सरस्वती पृथूदक मन्दिर पेहवा, कुरुक्षेत्र, हरियाणा भाग : २२३,पँ० ज्ञानेश्वर हँस “देव” की क़लम से

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भारत के धार्मिक स्थल: सरस्वती पृथूदक मन्दिर, पेहवा कुरुक्षेत्र, हरियाणा भाग: २२३

आपने पिछले भाग में पढ़ा भारत के धार्मिक स्थल: विष्णु अवतार भगवान श्री ऋषभदेव मन्दिर, उदयपुर, राजस्थान! यदि आपसे उक्त लेख छूट गया अथवा रह गया हो और आपमें पढ़ने की जिज्ञासा हो तो आप प्रजा टूडे की वेब साईट www. prajatoday.com पर जाकर, धर्म- साहित्य पृष्ठ पर जाकर सकते हैं!

आज हम आपके लिए लाए हैं : भारत के धार्मिक स्थल: सरस्वती पृथूदक मन्दिर, पेहवा, कुरुक्षेत्र, हरियाणा भाग: २२३

पिहोवा या पेहवा या पेहोवा एक ही नाम है! हरियाणा के कुरुक्षेत्र ज़िले का एक नगर! इसका पुराना नाम ‘पृथूदक‘ है। यह एक प्रसिद्ध तीर्थ है! महाभारत में कहा गया है कि:

पुण्यामाहु कुरुक्षेत्र कुरुक्षेत्रात्सरस्वती!
सरस्वत्माश्च तीर्थानि तीर्थेभ्यश्च पृथुदकम्!!

कुरुक्षेत्र पवित्र माना गया है और सरस्वती कुरुक्षेत्र से भी पवित्र है! सरस्वती तीर्थ अत्यंत पवित्र है, किन्तु पृथूदक इनमें सबसे अधिक प्राचीनतम, पावन, पुनीत व पवित्र है!

महाभारत, वामन पुराण, स्कन्द पुराण, मार्कण्डेय पुराण आदि अनेक पुराणों एवं धर्मग्रन्थों के अनुसार इस तीर्थ का महत्व इसलिए ज्यादा हो जाता है कि पौराणिक व्याख्यानों के अनुसार इस तीर्थ की रचना प्रजापति ब्रह्मा ने पृथ्वी, जल, वायु व आकाश के साथ सृष्टि के आरम्भ में की थी! ‘पृथुदक’ शब्द की उत्पत्ति का सम्बन्ध महाराजा पृथु से रहा है! इस जगह पृथु ने अपने पिता की मृत्यु के बाद उनका क्रियाकर्म एवँ श्राद्ध तर्पण किया अर्थात जहाँ पृथु ने अपने पिता को उदक यानि जल दिया! पृथु व उदक के जोड़ से यह तीर्थ पृथूदक कहलाया! यहाँ आज भी हिन्दूओं के वँशज अपने माता-पिता का, ज्येष्ठ दादा-दादी नाना-नानी ताऊ-ताई चाचा-चाची व भाई बहनोँ का श्राद्ध-तर्पण करने पेहोवा आते हैं!

विष्णुजी के अवतार भगवान श्री पृथु जी महाराज! राजा श्री वेन के पुत्र थे! भूमण्डल पर सर्वप्रथम सर्वांगीण रूप से राजशासन स्थापित करने के कारण उन्हें पृथ्वी का प्रथम राजा माना गया है!

साधुशीलवान् अँग के दुष्ट पुत्र वेन को तँग आकर ऋषियों ने हुंकार-ध्वनि से मार डाला था! तब अराजकता के निवारण हेतु निःसन्तान मरे वेन की भुजाओं का मन्थन किया गया जिससे स्त्री-पुरुष का एक जोड़ा प्रकट हुआ! पुरुष का नाम ‘पृथु’ रखा गया तथा स्त्री का नाम ‘अर्चि’! वे दोनों पति-पत्नी हुए! पृथु को भगवान् विष्णु तथा अर्चि को लक्ष्मी का अँशावतार माना गया है!

