श्री विरुपाक्ष महादेव मन्दिर हम्पी, कर्नाटक! भाग : १५७,पँ० ज्ञानेश्वर हँस “देव” की क़लम से

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भारत के धार्मिक स्थल : श्री विरुपाक्ष महादेव मन्दिर हम्पी, कर्नाटक! भाग : १५७

आपने पिछले भाग में पढ़ा भारत के धार्मिक स्थल : श्री तन्नौट माता मन्दिर, जैसलमेर, राजस्थान! यदि आपसे उक्त लेख छूट गया अथवा रह गया हो तो आप प्रजा टुडे की वेब साईट पर जाकर धर्म साहित्य पृष्ठ पर जाकर पढ़ सकते हैं!

आज हम आपके लिए लाएँ हैं भारत के धार्मिक स्थल : श्री विरुपाक्ष मन्दिर हम्पी, कर्नाटक! भाग : १५७

विरूपाक्ष महादेव मन्दिर कर्नाटक राज्य के हम्पी में तुँगभद्रा नदी के किनारे पर स्थित एक पवित्र स्थान और ऐतिहासिक स्थल है! ७वीं शताब्दी के दौरान निर्मित किए गए इस मन्दिर के इतिहास और सुन्दर वास्तुकला के कारण इसे यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थल में शामिल किया गया! मन्दिर की दीवारों पर ७वीं शताब्दी की समृद्ध शिलालेख भी मौजूद हैं जो इसकी समृद्ध विरासत के प्रमाण को प्रस्तुत करते हैं! यह प्राचीन मंदिर भगवान् शिव के रूपों में से एक विरुपाक्ष=विरूप+अक्ष = विपरीत अक्ष वाले को समर्पित है जिसे “प्रसन्न विरुपाक्ष मन्दिर” के नाम से भी जाना जाता है! मन्दिर में मुख्य देवता महादेव के साथ साथ कई देवी-देवताओं की सुन्दर मूर्तियाँ भी हैं जो कलाकृतियों के माध्यम से कई देवी-देवताओं की पौराणिक कहानियों को दर्शाती हैं! इस मन्दिर का इतिहास प्रसिद्ध विजयनगर साम्राज्य से जुड़ा है! ५०० वर्ष पहले इस मन्दिर का गोपुरम बना था! ये मन्दिर द्रविड़ स्थापत्य शैली में बना हुआ है! तुँगभद्रा नदी के दक्षिणी किनारे पर हेम कूट पहाड़ी की तलहटी पर बने इस मन्दिर का गोपुरम ५० मीटर ऊंचा है! देवाधिदेव महादेव भगवान आशुतोष शिवशँकरजी के अतिरिक्त इस मन्दिर में भुवनेश्वरी और पम्पा की मूर्तियाँ भी बनी हुई हैं! इस मन्दिर के पास छोटे-छोटे और मन्दिर हैं जो कि अन्य देवी देवताओं को समर्पित हैं! विरुपाक्ष मन्दिर विक्रमादित्य द्वितीय की रानी लोकमाह देवी द्वारा बनवाया गया था! द्रविड़ स्थापत्य शैली में ये मन्दिर ईंट तथा चूने से बना है! इसे यूनेस्को की घोषित राष्ट्रीय धरोहरों में शामिल है!

मान्यतानुसार हम्पी ही रामायण काल का किष्किन्धा है! यहाँ भगवान शिव के विरुपाक्ष रूप की पूजा की जाती है! इस मन्दिर में स्थापित शिवलिंग की कहानी रावण और भगवान शिवजी से जुड़ी हुई है! इस मन्दिर की मुख्य विशेषता यहॉँ का शिवलिंग है जो दक्षिण की ओर झुका हुआ है! पौराणिक कथाओं के अनुसार रावण जब शिवजी के दिए हुए शिवलिंग को लेकर लँका जा रहा था तो यहाँ पर रुका था! उसने इस जगह एक बूढ़े आदमी को शिवलिंग पकड़ने के लिए दिया था! उस बूढ़े आदमी ने शिवलिंग को ज़मीन पर रख दिया, तब से वह शिवलिंग यहीं जम गया और लाख कोशिशों के बाद भी हिलाया नहीं जा सका! मन्दिर की दीवारों पर उस प्रसंग के चित्र बने हुए हैं जिसमें रावण शिव से पुनः शिवलिंग को उठाने की प्रार्थना कर रहे हैं और भगवान शिव इंकार कर देते हैं! यहाँ अर्ध सिंह और अर्ध मनुष्य की देह धारण किए नृसिंह की ६.७ मीटर ऊँची मूर्ति है! किवदन्ति है कि भगवान विष्णु ने इस जगह को अपने रहने के लिए कुछ अधिक ही बड़ा समझा और क्षीरसागर वापस लौट गए!

