विष्णु अवतार भगवान श्री ऋषभदेव, उदयपुर, राजस्थान भाग: २२२,पँ० ज्ञानेश्वर हँस “देव” की क़लम से

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भारत के धार्मिक स्थल: विष्णु अवतार भगवान श्री ऋषभदेव, उदयपुर, राजस्थान भाग: २२२

आपने पिछले भाग में पढ़ा भारत के धार्मिक स्थल: वृन्दावन चन्द्रोदय मन्दिर, वृन्दावन, उत्तरप्रदेश! यदि आपसे उक्त लेख छूट गया अथवा रह गया हो और आपमें पढ़ने की जिज्ञासा हो तो आप प्रजा टूडे की वेब साईट www. prajatoday.com पर जाकर, धर्म- साहित्य पृष्ठ पर जाकर सकते हैं!

आज हम आपके लिए लाए हैं : भारत के धार्मिक स्थल: विष्णु अवतार भगवान श्री ऋषभदेव, उदयपुर, राजस्थान भाग: २२२

विष्णुजी के अवतार भगवान श्री ऋषभदेव, जिसे धुलेव और रिखभदेव भी कहते हैं, इस स्थान का नाम धुलेव नामक भील सरदार के कारण पड़ा जिन्होंने ऋषभदेव भगवान कें मन्दिर की रक्षा की थी! भारत के राजस्थान राज्य के उदयपुर ज़िले के दक्षिणी भाग में स्थित एक नगर है!

यह एक प्रसिद्ध जैन तीर्थ स्थल है। मुख्य आकर्षण ऋषभदेव मंदिर है, जो प्रथम जैन तीर्थंकर का विशाल मंदिर है, प्रथम जैन तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव जी को हिंदू विष्णु का आठवां अवतार भी कहते हैं ऐसी उनकी मान्यता है स्थानीय भील भी इनकी पूजा करते हैं। नगर का अन्य नाम केसरियाजी भी हैं क्योंकि मन्दिर में केसर से पूजा की जाती हैं! इस मन्दिर को मेवाड़ के चार मुख्य धार्मिक संस्थाओं में एक माना जाता हैं! उदयपुर के चतुर सिंह जी के अनुसार:

एकलिंग गिरिराजधर ऋषभदेव भुजचार! सदा स्नेह तो, चार धाम मेवाड!!

विष्णु अवतार भगवान श्री ऋषभदेव “जैनधर्म” के प्रथम तीर्थंकर हैं! तीर्थंकर का अर्थ होता है- ‘जो तीर्थ की रचना करें! जो संसार सागर (जन्म मरण के चक्र) से मोक्ष तक के तीर्थ की रचना करें! ऋषभदेव को ‘आदिनाथ’ भी कहा जाता है! भगवान ऋषभदेव वर्तमान अवसर्पिणी काल के प्रथम तीर्थंकर हैं!;महाराज नाभि के पुत्र का नाम ऋषभ था!

महाराज नाभि ने सन्तान-प्राप्ति के लिये यज्ञ किया! तप: पूत ऋत्विजों ने श्रुति के मन्त्रों से यज्ञ-पुरुष की स्तुति की! श्री नारायण प्रकट हुए! विप्रों ने नरेश को उनके सौन्दर्य, ऐश्वर्य, शक्तिघन के समान ही पुत्र हो, यह प्रार्थना कीं उस अद्वय के समान दूसरा कहाँ से आये। महाराज नाभि की महारानी की गोद में स्वयं वही परमतत्त्व प्रकट हुआ! ऋषभ के जन्म के समय से ही उसके शरीर पर विष्णु के वज्रअंकुश आदि चिह्न विद्यमान थे!

महाराज नाभि कुमार ऋषभदेव को राज्य देकर वन के लिये विदा हो गये! देवराज इन्द्र को धरा का यह सौभाग्य ईर्ष्या की वस्तु जान पड़ा! अखिलेश की उपस्थिति से पृथ्वी ने स्वर्ग को अपनी सम्पदा से लज्जित कर दिया था! महेन्द्र वृष्टि के अधिष्ठाता हैं! वर्षा ही न हो तो पृथ्वी का सौन्दर्य रहे कहाँ! शस्य ही तो यहाँ की सम्पत्ति है! देवराज को लज्जित होना पड़ा! वर्षा बंद न हो सकी! भगवान ऋषभ ने अपनी शक्ति से वृष्टि की। अन्तत: देवराज ने अपनी पुत्री जयन्ती का विवाह उनसे कर दिया! उन धरानाथ से पृथ्वी और स्वर्ग में सम्बन्ध स्थापित हुआ!