भगवान पृथु ने ही पृथ्वी को समतल किया जिससे वह उपज के योग्य हो पायी! महाराज पृथु से पहले इस पृथ्वी पर पुर-ग्रामादि का विभाजन नहीं था! उस समय के लोग अपनी सुविधानुसार यहाँ वहाँ बेखटके जहाँ-तहाँ बस जाते थे! महाराज पृथु अत्यन्त लोक- हितकारी थे! उन्होंने ९९ अश्वमेध यज्ञ किये थे! सौवें यज्ञ के समय इन्द्र ने अनेक वेश धारण कर अनेक बार घोड़ा चुराया, परन्तु महाराज पृथु के पुत्र इन्द्र को भगाकर घोड़ा ले आते थे!

इन्द्र के बारम्बार कुकृत्य से महाराज पृथु अत्यन्त क्रोधित होकर उन्हें मार ही डालना चाहते थे कि यज्ञ के ऋत्विजों ने उनकी यज्ञ-दीक्षा के कारण उन्हें रोका तथा मन्त्र-बल से इन्द्र को अग्नि में हवन कर देने की बात कही, परन्तु ब्रह्मा जी के समझाने से पृथु मान गये और यज्ञ को रोक दिया१ सभी देवताओं के साथ स्वयँ भगवान् विष्णु भी पृथु से परम प्रसन्न थे! भगवान पृथु से धनधान्य पुत्र सम्पत्ति अर्थात दुनियावी जो भी वस्तु माँगोंगे तो तुरन्त लक्ष्मी जी की कृपा से पूर्ण हो जाता है!

पृथु अराधना :

महाराज पृथु ने ब्रह्मावर्त क्षेत्र में जिस स्थान पर सरस्वती नदी पूर्वाभिमुख होकर बहती हैं, सौ अश्वमेघ यज्ञ करने की दीक्षा ली! यह देख इन्द्र के मन में आशंका हुई की, इस यज्ञ से महाराज पृथु का पुण्य उन से अधिक हो जायेगा! पृथु के अश्वमेघ में स्वयँ भगवान श्री हरि जनार्दन ने साक्षात् दर्शन दिया! उनके साथ रूद्र, ब्रह्मा जी, अपने-अपने अनुचरों के साथ पधारे थे, साथ ही समस्त लोकपाल, गन्धर्व, अप्सराएँ, सिद्ध, विद्याधर, दानव, दैत्य, भगवान् श्री हरि के पार्षद, सनकादि मुनि, दात्तात्रेय, कपिल, नारद इत्यादि उस यज्ञ में पधारें! महाराज पृथु भगवान् श्री हरि को ही अपना प्रभु मानते थे, उनके यज्ञ में यज्ञ सामाग्रियों को देने वाली भूमि ने कामधेनु होकर यजमानों की सभी कामनाओं को पूर्ण किया! परन्तु देवराज इंद्र को यह सहन नहीं हुआ, उन्होंने यज्ञ में विघ्न डालने का प्रयत्न किया, उन्होंने अंतिम यज्ञ के घोड़े का चुपके से हरण कर लिया! इंद्र ने अपनी रक्षा हेतु कवच रूपी पाखंड वेश धारण किया, जो अधर्म का भ्रम उत्पन्न करने वाला हैं! इंद्र द्वारा इस प्रकार शीघ्रता से यज्ञ अश्व हरण कर ले जाते हुए, अत्रि ने उन्हें देख लिया! इस पर पृथु का पुत्र इंद्र को मारने हेतु उनके पीछे दौड़ा और इंद्र से बोला “अरे तू खड़ा रह”! इंद्र तपस्वी भेष में मस्तक पर जटा-जुट तथा शरीर में भस्म धारण किये हुए थे, इस प्रकार उन्हें देख कर पृथु कुमार ने उन्हें धर्म समझा तथा उन पर बाणों का प्रहार नहीं किया! इस पर अत्रि ने इंद्र को मरने की पृथु कुमार को आज्ञा दी, इस प्रकार वह क्रोध से भर गया। इंद्र बड़े वेग से आकश में जा रहें थे, इस पर पथु कुमार भी उस के पीछे दौड़ा! उसे पीछे आते देख इंद्र वही पर अश्व को छोड़ कर अंतर्ध्यान हो गया, पृथु कुमार यज्ञ के अश्व को लेकर यज्ञ शाला में लौट आया!