रावण रचित शिवताण्ड स्तोत्र हिन्दी अर्थ सहित;

रावण कृतं शिवताण्डव स्तोत्रं:

जटाटवीगलज्जलप्रवाह पावितस्थले गलेऽवलम्ब्यलम्बितां भुजंगतुंग मालिकाम्‌।
डमड्डमड्डमड्डमन्निनाद वड्डमर्वयं चकारचण्डताण्डवं तनोतु नःशिवशिवम्‌ ॥१॥

जटाकटा हसंभ्रम भ्रमन्निलिंपनिर्झरी विलोलवीचिवल्लरी विराजमानमूर्धनि।
धगद्धगद्धगज्ज्वल ल्ललाटपट्टपावके किशोरचंद्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम: ॥२॥

धराधरेंद्रनंदिनी विलासबन्धुबन्धुर स्फुरद्दिगंतसंतति प्रमोद मानमानसे।
कृपाकटाक्षधोरणी निरुद्धदुर्धरापदि क्वचिद्विगम्बरे मनोविनोदमेतु वस्तुनि ॥३॥

जटाभुजंगपिंगल स्फुरत्फणामणिप्रभा कदंबकुंकुमद्रव प्रलिप्तदिग्व धूमुखे।
मदांधसिंधु रस्फुरत्वगुत्तरीयमेदुरे मनोविनोदद्भुतं बिंभर्तुभूत भर्तरि ॥४॥

सहस्रलोचन प्रभृत्यशेषलेखशेखर प्रसूनधूलिधोरणी विधूसरां घ्रिपीठभूः।
भुजंगराजमालया निबद्धजाटजूटकः श्रियैचिरायजायतां चकोरबंधुशेखरः ॥५॥

ललाटचत्वरज्वल द्धनंजयस्फुलिंगभा निपीतपंच सायकंनम न्निलिंपनायकम्‌।
सुधामयूखलेखया विराजमानशेखरं महाकपालिसंपदे शिरोजटालमस्तुनः ॥६॥

करालभालपट्टिका धगद्धगद्धगज्ज्वल द्धनंजया धरीकृतप्रचंड पंचसायके।
धराधरेंद्रनंदिनी कुचाग्रचित्रपत्रकप्रकल्प नैकशिल्पिनी त्रिलोचनेरतिर्मम ॥७॥

नवीनमेघमंडली निरुद्धदुर्धरस्फुर त्कुहुनिशीथनीतमः प्रबद्धबद्धकन्धरः।
निलिम्पनिर्झरीधरस्तनोतु कृत्तिसिंधुरः कलानिधानबंधुरः श्रियं जगंद्धुरंधरः ॥८॥

प्रफुल्लनीलपंकज प्रपंचकालिमप्रभा विडंबि कंठकंध रारुचि प्रबंधकंधरम्‌।
स्मरच्छिदं पुरच्छिंद भवच्छिदं मखच्छिदं गजच्छिदांधकच्छिदं तमंतकच्छिदं भजे ॥९॥

अखर्वसर्वमंगला कलाकदम्बमंजरी रसप्रवाह माधुरी विजृंभणा मधुव्रतम्‌।
स्मरांतकं पुरातकं भावंतकं मखांतकं गजांतकांधकांतकं तमंतकांतकं भजे ॥१०॥

जयत्वदभ्रविभ्रम भ्रमद्भुजंगमस्फुरद्ध गद्धगद्विनिर्गमत्कराल भाल हव्यवाट्।
धिमिद्धिमिद्धि मिध्वनन्मृदंग तुंगमंगल ध्वनिक्रमप्रवर्तित: प्रचण्ड ताण्डवः शिवः ॥११॥

दृषद्विचित्रतल्पयो र्भुजंगमौक्तिकमस्र जोर्गरिष्ठरत्नलोष्ठयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः।
तृणारविंदचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः समं प्रवर्तयन्मनः कदा सदाशिवं भजे ॥१२॥

कदा निलिंपनिर्झरी निकुंजकोटरे वसन्‌ विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमंजलिं वहन्‌।
विमुक्तलोललोचनो ललामभाललग्नकः शिवेति मंत्रमुच्चरन्‌ कदा सुखी भवाम्यहम्‌ ॥१३॥

