श्याम बाबा मन्दिर, खाटू, राजस्थान भाग: ११२, पं० ज्ञानेश्वर हँस “देव” की कलम से

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भारत के धार्मिक स्थल: श्याम बाबा मन्दिर, खाटू, राजस्थान भाग: ११२

आपने पिछले भाग में पढ़ा : भारत के प्रसिद्ध धार्मिकस्थल:भारत के धार्मिक स्थल: ब्रह्मा मन्दिर, पुष्कर, राजस्थान! यदि आपसे यह लेख छूट गया हो और आपमें पढ़ने की जिज्ञासा हो तो आप प्रजा टुडे की वेबसाइट धर्म-सहित्य पृष्ठ पर जा कर पढ़ सकते हैं! आज हम आपको बता रहे हैं:भारत के धार्मिक स्थल: श्याम बाबा मन्दिर, खाटू, राजस्थान भाग: ११२

हिन्दू धर्म के अनुसार, श्री खाटू श्याम जी ने द्वापर युग में श्री कृष्ण भगवान जी से वर प्राप्त किया कि वे कलयुग में उनके नाम से, श्याम के नाम से पूजे जाएँ! भगवान श्री कृष्ण बर्बरीक के महान बलिदान से काफ़ी प्रसन्न थे उन्होंने वरदान दिया कि जैसे-जैसे कलियुग का अवतरण होगा,आप श्री श्याम जी के नाम से ही पूजे जाओगे!तुम्हारे भक्तों का केवल तुम्हारे नाम का सच्चे दिल से उच्चारण मात्र से ही उद्धार होगा! यदि वे तुम्हारी सच्चे मन और प्रेम-भाव से पूजा करेंगे तो उनकी सभी मनोकामना पूर्ण होगी और सभी कार्य सफ़ल होंगे!

जैसा मैंने पिछले लेख में बताया था कि हम एडवोकेट श्री श्री पाल शर्मा, एडवोकेट प्रमोद कौशिक और गणेश दास मेहरा जी सँग हम दिल्ली द्वारका से कार द्वारा जा पहुँचे खाटू श्याम बाबा जी के दरबार! बाबा के अनुपम पावन पुनीत दर्शन हुए!

हमने मेरे पुत्र सम शिष्य पीयूष पवन गोयल के कहने से साईँ भजन लिखे व गवाए मेरे सँगीतकर गायक मित्र मोहम्मद नौशाद मलिक सहारनपुरी जिनकी आवाज़ मोहम्मद रफ़ी से हूबहू मिलती है! एडवोकेट एस० पी० शर्मा की आप बीती भी रिकॉर्ड की, क्योंकि एडवोकेट एस० पी० शर्मा प्रतिमाह खाटू श्याम जी जाया करते थे! उन्होंने अपने इकलौते पुत्र का नामभी श्याम रखा है, बाबा की कृपा से वह भी प्रतिष्ठित वकील है!

श्री श्याम बाबा की अपूर्व कथा मध्यकालीन महाभारत से ही आरम्भ होती है! वह बर्बरीक के नाम से जाने जाते थे, वे अति बलशाली गदा-धारी भीम के पुत्र घटोत्कच और दैत्य मूर की पुत्री मोरवी के पुत्र हैं! बाल्यकाल से ही वे बहुत वीर और महान योद्धा थे! उन्होंने युद्ध कला अपनी माँ तथा भगवान श्री कृष्ण से सीखी! नव दुर्गा की घोर तपस्या करके उन्हें प्रसन्न किया और माँ दुर्गा से तीन अमोघ बाण प्राप्त किये! इस प्रकार तीन बाणधारी के नाम से प्रसिद्ध नाम प्राप्त किया! अग्निदेव ने प्रसन्न होकर उन्हें धनुष प्रदान किया, जो उन्हें तीनों लोकों में विजयी बनाने में समर्थ था!

महाभारत का युद्ध कौरवों और पाण्डवों के मध्य अपरिहार्य हो गया, यह समाचार बर्बरीक को प्राप्त हुए तो उनकी भी युद्ध में सम्मिलित होने की इच्छा जागृत हुई। जब वे अपनी माँ से आशीर्वाद प्राप्त करने पहुँचे तब माँ को हारे हुए पक्ष का साथ देने का वचन दिया! वे अपने नीले रँग के घोड़े पर सवार होकर तीन बाण और धनुष के साथ कुरूक्षेत्र की रणभूमि की ओर चल पड़े!