इस अद्भुत पराक्रम को देख महर्षियों ने उस का नाम “विजिताश्व” रख दिया! घोड़े को यज्ञ मंडप के युप में बाँध दिया गया, इन्द्र ने पुनः अश्व को चुराने का प्रयत्न किया! इस बार उसने चारों ओर घोर अन्धकार फैला दिया और छिप कर अश्व को सांकर समेत ले गया! पुनः अत्रि मुनि ने उन्हें देख लिया, इस बार इन्द्र भेष बदल कर वहां आयें थे, उनके पास कपाल और खट्वांग था, जिसे देख पृथु कुमार ने किसी प्रकार से बाधा उत्पन्न नहीं की। पुनः अत्रि ने राजकुमार को उकसाया तथा राजकुमार ने इन्द्र को लक्ष कर अपने धनुष में बाण चढ़ाया, यह देख इंद्र भय के मारे अश्व तथा भेष को छोड़ अंतर्ध्यान हो गया। राजकुमार विजिताश्व पुनः यज्ञ के अश्व को अपने पिता के यज्ञ शाला में ले आया!

इन्द्र द्वारा त्यागे हुए उस निन्दित भेष को मंदबुद्धि पुरुषों ने ग्रहण किया, इन्द्र द्वारा अश्व हरण की इच्छा से जो भी रूप धारण किया गया, वे पाप के खंड होने के कारण “पाखण्ड कहलाये”, यज्ञ के अश्व को चुराने के समय इंद्र ने जिन-जिन भेष को त्यागा था, उन ‘नग्न, रक्ताम्बर तथा कापालिक’ आदि आचरणों में मनुष्य की बुद्धि प्रायः मोहित हो जाती हैं!”

महाराज पृथु को जब देवराज इन्द्र के इस कुटिलता का पता चला तो उन्हें बड़ा क्रोध आया, उन्होंने अपने धनुष पर बाण चढ़ाया तथा इंद्र के वध हेतु अपने आप को प्रस्तुत किया। इस पर ऋत्विजों ने महाराज पृथु से कहा ! ‘राजन आप तो बड़े ही बुद्धिमान हैं, यज्ञ दीक्षा लेने पर, यज्ञ पशु को छोड़ किसी अन्य का वध उचित नहीं हैं! आपके यज्ञ में विघ्न डालने वाला आपका शत्रु इंद्र, ईर्ष्या वश निस्तेज हो रहा हैं; हम उन्हें अमोघ आवाहन-मन्त्र द्वारा उन्हें यही बुला लेते हैं तथा बल पूर्वक उसका अग्नि में हवन कर देते हैं!

इस प्रकार इन्द्र का यज्ञ में आवाहन किया गया, जिसे ही श्रुवा द्वारा यज्ञ में आहुति डालना था, ब्रह्मा जी वहां पर आयें और ऋत्विजों को आहुति डालने से रोक दिया। ब्रह्मा जी बोले ! “याजको ! तुम्हें इन्द्र का वध नहीं करना चाहिये, यज्ञ-संज्ञक इंद्र को भगवान् की ही मूर्ति हैं, यज्ञ द्वारा तुम जिनकी आराधना कर रहे हो, वे इन्द्र के ही अंग हैं और उन्हें ही तुम यज्ञ द्वारा मरना चाहते हो ? पृथु के यज्ञ अनुष्ठान में इंद्र ने जो पाखण्ड किया हैं, वह धर्म उच्छेदन करने वाला हैं, अब उस से अधिक विरोध न करों, नहीं तो वह और भी पाखण्ड मार्गों का प्रचार करेगा। परम यशस्वी महाराज पृथु के ९९ यज्ञ ही रहने दो। इसके पश्चात उन्होंने महाराज पृथु से कहा ! आप तो मोक्ष धर्म को जानने वाले हैं, अतः आप को इन यज्ञों की क्या आवश्यकता हैं, आपका सर्वदा ही मंगल हो ! आप और इन्द्र दोनों ही यज्ञ-पुरुष भगवान् श्री हरि के शरीर हैं, आप को अपने स्वरूप भूत इन्द्र के प्रति क्रोध नहीं करना चाहिये! आपका यह यज्ञ निर्विघ्न समाप्त नहीं हुआ, आप चिंता न करें तथा मेरी बात को आदर पूर्वक स्वीकार कीजिये, इस यज्ञ को बंद कीजिये! इन्द्र के करें हुए पाखंडों से धर्म का नाश हो रहन हैं, बार-बार इन्द्र घोड़े को चुरा कर आप के यज्ञ में विघ्न डाल रहा हैं तथा इन्हीं पाखण्ड पथ इंद्र की माया अधर्म की जननी हैं, आप इसे नष्ट कर डालिए।”