निलिम्प नाथनागरी कदम्ब मौलमल्लिका- निगुम्फनिर्भक्षरन्म धूष्णिकामनोहरः ।
तनोतु नो मनोमुदं विनोदिनींमहनिशं परिश्रय परं पदं तदंगजत्विषां चयः ॥१४॥

प्रचण्ड वाडवानल प्रभाशुभप्रचारणी महाष्टसिद्धिकामिनी जनावहूत जल्पना ।
विमुक्त वाम लोचनो विवाहकालिकध्वनिः शिवेति मन्त्रभूषगो जगज्जयाय जायताम्‌ ॥१५॥

इमं हि नित्यमेव मुक्तमुक्तमोत्तम स्तवं पठन्स्मरन्‌ ब्रुवन्नरो विशुद्धमेति संततम्‌।
हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नांयथा गतिं विमोहनं हि देहना तु शंकरस्य चिंतनम ॥१६॥

पूजाऽवसानसमये दशवक्रत्रगीतं यः शम्भूपूजनमिदं पठति प्रदोषे ।
तस्य स्थिरां रथगजेंद्रतुरंगयुक्तां लक्ष्मी सदैव सुमुखीं प्रददाति शम्भुः ॥१७॥

॥ इति शिवताण्डव स्तोत्रं संपूर्णम्‌॥

शिवताण्डव स्तोत्र हिन्दी रूपांतरण:

उनके बालों से बहने वाले जल से उनका कंठ पवित्र है और उनके गले में सांप है जो हार की तरह लटका है और डमरू से डमट् डमट् डमट् की ध्वनि निकल रही है, भगवान शिव शुभ तांडव नृत्य कर रहे हैं, वे हम सबको संपन्नता प्रदान करें!

मेरी शिव में गहरी रुचि है, जिनका सिर अलौकिक गंगा नदी की बहती लहरों की धाराओं से सुशोभित है, जो उनकी बालों की उलझी जटाओं की गहराई में उमड़ रही हैं? जिनके मस्तक की सतह पर चमकदार अग्नि प्रज्वलित है और जो अपने सिर पर अर्ध-चंद्र का आभूषण पहने हैं!

मेरा मन भगवान शिव में अपनी खुशी खोजे, अद्भुत ब्रह्माण्ड के सारे प्राणी जिनके मन में मौजूद हैं,जिनकी अर्धांगिनी पर्वतराज की पुत्री पार्वती हैं, जो अपनी करुणा दृष्टि से असाधारण आपदा को नियंत्रित करते हैं, जो सर्वत्र व्याप्त है और जो दिव्य लोकों को अपनी पोशाक की तरह धारण करते हैं!

मुझे भगवान शिव में अनोखा सुख मिले, जो सारे जीवन के रक्षक हैं, उनके रेंगते हुए सांप का फन लाल-भूरा है और मणि चमक रही है,;ये दिशाओं की देवियों के सुंदर चेहरों पर विभिन्न रंग बिखेर रहा है, जो विशाल मदमस्त हाथी की खाल से बने जगमगाते दुशाले से ढंका है!

भगवान शिव हमें संपन्नता दें, जिनका मुकुट चंद्रमा है, जिनके बाल लाल नाग के हार से बंधे हैं, जिनका पायदान फूलों की धूल के बहने से गहरे रंग का हो गया है,-जो इंद्र, विष्णु और अन्य देवताओं के सिर से गिरती है!

शिव के बालों की उलझी जटाओं से हम सिद्धि की दौलत प्राप्त करें, जिन्होंने कामदेव को अपने मस्तक पर जलने वाली अग्नि की चिनगारी से नष्ट किया था, जो सारे देव लोकों के स्वामियों द्वारा आदरणीय हैं, जो अर्ध-चंद्र से सुशोभित हैं!

मेरी रुचि भगवान शिव में है, जिनके तीन नेत्र हैं, जिन्होंने शक्तिशाली कामदेव को अग्नि को अर्पित कर दिया, उनके भीषण मस्तक की सतह डगद् डगद्… की घ्वनि से जलती है, वे ही एकमात्र कलाकार है जो पर्वत राज की पुत्री पार्वती के स्तन की नोक पर, सजावटी रेखाएं खींचने में निपुण हैं!

