: १३६

आपने पिछले भाग में पढ़ा : भारत के प्रसिद्ध धार्मिकस्थल: श्री आद्या कात्यायनी पीठ मन्दिर, छत्तरपुर, नई दिल्ली ! यदि आपसे यह लेख छूट गया हो और आपमें पढ़ने की जिज्ञासा हो तो आप प्रजा टुडे की की धर्म-सहित्य पृष्ठ पर जा कर उक्त लेख पढ़ सकते हैं!

   भारत के धार्मिक स्थल: श्री शनिदेव धाम मन्दिर कोकिलावन कोसीकलां, उत्तरप्रदेश भाग: १३६

विश्व के प्राचीनतम शनि देव के मन्दिरों में से एक विशेष उत्तर प्रदेश में श्री कृष्‍ण के बृजमण्डल में है; शनिदेव का एक सिद्ध स्‍थान कोसीकलां गाँव के पास कोकिला वन के नाम से प्रसिद्ध है! यह कोसी से लगभग ६ किलोमीटर दूर है और नन्द गाँव से करीब २ किलोमीटर की दूरी पर है! यह शनिदेव मंदिर विश्व के प्राचीनतम शनिदेव मन्दिरों में से एक माना जाता है! यहाँ श्री शनि देव महाराज दण्ड देने की बजाय, इच्‍छित-वर देने की भूमिका में आ जाते हैं! मान्यतानुसार यहाँ मॉंगी हरमुराद शीघ्र पूरी होती है!

हम सपरिवार कार द्वारा दर्शनार्थ जा चुके हैं शनि धाम! मेरी ज्येष्ठ पुत्री सँस्कृति, मेरा पुत्र कार्तिकदेव शर्मा, मेरी पत्नी जया मेरे साथ जा चुके हैं व विधिवत पूजा अर्चना कर चुके हैं! मैंने ऐसा अनुभव किया है कि कोई भी अप्रूवल की चिट्ठी या चेक मुझे शनिवार को ही मिलता था! हम अगले शनिवार को पुनः शनि देव की प्रसिद्ध धरोहर शनि शिंगणापुर के बारे में अपना अनुभव बताएँगे!

एक बार शनिदेव जी को नन्द बाबा ने रोका, इस मन्दिर से जुड़ी एक अन्य कथानुसार कहते हैं कि भगवान श्री कृष्ण के समय से स्थापित इस मन्दिर को स्‍वयँ भगवान श्री कृष्ण के वरदान के बाद यहाँ कोसीकलां में स्‍थान मिला! इस कथा के अनुसार जब श्री कृष्‍ण-जन्‍म पर अन्‍य देवताओं सँग उनके बाल रूप के दर्शन के लिए अन्‍य देवताओं के साथ गए और शनिदेव को नन्द बाबा ने रोक दिया, क्‍योंकि वह उनकी वक्र दृष्‍टि से भयभीत थे!

तब दु:खी हृदय से शनिदेव को सांत्‍वना देने के लिए श्रीकृष्‍ण ने संदेश दिया कि वह नन्द गाँव के निकट वन में उनकी तपस्‍या करें, वे वहीं दर्शन देने प्रकट होंगे! तब शनिदेव ने इस स्‍थान कोसीकलां में तपस्या की और भगवान श्री कृष्‍ण ने कोयल रूप में उन्‍हें दर्शन दिए! इसीलिए इस स्‍थान का नाम कोकिलावन पड़ा! साथ ही श्री कृष्‍ण ने शनिदेव को आर्शीवाद दिया कि वे यहाँ विराजमान हों और इस स्‍थान पर जो उनके दर्शन करेगा उस पर शनि की दृष्‍टि वक्र नहीं होगी, बल्‍की उनकी इच्‍छापूर्ति होगी! श्री कृष्‍ण ने स्‍वयँ भी वहीं पास में राधारानी के साथ मौजूद रहने का वादा किया!

