चण्डी देवी मन्दिर डासना, ग़ाज़ियाबाद, उत्तरप्रदेश भाग :३०३,पँ० ज्ञानेश्वर हँस “देव” की क़लम से

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भारत के धार्मिक स्थल: चण्डी देवी मन्दिर डासना, ग़ाज़ियाबाद, उत्तरप्रदेश भाग :३०३

आपने पिछले भाग में पढ़ा होगा भारत के धार्मिक स्थल: साईँ मन्दिर, दीन दयाल नगर, मुरादाबाद, उत्तरप्रदेश! यदि आपसे उक्त लेख छूट अथवा रह गया हो तो आप प्रजा टुडे की वेबसाईट http://www.prajatoday.com पर जाकर धर्म साहित्य पृष्ठ पर जाकर पढ़ सकते हैं! आज हम प्रजा टुडे के अति विशिष्ट पाठकों के लिए लाए हैं!

भारत के धार्मिक स्थल: चण्डी देवी मन्दिर, डासना, ग़ाज़ियाबाद, उत्तरप्रदेश भाग :३०३

दिल्ली एन०सी०आर० क्षेत्र में दिल्ली की सीमा से लगभग ३५ किलोमीटर की दूर ग़ाज़ियाबाद के देहात क्षेत्र डासना में माता चण्डी देवी का एक ऐसा मन्दिर है जो स्थानीय लोगों में डासना देवी के नाम से प्रसिद्ध है। यह मन्दिर त्रेता युग में स्थापित हुआ मन्दिर बताया जाता है। इसके अलावा यहाँ महाभारत के काल से भी जुड़े हुए अनेकों किस्से और किंवदंतिया सुनने को मिलते हैं। मात्र त्रेता युग और द्वापर युग ही नहीं बल्कि अंग्रेजों को भगाने के लिए में भी इस मंदिर स्थल का एक बहुत बड़ा योगदान रहा है।

चंडी देवी या डासना देवी के इस मंदिर के विषय में कहा जाता है कि यह एक ऐसा मंदिर है जिसमें पौराणिक काल से लेकर आजादी की लड़ाई तक के अनेकों रहस्य और और प्रामाण छूपे हुए हैं। यह मंदिर गाजियाबाद से आठ किमी दूर हापुड रोड पर जेल रोड से दक्षिण दिशा में जाने पर डासना कस्बे में पड़ता है।

डासना देवी मंदिर के मंहत यति नरसिहांनंद सरस्वती, डासना देवी मंदिर धर्म की लड़ाई के लिए आजकल देश ही नहीं दुनियाँ भर में प्रसिद्ध हो चुके हैं! इस मन्दिर में स्थापित देवी चण्डी की मूर्ति की एक खास विशेषता यह है कि यह कसौटी पत्थर से निर्मित है। मन्दिर के महंत यति नरसिंहानंद सरस्वती जी के अनुसार इस समय जो ज्ञात है उसके अनुसार दुनियाभर में कसौटी पत्थर से निर्मित माता की केवल चार ही मूर्तियां हैं, जिनमें से तीन मूर्तियां भारत के मंदिरों में हैं जबकि जो चैथी मूर्ति है वह इस समय पाकिस्तान में स्थित हिंग़लाजदेवी की मूर्ति है जो कसौटी पत्थर की बनी है। और जो भारत के मन्दिरों में हैं उनमें से एक तो यही मूर्ति है जबकि दूसरी मूर्ति कलकत्ता के दक्षिणेश्वर काली माता की प्रतिमा है और तीसरी असम प्रदेश के गोहाटी में कामाख्या देवी शक्तिपीठ की मूर्ति है जो कसौटी पत्थर की बनी है। चण्डी देवी की यह मूर्ति कितनी पुरानी है इसका कोई निश्चीत प्रमाण नहीं है।

बताया जाता है कि मन्दिर स्थापना से पूर्व भी इस स्थान पर कई ऋषि मुनि तप किया करते थे। और यह एक प्रसिद्ध तपस्थली के रूप में जानी जाती थी। जिसके बाद त्रेता युग में परशुराम ने यहां शिवलिंग की स्थापना की थी।