भगवान शिव हमें संपन्नता दें, वे ही पूरे संसार का भार उठाते हैं, जिनकी शोभा चंद्रमा है, जिनके पास अलौकिक गंगा नदी है, जिनकी गर्दन गला बादलों की पर्तों से ढंकी अमावस्या की अर्धरात्रि की तरह काली है!

मैं भगवान शिव की प्रार्थना करता हूं, जिनका कंठ मंदिरों की चमक से बंधा है, पूरे खिले नीले कमल के फूलों की गरिमा से लटकता हुआ, जो ब्रह्माण्ड की कालिमा सा दिखता है। जो कामदेव को मारने वाले हैं, जिन्होंने त्रिपुर का अंत किया, जिन्होंने सांसारिक जीवन के बंधनों को नष्ट किया, जिन्होंने बलि का अंत किया, जिन्होंने अंधक दैत्य का विनाश किया, जो हाथियों को मारने वाले हैं और जिन्होंने मृत्यु के देवता यम को पराजित किया!

मैं भगवान शिव की प्रार्थना करता हूं, जिनके चारों ओर मधुमक्खियां उड़ती रहती हैं, शुभ कदंब के फूलों के सुंदर गुच्छे से आने वाली शहद की मधुर सुगंध के कारण,
जो कामदेव को मारने वाले हैं, जिन्होंने त्रिपुर का अंत किया, जिन्होंने सांसारिक जीवन के बंधनों को नष्ट किया, जिन्होंने बलि का अंत किया, जिन्होंने अंधक दैत्य का विनाश किया, जो हाथियों को मारने वाले हैं और जिन्होंने मृत्यु के देवता यम को पराजित किया!

शिव, जिनका तांडव नृत्य नगाड़े की ढिमिड ढिमिड तेज़ आवाज़ श्रृंखला के साथ लय में है, जिनके महान मस्तक पर अग्नि है, वो अग्नि फैल रही है नाग की सांस के कारण, गरिमामय आकाश में गोल-गोल घूमती हुई!

मैं भगवान सदाशिव की पूजा कब कर सकूंगा, शाश्वत शुभ देवता, जो रखते हैं सम्राटों और लोगों के प्रति समभाव दृष्टि, घास के तिनके और कमल के प्रति, मित्रों और शत्रुओं के प्रति, सर्वाधिक मूल्यवान रत्न और धूल के ढेर के प्रति, सांप और हार के प्रति और विश्व में विभिन्न रूपों के प्रति?

मैं कब प्रसन्न हो सकता हूं, अलौकिक नदी गंगा के निकट गुफा में रहते हुए, अपने हाथों को हर समय बांधकर अपने सिर पर रखे हुए, अपने दूषित विचारों को धोकर दूर करके, शिव मंत्र को बोलते हुए, महान मस्तक और जीवंत नेत्रों वाले भगवान को समर्पित?

इस स्तोत्र को, जो भी पढ़ता है, याद करता है और सुनाता है, वह सदैव के लिए पवित्र हो जाता है और महान गुरु शिव की भक्ति पाता है! इस भक्ति के लिए कोई दूसरा मार्ग या उपाय नहीं है! बस शिव का विचार ही भ्रम को दूर कर देता है!

शिव के बालों से बहने वाले जल से उनका कंठ पवित्र है और उनके गले में सांप है जो हार की तरह लटका है और डमरू से डमट् डमट् डमट् की ध्वनि निकल रही है भगवान शिव शुभ तांडव नृत्य कर रहे हैं, वे हम सबको संपन्नता प्रदान करें!

मेरी शिव में गहरी रुचि है, जिनका सिर अलौकिक गंगा नदी की बहती लहरों की धाराओं से सुशोभित है, जो उनकी बालों की उलझी जटाओं की गहराई में उमड़ रही हैं? जिनके मस्तक की सतह पर चमकदार अग्नि प्रज्वलित है और जो अपने सिर पर अर्ध-चंद्र का आभूषण पहने हैं!

मेरा मन भगवान शिव में अपनी खुशी खोजे, अद्भुत ब्रह्माण्ड के सारे प्राणी जिनके मन में मौजूद हैं, जिनकी अर्धांगिनी पर्वतराज की पुत्री पार्वती हैं, जो अपनी करुणा दृष्टि से असाधारण आपदा को नियंत्रित करते हैं, जो सर्वत्र व्याप्त है और जो दिव्य लोकों को अपनी पोशाक की तरह धारण करते हैं!