शनिदेव की कृपा मिलती है तब से शनिदेवधाम के बाईं ओर श्री कृष्‍ण, राधारानी जी के साथ विराजमान हैं और भक्त किसी भी प्रकार की परेशानी लेकर जब यहाँ आते हैं, तो उनकी इच्‍छा शनि पूरी करते हैं। मान्‍यता है कि यहाँ राजा दशरथ द्वारा लिखा शनिदेव-स्तोत्र पढ़ते हुए परिक्रमा करने से शनिदेव की सम्पूर्ण कृपा प्राप्त होती है! भक्तजन अक्सर श्री सूर्य कुण्ड में स्नान करके ही श्री शनिदेव धाम, कोकिलावन, कोसीकलां पूजाअर्चना करने जाते हैं! जहाँ शनि देव को प्रसन्न करने के लिए पास ही दुकानों से कील, तेल, लोहे का छल्ला अन्य सामग्री पुष्प दिया धूप सब मिल जाता है!

शनिदेव को पसंद हैं यह चीजें:

१ लोहे का छल्ला
शनि की पीड़ा समाप्त करने के लिए लोहे का छल्ला शनि देव पर चढ़ाएं एवँ स्वयँ धारण करें! शनि की पीड़ा समाप्त करने के लिए लोहे का छल्ला धारण किया जाता है. यह छल्ला अगर घोड़े की नाल या नाव की कील से बना हो तो ज़्यादा लाभकारी होता है! इस छल्ले को धारण करने के लिए जो अंगूठी बनाई जाती है, उसको आग में नहीं तपाया जाता! (लोहे के छल्ले को शनिवार को सरसों के तेल में थोड़ी देर रख दें! फिर जल से धोकर दाहिने हाथ की मध्यमा अँगुली में धारण करें! यदि आप को शनि के कारण शारीरिक पीड़ा है या दुर्घटनाओं के योग हैं तो इसको धारण करना बेहद शुभ होगा)

२.सरसों का तेल
शनिदेव के लिए सरसों के तेल का दान करना और प्रयोग करना काफी अनुकूल परिणाम देता है! अगर शनि के कारण चीज़ें रुक गयीं हों और जीवन में कोई सफलता नहीं मिल पा रही हो तो सरसों के तेल का विशेष प्रयोग शनिवार को करें
(शनिवार को प्रातः लोहे के पात्र में सरसों का तेल ले लें, उसमे एक सिक्का डालें, तेल में अपना चेहरा देखकर किसी निर्धन व्यक्ति को दान दें या पीपल के नीचे दिया जलाएँ!

३.काली उरद की दाल और काला तिल
शनिदेव को बहुत पसन्द हैं! धन की समस्याओं में काली उड़द की दाल या काले तिल का प्रयोग करें! (शनिवार को सायं काल सवा किलो काली उरद की दाल या काला तिल किसी निर्धन व्यक्ति को दान करें या डकौत को दें! कम से कम पांच शनिवार ये दान करें! दान करने के साथ ही साथ आपकी आर्थिक समस्याएँ समाप्त हो जायेंगी, थ अचूक टोटका है! जिस शनिवार को काली दाल या या काला तिल दान करें उस दिन स्वयं इसे बिल्कुल न खाएँ और न ही किसी परिवारजन को ही दें!

४. लोहे के बर्तन
जैसा तवा, कराही, चिमटा! शनि के लिए जो तमाम दान किये जाते हैं उनमे खाना बनाने के लोहे के बर्तन विशेष महत्व रखते हैं! (शनि अगर दुर्घटनाकारक हो तो खाना बनाने के लोहे के बर्तनों का दान करना चाहिए! शनिवार को शाम को किसी निर्धन व्यक्ति को तवा , कड़ॉही या लोहे के बर्तन दान करने से दुर्घटना के योग टल जाते हैं)

५. काले कपडे, और काले जूते
अगर स्वास्थ्य की गंभीर समस्या हो और बीमारी नहीं जा रही हो तो पहनने की काली चीजें दान करनी चाहिए!शनिवार को शाम को किसी निर्धन व्यक्ति को काले (कपडे और काले जूतों का दान करें! दान करने के बाद उस निर्धन व्यक्ति से आशीर्वाद लें , आपका स्वास्थ्य धीरे धीरे ठीक होने लगेगा!)