सर्वव्यापी भगवान श्री कृष्णजी ने ब्राह्मण वेष धारण कर बर्बरीक के बारे में जानने के लिए उन्हें रोका और यह जानकर उनकी हँसी उड़ायी कि वह मात्र तीन बाण से युद्ध में सम्मिलित होने आए! ऐसा सुनकर बर्बरीक ने उत्तर दिया कि मात्र एक बाण शत्रु सेना को परास्त करने के लिए पर्याप्त है और ऐसा करने के बाद बाण वापस तूणीर में ही आएगा! यदि तीनों बाणों को प्रयोग में लिया गया तो पूरे ब्रह्माण्ड का विनाश हो जाएगा!

यह जानकर भगवान् श्री कृष्ण जी ने उन्हें चुनौती दी की इस वृक्ष के सभी पत्तों को भेदकर दिखाओ; वे दोनों पीपल के वृक्ष के नीचे खड़े थे! बर्बरीक ने चुनौती स्वीकार की और अपने तूणीर से एक बाण निकाला और ईश्वर को स्मरण कर बाण पेड़ के पत्तों की ओर चलाया। बाण ने क्षण भर में पेड़ के सभी पत्तों को भेद दिया और श्री कृष्ण के पैर के इर्द-गिर्द चक्कर लगाने लगा, क्योंकि एक पत्ता उन्होंने अपने पैर के नीचे छुपा लिया था!

बर्बरीक ने कहा कि आप अपने पैर को हटा लीजिए अन्यथा ये बाण आपके पैर को भी भेद देगा! तत्पश्चात, श्री कृष्ण ने बालक बर्बरीक से पूछा कि वह युद्ध में किस ओर से सम्मिलित होगा; बर्बरीक ने अपनी माँ को दिये वचन को दोहराया और कहा युद्ध में जो पक्ष निर्बल और हार रहा होगा उसी को अपना साथ देगा! श्री कृष्ण जानते थे कि युद्ध में हार तो कौरवों की निश्चित है और इस कारण अगर बर्बरीक ने उनका साथ दिया तो परिणाम गलत पक्ष में चला जाएगा!

अत: ब्राह्मणरूपी श्री कृष्ण ने वीर बर्बरीक से दान की अभिलाषा व्यक्त की! बर्बरीक ने उन्हें वचन दिया और दान माँगने को कहा! ब्राह्मण ने उनसे शीश का दान माँगा! वीर बर्बरीक क्षण भर के लिए अचम्भित हुए, परन्तु अपने वचन से अडिग नहीं हो सकते थे! वीर बर्बरीक बोले एक साधारण ब्राह्मण इस तरह का दान नहीं माँग सकता है, अत: ब्राह्मण से अपने वास्तिवक रूप से अवगत कराने की प्रार्थना की!

ब्राह्मणरूपी श्री कृष्ण अपने वास्तविक रूप में आ गये!श्री कृष्ण ने बर्बरीक को शीश दान माँगने का कारण समझाया कि युद्ध आरम्भ होने से पूर्व युद्धभूमि पूजन के लिए तीनों लोकों में सर्वश्रेष्ठ क्षत्रिय के शीश की आहुति देनी होती है; इसलिए ऐसा करने के लिए वे विवश थे! बर्बरीक ने उनसे प्रार्थना की कि वे अन्त तक युद्ध देखना चाहते हैं! श्री कृष्ण ने उनकी यह प्रार्थना स्वीकार कर ली!

श्री कृष्ण इस बलिदान से प्रसन्न होकर बर्बरीक को युद्ध में सर्वश्रेष्ठ वीर की उपाधि से अलंकृत किया! उनके शीश को युद्धभूमि के समीप ही एक पहाड़ी पर सुशोभित किया गया! जहाँ से बर्बरीक सम्पूर्ण युद्ध का जायजा ले सकते थे! फाल्गुन माह की द्वादशी को उन्होंने अपने शीश का दान दिया था इस प्रकार वे शीश के दानी कहलाये!महाभारत युद्ध की समाप्ति पर पाण्डवों में ही आपसी विवाद होने लगा कि युद्ध में विजय का श्रेय किसको जाता है? श्री कृष्ण ने उनसे कहा बर्बरीक का शीश सम्पूर्ण युद्ध का साक्षी है, अत: उससे बेहतर निर्णायक भला कौन हो सकता है?

सभी इस बात से सहमत हो गये और पहाड़ी की ओर चल पड़े, वहाँ पहुँचकर बर्बरीक के शीश ने उत्तर दिया कि श्री कृष्ण ही युद्ध में विजय प्राप्त कराने में सबसे महान पात्र हैं, उनकी शिक्षा, उपस्थिति, युद्धनीति ही निर्णायक थी! उन्हें युद्धभूमि में सिर्फ उनका सुदर्शन चक्र घूमता हुआ दिखायी दे रहा था जो शत्रु सेना को काट रहा था! महाकाली, कृष्ण के आदेश पर शत्रु सेना के रक्त से भरे प्यालों का सेवन कर रही थीं!