ब्रह्मा जी के इस प्रकार समझाने पर महाराज पृथु ने यज्ञ का आग्रह त्याग दिया तथा इन्द्र के साथ संधि कर ली। इसके पश्चात यज्ञ के अंत में वे स्नान कर निवृत्त हुए, उन्हें नाना देवताओं ने अभीष्ट वर प्रदान किया, उन्होंने ब्राह्मणों को दक्षिणाऍ दी, ब्राह्मणों ने भी संतुष्ट हो उन्हें अमोघ आशीर्वाद प्रदान किया!

विमान सेवाएँ:

इंडिगो एयरलाइंस! पहले जाओ पहले जाओ! हेलिट्रांस, विस्तारा आदि से दिल्ली हवाई मार्ग से पहुँचें: फ्लाइट से दिल्ली के इन्दिरगाँधी अंतर्राष्ट्रीय हवाईअड्डा तक पहुंचने के लिए नई दिल्ली से तक आएंगे! दिल्ली कैब से हवाईअड्डा से पेहोवा ३ घण्टे ३९ मिनट्स में पेहोवा पहुँच जाओगे!

रेल मार्ग से कैसे पहुँचें:

भारतीय रेलभारतीय रेलवे भारत का राष्ट्रीय रेल ऑपरेटर देश भर में लम्बी दूरी और उपनगरीय दोनों मार्गों पर धीमी मल्टी-स्टॉप से ​​तेज़ और अधिक आरामदायक सेवाओं तक यात्री और मालगाड़ी चलाता है! यह देश का पता लगाने का एक व्यावहारिक और किफायती तरीका है! अग्रिम टिकट बुकिंग आमतौर पर भारतीय नागरिकों के लिए यात्रा की तारीख से १२० दिन पहले से शुरू होती है; अंतरराष्ट्रीय यात्रियों के लिए ३६५ दिन! जब आप अपनी यात्रा की श्रेणी बुक करते हैं और चुनते हैं तो आपको एक सीट या बर्थ आवंटित की जाएगी!

सड़क मार्ग से कैसे पहुँचें:

आप दिल्ली से बस अथवा कार से आते हो तो राष्टीय राजमार्ग NH- ४४ से १८३.३ किलोमीटर की दूरी तय करके ३ घण्टे ३९ मिनट्स में पहुँच जाओगे पेहोवा! मैं दिल्ली से दिल्ली (DEL) हवाई अड्डे तक कैसे पहुँच सकता हूँ?

दिल्ली से पिहोवा कैसे जाएं।

दूरी: १६०.४ किलोमीटर दूरी तय करके दिल्ली से पिहोवा पहुँचेंगे! ज़िंगबस दिल्ली के गोलचक्कर के पास मोरी गेट से कुरुक्षेत्र फ्लाईओवर के सामने ताऊ देवी लाल पार्क, कुरुक्षेत्र के अन्त तक हर ४ घण्टे में एक बस संचालित करता है, और यात्रा में ३ घण्टे ३९ मिनट्स का समय लगता है!

भगवान पृथु की जय हो! जयघोष हो!!

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