६. घोड़े की नाल
घोड़े की नाल का शनि के लिए अत्यंत महत्व होता है! परन्तु ध्यान रक्खें कि उसी घोड़े की नाल का शनि के लिए प्रयोग करें जो घोड़े के पैर में पहले लगी रही हो! एकदम नयी खरीदी गई, बिना इस्तेमाल की गई नाल कोई प्रभाव पैदा नहीं करती! (शुक्रवार को घोड़े की नाल ले आएँ , सरसों के तेल से धोकर शुद्ध कर लें! शनिवार को शाम को घर के मुख्य द्वार पर “यू” के आकार की तरह लगा दें! ऐसा करने से घर के सभी लोगों पर शनि की कृपा रहेगी, और घर में कलह क्लेश नहीं रहेगा!

राजा दशरथ कृत शनि स्तोत्र :

नम: कृष्णाय नीलाय शितिकण्ठ निभाय च ।
नम: कालाग्निरूपाय कृतान्ताय च वै नम: ॥१॥

नमो निर्मांस देहाय दीर्घश्मश्रुजटाय च ।
नमो विशालनेत्राय शुष्कोदर भयाकृते ॥२॥

नम: पुष्कलगात्राय स्थूलरोम्णेऽथ वै नम: ।
नमो दीर्घाय शुष्काय कालदंष्ट्र नमोऽस्तु ते ॥३॥

नमस्ते कोटराक्षाय दुर्नरीक्ष्याय वै नम: ।
नमो घोराय रौद्राय भीषणाय कपालिने ॥४॥

नमस्ते सर्वभक्षाय बलीमुख नमोऽस्तु ते ।
सूर्यपुत्र नमस्तेऽस्तु भास्करेऽभयदाय च ॥५॥

अधोदृष्टे: नमस्तेऽस्तु संवर्तक नमोऽस्तु ते ।
नमो मन्दगते तुभ्यं निस्त्रिंशाय नमोऽस्तुते ॥६॥

तपसा दग्ध-देहाय नित्यं योगरताय च ।
नमो नित्यं क्षुधार्ताय अतृप्ताय च वै नम: ॥७॥

ज्ञानचक्षुर्नमस्तेऽस्तु कश्यपात्मज-सूनवे ।
तुष्टो ददासि वै राज्यं रुष्टो हरसि तत्क्षणात् ॥८॥

देवासुरमनुष्याश्च सिद्ध-विद्याधरोरगा: ।
त्वया विलोकिता: सर्वे नाशं यान्ति समूलत: ॥९॥

प्रसाद कुरु मे सौरे ! वारदो भव भास्करे ।
एवं स्तुतस्तदा सौरिर्ग्रहराजो महाबल: ॥१०॥

दशरथ उवाच:
प्रसन्नो यदि मे सौरे ! वरं देहि ममेप्सितम् ।
अद्य प्रभृति-पिंगाक्ष! पीडा देया न कस्यचित्॥

शनि स्तोत्र हिन्दी पद्य रूपान्तरण :

हे श्याम – वर्ण वाले, हे नील -कण्ठ वाले।
कालाग्नि रूप – वाले, हल्के – शरीर वाले॥
स्वीकारो नमन – मेरे, शनि देव हम तुम्हारे।
सच्चे सुकर्म वाले हैं, मन से हो तुम हमारे॥
स्वीकारो नमन – मेरे। स्वीकारो भजन मेरे॥

हे दाढ़ी – मूछों वाले, लम्बी – जटायों पाले।
हे दीर्घ – नेत्र – वाले, शुष्कोदरा – निराले॥
भय आकृति तुम्हारी, सबपापियों को मारे।
स्वीकारो नमन -मेरे। स्वीकारो भजन मेरे॥