पुराणों के अनुसार लंकापति रावण के पिता ऋषि विश्रवा ने डासना के इस मंदिर में कई वर्षों तक तपस्या की थी और स्वयँ रावण भी यहां पूजा अर्चना करने आया करता था। इस मन्दिर के विषय में पौराणिक मान्यता और महत्व है कि त्रेता युग में जिस समय हिन्दू धर्म का स्वर्णिम युग चल रहा था उस समय यह मन्दिर सनातन धर्म के प्रमुख तीर्थ स्थलों में से एक हुआ करता था।

डासना देवी मन्दिर की यह मूर्ति कोई साधारण नहीं है! इसके अलावा यह भी माना जाता है कि द्वापर युग में हुए महाभारत युद्ध से पहले माता कुंती और उनके पांचों पुत्र पांडवों ने लाक्षागृह से सकुशल बच निकलने के बाद यहां भी गुप्त रूप से कुछ समय बिताया था। समय-समय पर इस मंदिर का जीर्णोद्धार होता रहा और इसकी पवित्रता जस की तस बनी रही। लेकिन, मध्य युगिन इतिहास के आते-आते भारत के अन्य मंदिरों की तरह ही इस मंदिर पर भी मुगल काल के समय आक्रमणकारियों ने हमले किए और यहां की धन-दौलत और कीमती सामानों को लूटा और मंदिर की इमारत को भी खंडित कर दिया गया।

इतिहासकारों और स्थानीय लोगों के अनुसार मुगल आक्रमण- कारियों के द्वारा जब इस मन्दिर पर जब हमला किया गया उससे पहले ही यहां के पुजारियों और स्थानीय लोगों ने मिलकर मन्दिर की सभी मूर्तियों को मन्दिर परिसर के पास के तालाब में छुपा दिया।

समय और इतिहास के अनुसार इस क्षेत्र और संपूर्ण भारत पर मुगलों का कब्जा हो गया और ऐसे में हिंदू धर्म के लगभग सभी स्थलों को नष्ट कर दिया गया और उनमें पूजा-पाठ पर प्रतिबंध लगा दिया गया जिसकी वजह से कई धर्म स्थलों का अस्तीत्व ही समाप्त हो गया और कई तो मलबे के बड़े टीलों में तब्दील होकर रह गए और कई मन्दिर हकीकत से गुमनाम होकर इतिहास और किंवदंतियों में ही रह गए। लेकिन स्थानीय लोगों की नजर में इस मंदिर स्थल का टीला और इसका मलबा अब भी पवित्र ही था।

स्थानीय श्रद्धालुओं का दावा है कि मन्दिर में माता की दिव्य प्रतिमा को जितनी बार भी निहारा जाता है प्रतिमा की भाव भंगिमा बदली हुई नजर आती है। मन्दिर के महन्त का दावा है कि अपने भक्तों द्वारा दी गई सात्विक पूजा को ही देवी माता स्वीकार करती हैं जबकि किसी भी प्रकार की तांत्रिक पूजा को वे स्वीकार नहीं करती हैं।

चण्डी देवी मन्दिर में शेर :

प्रचलित किंवदंतियों के अनुसार किसी समय इस क्षेत्र में घना जंगल हुआ करता था और मन्दिर के पास के तालाब में एक शेर प्रतिदिन नियमित रूप से पानी पीने आता था। पानी पीने के बाद शेर बिना किसी को कोई हानि पहुंचाए देवी प्रतिमा के सामने कुछ देर तक बैठने के बाद वापस चला जाता था। बताया जाता है कि उस शेर ने माता की प्रतिमा के सामने ही अपने प्राण त्याग दिए थे। उसकी मौत के बाद स्थानीय लोगों ने विशेष रूप से देवी माता की प्रतिमा के सामने शेर की प्रतिमा को स्थापित करवाया था जो आज भी मौजूद है।

मन्दिर में बाला सुंदरी देवी, संतोषी मां, मीनाक्षी देवी, कादंबरी देवी और बड़ी माता के साथ-साथ राम परिवार, शँकर परिवार, नौ दुर्गा, देवी सरस्वती और हनुमान जी की मूर्तियां भी स्थापित है।

डासना देवी के मन्दिर में सन २०१८ की शिवरात्री के विशेष अवसर पर पारदेश्वर महादेव शिवलिंग की स्थापना भी की गई है। वाराणसी से विशेष तौर पर आए विद्वानों ने आचार्य राम भुवन शास्त्री के मार्गदर्शन में विधि- विधान से पारदेश्वर महादेव की स्थापना की गई। इस अवसर पर अखिल भारतीय संत परिषद के राष्ट्रीय संयोजक यति नरसिंहानन्द सरस्वती महाराज ने बताया कि यह शिवलिंग १०८ किलो पारे से बना हुआ है। पारदेश्वर महादेव की स्थापना के साथ ही अब यह पीठ पूर्ण रूप से शिवशक्ति धाम में परिवर्तित हो चूका है। अब इसे मन्दिर नहीं बल्कि शिवशक्ति धाम के नाम से भी जाना जाएगा।