ऋषभदेव जी को पूरे सौ पुत्र हुए! इनमें सबसे ज्येष्ठ चक्रवर्ती भरत हुए! इन्हीं आर्य भरत के नाम पर यह देश भारतवर्ष कहा जाता है! शेष पुत्रों में नौ ब्रह्मर्षि हो गये और इक्यासी महातपस्वी हुए! राजा ऋषभदेव ने अपने अवतार लेने के रहस्य का उदघाटन करते हुए सब पुत्रों को आलस्यहीन होकर धर्म पूर्वक कार्य करने का उपदेश दिया तथा भरत की सेवा करने को कहा! ऋषभ ने जनता को योग-साधना में विघ्नस्वरूप जानकर अजगरवृत्ति धारणा कर ली तथा लेटे-लेटे ही सब कर्म करने लगे! कालान्तर में उन्होंने ऐहिक शरीर का त्याग कर दिया! भरत का राज्याभिषेक करके भगवान ने वानप्रस्थ स्वीकार किया!

काक, गौ, मृग, कपि आदि के समान आचरण, आहार-ग्रहण, निवासादि जडयोग हैं! ये सिद्धिदायक हैं और संयम के साधक भी। भगवान ऋषभ ने इनको क्रमश: अपनाया, पूर्ण किया; किंतु इनकी सिद्धियों को स्वीकार नहीं किया! उनकी तपश्चर्या का अनुकरण जो सिद्धियों के लिये करते हैं, वे उन प्रभु के परमादर्श को छोड़कर पृथक् होते हैं!

आत्मानन्द की वह उन्मद अवधूत अवस्था-बिखरे केश, मलावच्छन्न शरीर, न भोजन की सुध और न प्यास की चिन्ता किसी ने मुख में अन्न दे दिया तो स्वीकार हो गया! जहाँ शरीर को आवश्यकता हुई, मलोत्सर्ग हो गया! उस दिव्य देह का मल अपने सौरभ से योजनों तक देश को सुरभित कर देता! जहाँ शरीर का ध्यान नहीं, वहाँ शौचाचार का पालन कौन करे! यह आचरणीय नहीं-यह तो अवस्था है! शरीर की स्मृति न रहने पर कौन किसे सचेत करेगा! शास्त्र से परे है यह दशा! मुख में कंकड़ी रक्खे, निराहार, मौन, उन्मत्त की भाँति भारत के पश्चिमीय प्रदेश-कोंक, वेंक, कुटकादि के वनों में भगवान ऋषभदेव भ्रमण कर रहे थे! उनका शरीर तेजोमय, किंतु अनाहार से कृश हो गया था! वन में दावाग्नि लगी। देह आहुति बन गया!

जैन धर्म भगवान ऋषभ को प्रथम तीर्थंकर मानता है! उन्हीं के आचार की व्याख्या पीछे के जैनाचार्यों ने की है!

कैसे पहुँचें ऋषभदेव और यहाँ से दूरियां :

उदयपुर – ६५ किलोमीटर
नाथद्वारा – ११३ किलोमीटर
चित्तौड़गढ़ – १७८ किलोमीटर
माउंट आबू – २२६ किलोमीटर
जोधपुर – ३१७ किलोमीटर
जयपुर – ४६१ किलोमीटर
केसरिया जी ऋषभदेव मन्दिर, धुलेवी!

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हवाई मार्ग से कैसे पहुँचें:

फ्लाइट से उदयपुर तक पहुंचने के लिए नई दिल्ली से डायरेक्ट फ्लाइट से पहुँच कर आप के लिए कैब ले सकते हो!
उदयपुर हवाई अड्डा मन्दिर से ९४ किलोमीटर दूर है!

रेल मार्ग से कैसे पहुँचें:

ट्रैन से कैसे पहुंचें ऋषभदेव (धुलेव) उदयपुर रेलवे स्टेशन मंदिर से ६५ किलोमीटर दूर है!

सड़क मार्ग से कैसे पहुँचें:

आप दिल्ली से बस अथवा कार से आते हो तो राष्टीय राजमार्ग NH-४८ से ७२७.७ किलोमीटर की दूरी तय करके १३ घण्टे २ मिनट्स में पहुँच जाओगे मन्दिर!
ऋषभदेव उदयपुर शहर से ६५ किलोमीटर (४० मील) दूर स्थित है, और उदयपुर-अहमदाबाद सड़क मार्ग (राष्ट्रिय राजमार्ग ४८ पर है! शहर का नाम ऋषभदेव जी हैं!

श्री ऋषभदेव की जय हो! जयघोष हो!!

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