मुझे भगवान शिव में अनोखा सुख मिले, जो सारे जीवन के रक्षक हैं, उनके रेंगते हुए सांप का फन लाल-भूरा है और मणि चमक रही है,;ये दिशाओं की देवियों के सुंदर चेहरों पर विभिन्न रंग बिखेर रहा है, जो विशाल मदमस्त हाथी की खाल से बने जगमगाते दुशाले से ढंका है!

भगवान शिव हमें संपन्नता दें, जिनका मुकुट चंद्रमा है, जिनके बाल लाल नाग के हार से बंधे हैं, जिनका पायदान फूलों की धूल के बहने से गहरे रंग का हो गया है,-जो इंद्र, विष्णु और अन्य देवताओं के सिर से गिरती है!

शिव के बालों की उलझी जटाओं से हम सिद्धि की दौलत प्राप्त करें, जिन्होंने कामदेव को अपने मस्तक पर जलने वाली अग्नि की चिनगारी से नष्ट किया था, जो सारे देव लोकों के स्वामियों द्वारा आदरणीय हैं, जो अर्ध-चंद्र से सुशोभित हैं!

मेरी रुचि भगवान शिव में है, जिनके तीन नेत्र हैं, जिन्होंने शक्तिशाली कामदेव को अग्नि को अर्पित कर दिया, उनके भीषण मस्तक की सतह डगद् डगद्… की घ्वनि से जलती है, वे ही एकमात्र कलाकार है जो पर्वतराज की पुत्री पार्वती के स्तन की नोक पर, सजावटी रेखाएं खींचने में निपुण हैं!

भगवान शिव हमें संपन्नता दें, वे ही पूरे संसार का भार उठाते हैं, जिनकी शोभा चंद्रमा है, जिनके पास अलौकिक गंगा नदी है, जिनकी गर्दन गला बादलों की पर्तों से ढंकी अमावस्या की अर्धरात्रि की तरह काली है!

मैं भगवान शिव की प्रार्थना करता हूं, जिनका कंठ मंदिरों की चमक से बंधा है, पूरे खिले नीले कमल के फूलों की गरिमा से लटकता हुआ, जो ब्रह्माण्ड की कालिमा सा दिखता है। जो कामदेव को मारने वाले हैं, जिन्होंने त्रिपुर का अंत किया, जिन्होंने सांसारिक जीवन के बंधनों को नष्ट किया, जिन्होंने बलि का अंत किया, जिन्होंने अंधक दैत्य का विनाश किया, जो हाथियों को मारने वाले हैं और जिन्होंने मृत्यु के देवता यम को पराजित किया!

मैं भगवान शिव की प्रार्थना करता हूं, जिनके चारों ओर मधुमक्खियां उड़ती रहती हैं, शुभ कदंब के फूलों के सुंदर गुच्छे से आने वाली शहद की मधुर सुगंध के कारण,
जो कामदेव को मारने वाले हैं, जिन्होंने त्रिपुर का अंत किया, जिन्होंने सांसारिक जीवन के बंधनों को नष्ट किया, जिन्होंने बलि का अंत किया, जिन्होंने अंधक दैत्य का विनाश किया, जो हाथियों को मारने वाले हैं और जिन्होंने मृत्यु के देवता यम को पराजित किया!

शिव, जिनका ताण्डव नृत्य नगाड़े की ढिमिड ढिमिड तेज़ आवाज़ श्रंखला के साथ लय में है, जिनके महान मस्तक पर अग्नि है, वो अग्नि फैल रही है नाग की सांस के कारण, गरिमामय आकाश में गोल-गोल घूमती हुई।

मैं भगवान सदाशिव की पूजा कब कर सकूंगा, शाश्वत शुभ देवता, जो रखते हैं सम्राटों और लोगों के प्रति समभाव दृष्टि, घास के तिनके और कमल के प्रति, मित्रों और शत्रुओं के प्रति, सर्वाधिक मूल्यवान रत्न और धूल के ढेर के प्रति, सांप और हार के प्रति और विश्व में विभिन्न रूपों के प्रति?

मैं कब प्रसन्न हो सकता हूं, अलौकिक नदी गंगा के निकट गुफा में रहते हुए, अपने हाथों को हर समय बांधकर अपने सिर पर रखे हुए, अपने दूषित विचारों को धोकर दूर करके, शिव मंत्र को बोलते हुए, महान मस्तक और जीवंत नेत्रों वाले भगवान को समर्पित?