हे पुष्ट – देह – धारी, हो स्थूल – रोम वाले।
कोटर – सुनेत्र – वाले, हे बज्र – देह वाले॥
तुम ही सुयश दिलाते,सौभाग्य के सितारे।
स्वीकारो नमन मेरे। स्वीकारो भजन मेरे॥

हे घोर रौद्र रूपा, भीषण – कपालि भूपा।
हे नमन सर्वभक्षी बलिमुख शनी अनूपा॥
हे भक्तों के सहारे, शनि! सब हवाले तेरे।
हैं पूज्य चरण – तेरे। स्वीकारो नमन मेरे॥

हे सूर्यसुत तपस्वी, भास्कर के भयमनस्वी।
हे अधो दृष्टि वाले, हे विश्व – मय यशस्वी॥
विश्वासश्रद्धा अर्पित सबकुछ तूही निभाले।
स्वीकारो नमन – मेरे। “हे पूज्य – देव” मेरे॥

अतितेज खड्गधारी, हे मन्दगति सुप्यारी।
तप-दग्ध-देहधारी, नित योग/रत अपारी॥
संकट – विकट हटा दे, हे महा-तेज वाले।
स्वीकारो नमन -मेरे। स्वीकारो नमन मेरे॥

नितप्रियसुधामें रतहो, अतृप्ति में निरत हो।
होपूज्यतम जगत में,अत्यंतकरुणानत हो॥
हे ज्ञान -नेत्र वाले, “पावन – प्रकाश” वाले।
स्वीकारो नमन – मेरे। स्वीकारो नमन मेरे॥

जिस पर प्रसन्नदृष्टि, वैभव सुयश की वृष्टि।
वोजग का राज्य पाये, सम्राट तक कहाये॥
उत्तम स्वभाव वाले, तुमसे तिमिर उजाले।
स्वीकारो नमन – मेरे। स्वीकारो नमन मेरे॥

हो वक्र दृष्टि जिसपै, तत्क्षण विनष्ट होता।
मिटजाती राज्यसत्ता, होके भिखारीरोता॥
डूबे न भक्त – नैय्या – पतवार दे, बचा ले।
स्वीकारो नमन मेरे। स्वीकारो – नमन मेरे॥

हो मूलनाशउनका, दुर्बुद्धि होती जिनपर।
हो देवअसुरमानव, होसिद्ध या विद्याधर॥
देकर प्रसन्नता प्रभु अपने चरण लगा ले।
स्वीकारो नमन मेरे। स्वीकारो नमन मेरे॥

होकर प्रसन्न हे प्रभु! वरदान यही दीजै।
बजरंगभक्तजन को विश्व अभय कीजै॥
सारे ग्रहों के स्वामी अपना विरद बचाले।
ज्ञानेश्वर के हो प्यारे। हैं पूज्य चरण तेरे॥

हवाई मार्ग से शनिदेव मन्दिर कैसे पहुँचें :

आप पालम दिल्ली के इन्दिरगाँधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे से अथवा आगरा के हवाई अड्डे से कैब द्वारा पहुँच जाओगे श्री शनि धाम मन्दिर, कोकिलावन, कोसीकलां!!

रेल मार्ग से शनिदेव मन्दिर कैसे पहुँचें :

रेल से आप कोसीकलां उतर कर आप २९ मिन्ट्स में शेयर कैब, शेयर टेम्पो, ऑटो रिक्शा या पैदल ही आसानी से पहुँच जाओगे शनि मन्दिर!

सड़क मार्ग से शनिदेव मन्दिर कैसे पहुँचें :

मथुरा-दिल्ली नेशनल हाइवे जी टी रोड़ पर मथुरा से मात्र २१ किलोमीटर दूर कोसीकलां गाँव पड़ता है। यहाँ से एक रास्‍ता नन्दगाँव तक भी जाता है, वहीं से कोकिला वन प्रारम्भ हो जाता है!

श्री शनिदेव की जय हो! जयघोष हो!!

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