श्री कृष्ण वीर बर्बरीक के महान बलिदान से काफी प्रसन्न हुए और वरदान दिया कि कलियुग में तुम श्री श्याम जी के नाम से जाने जाओगे! क्योंकि उस युग में हारे हुए का साथ देने वाला ही श्याम नाम धारण करने में समर्थ है!उनका शीश खाटू राजस्थान राज्य के सीकर ज़िले में दफ़नाया गया इसलिए, उन्हें खाटू श्याम बाबा कहा जाता है! एक गाय उस स्थान पर आकर प्रतिदिन अपने स्तनों से दुग्ध की धारा स्वतः ही बहा रही थी!

बाद में खुदाई के बाद वह शीश प्रकट हुआ, जिसे कुछ दिनों के लिए एक ब्राह्मण को सूपुर्द कर दिया गया! एक बार खाटू नगर के राजा को स्वप्न में मन्दिर निर्माण के लिए और वह शीश मन्दिर में सुशोभित करने के लिए प्रेरित किया गया! तदन्तर उस स्थान पर मन्दिर का निर्माण किया गया और कार्तिक माह की एकादशी को शीश मन्दिर में सुशोभित किया गया, जिसे बाबा श्याम के जन्मदिन के रूप में मनाया जाता है।

मूल मन्दिर १०२७ ईस्वी में रूपसिंह चौहान और उनकी पत्नी नर्मदा कँवर द्वारा बनाया गया था! मारवाड़ के शासक ठाकुर के दीवान अभय सिंह ने ठाकुर के निर्देश पर १७२० ईस्वी में मन्दिर का जीर्णोद्धार कराया! मन्दिर इस समय अपने वर्तमान आकार ले लिया और मूर्ति गर्भगृह में प्रतिस्थापित किया गया था! मूर्ति दुर्लभ पत्थर से बना है! खाटूश्याम, परिवारों की एक बड़ी संख्या के कुलदेवता है! बर्बरीक दुर्गा देवी का उपासक हैं! देवी के वरदान से उन्हेँ तीन दिव्य बाण प्राप्त हुए थे जो अपने लक्ष्य को भेदकर वापस लौट आते थे! इनकी वजह से बर्बरीक अजेय हो गया था!

खाटूश्याम जी के चमत्कार

भक्तों की इस मन्दिर में इतनी आस्था है कि वह अपने सुखों का श्रेय उन्हीं को देते हैं! भक्त बताते हैं कि बाबा खाटू श्याम सभी की मुरादें पूरी करते हैं! खाटूधाम में आस लगाने वालों की झोली बाबा खाली नहीं रखते हैं!मान्यतानुसार कहते हैं हारे का सहारा खाटू श्याम हमारा! जो भी कलयुग में श्री खाटू शयम जी का ध्यान धरेगा, बाबा श्याम पल भर में उस सच्चे श्रद्धालु भक्त के सँकट हर लेते हैं!

महिमा खाटूश्याम की
“कलयुग” में है महान
जो खाटू श्याम सिमरे
हो उसका “कल्याण”!

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हवाई मार्ग से कैसे पहुँचें श्याम मन्दिर खाटू :

श्याम बाबा मन्दिर खाटू पहुँचने के लिए आप किसी भी एयरबेस से जयपुर के हवाईअड्डे उतरें! वहाँ से कैब द्वारा आप आसानी से किलोमीटर की यात्रा करके घँटे मिन्ट्स में पहुँच जाओगे बाबा श्याम जी के दरबार

रेल मार्ग से कैसे पहुँचें श्याम मन्दिर खाटू :

श्याम बाबा मन्दिर खाटू पहुँचने के लिए आप किसी भी रेल्वेनेटवर्क्स से रिंग्स जनक्शन पहुँचें! वहाँ से आप १८.५ किलोमीटर की दूरी से, शेयर टैम्पो, शेयर ऑटो, शेयर कैब अथवा बस से भी पहुँच सकते हो श्री खाटू श्याम जी के द्वार!

सड़क मार्ग से कैसे पहुँचें श्याम मन्दिर खाटू :

श्याम बाबा मन्दिर खाटू पहुँचने के लिए आप किसी भी वाहन बस, कार या मोटरसाइकिल से आसानी से राष्ट्रीय राजमार्ग NH ४८ द्वारा ३०१.५ किलोमीटर की दूरी तय करके ५ घण्टे ४५ मिन्ट्स में आ सकते हो!

बाबा श्याम जी की जय हो! जयघोष हो!!

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