इस स्तोत्र को, जो भी पढ़ता है, याद करता है और सुनाता है, वह सदैव के लिए पवित्र हो जाता है और महान गुरु शिव की भक्ति पाता है! इस भक्ति के लिए कोई दूसरा मार्ग या उपाय नहीं है! बस शिव का विचार ही भ्रम को दूर कर देता है! रावण कृत शिवताण्डव स्तोत्र पठित्वा

हवाईजहाज़ से दिल्ली से हम्पी कैसे पहुँचें:

नई दिल्ली और हम्पी के बीच उड़ान का कोई सीधा रास्ता नहीं है! आप नई दिल्ली से बैंगलोर/हैदराबाद/मैंगलोर के लिए फ्लाइट ले कते हैं और फिर वहां से हम्पी के लिए निजी कैब ले सकते हैं! मन्दिर तक अवधि १० घण्टे ५५मिन्ट्स है! नई दिल्ली से बंगलौर लगभग २१३२ किलोमीटर (उड़ान द्वारा यात्रा) हुबली हवाई अड्डा, लगभग १६६ किमी दूर, हम्पी का निकटतम घरेलू हवाई अड्डा है, जो बैंगलोर से नियमित उड़ानें संचालित करता है! बेलगाम हवाई अड्डा एक अन्य प्रमुख घरेलू हवाई अड्डा है, जो हम्पिक से लगभग २७० किलोमीटर दूर स्थित है!

हवाईजहाज से नेदुंबस्सेरी में कोच्चि अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा कोच्चि शहर के केंद्र से लगभग ३० किलोमीटर दूर है! हवाई अड्डा हाल ही में पूरी तरह से सौर ऊर्जा से संचालित होने वाला दुनिया का पहला हवाई अड्डा बन गया है! इसके अलावा, यह अंतरराष्ट्रीय यात्री यातायात के मामले में भारत के सबसे व्यस्त हवाई अड्डों में से एक है! हवाई अड्डे में तीन सुव्यवस्थित टर्मिनल हैं, अर्थात् घरेलू, अंतर्राष्ट्रीय और कार्गो, जो एयर इंडिया, एयर इंडिया एक्सप्रेस, इंडिगो, जेट एयरवेज, स्पाइसजेट, श्रीलंकाई एयरलाइंस, गल्फ एयर और एयर अरबिया जैसे प्रमुख राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय वाहकों की सेवा करते हैं!

समुद्र मार्ग से कैसे पहुँचें मन्दिर :

यात्री गोवा, मुंबई, कोलंबो और माले जैसे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय शहरों से समुद्री मार्ग से भी कोच्चि पहुंच सकते हैं। इन स्थानों से याच और क्रूज जहाज नियमित रूप से उपलब्ध होते हैं। इसके अलावा, कोट्टायम, कुमारकोम और एलेप्पी जैसे शहरों से कोच्चि के लिए नियमित नावें भी उपलब्ध हैं।

रेल मार्ग से कैसे पहुँचें मन्दिर :

एर्नाकुलम जंक्शन देश के सभी प्रमुख रेलवे स्टेशनों से अच्छी तरह जुड़ा हुआ है! दिल्ली, बैंगलोर, मैंगलोर, चेन्नई, मुंबई और त्रिवेंद्रम जैसे शहरों से कोच्चि के लिए नियमित ट्रेनें हैं! रेलवे स्टेशन के बाहर से यात्री कोच्चि में कहीं भी पहुंचने के लिए बस और टैक्सी सेवाओं का लाभ उठा सकते हैं!

सड़क मार्ग से कैसे पहुँचें मन्दिर :

दिल्ली से हम्पी, मन्दिर तक आप बस या अपनी कार द्वारा ३३ घण्टे में १,८९४.९ किलोमीटर की यात्रा तय करके राष्टीय राजमार्ग NH-५२ से पहुँच सकते हैं! केरल राज्य सड़क परिवहन निगम (केएसआरटीसी) कोच्चि को तमिलनाडु और कर्नाटक के कुछ प्रमुख शहरों के साथ केरल के प्रमुख स्थलों से जोड़ता है! कोच्चि से हैदराबाद, मैंगलोर, मुंबई, त्रिवेंद्रम, चेन्नई और बैंगलोर जैसे शहरों के लिए कई वातानुकूलित, वोल्वो और डीलक्स बसें उपलब्ध हैं! सुव्यवस्थित NH-१७ कोच्चि को मुंबई और NH-४७ को त्रिवेंद्रम से जोड़ता है!

शिव शँकर महादेव की जय हो! जयघोष हो!

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