नवरात्र के विशेष अवसर पर यहां दूर-दूर से आने वाले भक्तों की भीड़ देखी जा सकती है। कई भक्त और श्रद्धालु इस मन्दिर प्रांगण में स्थित प्राचिन काल के तालाब में स्नान करते हैं। उनका मानना है कि इसमें स्नान करने से चर्म रोग और कुष्ठ रोग जल्दी ठीक होने लगते हैं। सन २०१७ में स्थानीय लोगों के सहयोग से इस तालाब की सफाई की गई और इसका जीर्णोद्धार भी करवाया गया।

प्रत्येक नवरात्रि के अवसर पर यहाँ नौ दिनों विश्व शाँति की कामना के लिए अखण्ड बगला- मुखी यज्ञ का आयोजन किया जाता है। इस दौरान यहां अष्टमी और नवमी के विशेष अवसर पर लगभग दो लाख से भी अधिक भक्त माता के दर्शन को आते हैं। मन्दिर के पास ही हर साल रामलीला का मंचन भी किया जाता है।

यह मन्दिर पौराणिक और ऐतिहासिक होने के कारण जितना पवित्र और प्रसिद्ध है उतना ही आए दिन विवादों में भी बना रहता है। और इसके विवादों में बने रहने के पीछे का कारण है इस मंदिर के प्रवेश द्वार पर लगी वह सूचना जो एक संप्रदाय विशेष को कभी रास नहीं आती है। जी हां, इस मंदिर के प्रवेश द्वार पर स्पष्ट शब्दों में लिखा है कि – यह तीर्थ हिन्दूओं का पवित्र स्थल है, यहाँ मुसलमानों का प्रवेश वर्जित है। और यही कारण है कि यह मन्दिर और इसका यह बोर्ड विवादों में घिरा हुआ है। जबकि स्थानीय मुस्लिम समुदाय इस मन्दिर और मन्दिर के महन्त यति नरसिहांनंद सरस्वती जी से खार खाए हुए बैठा है और आए दिन महन्त जी पर हमले होने की खबरें भी आती रहती हैं।

डासना देवी मंदिर के महन्त यति नरसिहांनंद सरस्वती के अनुसार मन्दिर में पूजा-अर्चना के लिए आने वाली हमारी माताओं और बहनों और बाकी श्रद्धालुओं के साथ-साथ मुस्लिम समाज के कई मनचले युवक भी आ जाते हैं और यहाँ महिलाओं के साथ अभ्रदता करते हैं। वे यहाँ आकर हिंदू युवतियों को लव जिहाद के जरिए फ़ंसाने की कोशिश करते हैं। जिसके कारण हमने विशेष तौर पर अपने समाज को बचाने के लिए और ऐसे असमाजिक तत्वों पर काबू पाने के लिए मन्दिर के बाहर यह बोर्ड लगाया गया है।

अथ श्री महाकाली चालीसा :

॥ दोह॥

मात श्री महाकालिका,
ध्याऊँ शीश नवाय ।
जान मोहि निजदास सब,
दीजै काज बनाय ॥

॥ चौपाई ॥

नमो महा कालिका भवानी । महिमा अमित न जाय बखानी ॥ तुम्हारो यश तिहुँ लोकन छायो । सुर नर मुनिन सबन गुण गायो॥
परी गाढ़ देवन पर जब जब । कियो सहाय मात तुम तब तब ॥महाकालिका घोर स्वरूपा । सोहत श्यामल बदन अनूपा ॥
जिभ्या लाल दन्त विकराला । तीन नेत्र गल मुण्डन माला ॥चार भुज शिव शोभित आसन। खड्ग खप्पर कीन्हें सब धारण॥
रहें योगिनी चौसठ संगा।दैत्यन के मद कीन्हा भंगा॥चण्ड मुण्ड को पटक पछारा।पल में रक्तबीज को मारा॥
दियो सहजन दैत्यन को मारी। मच्यो मध्य रण हाहाकारी॥कीन्हो है फिर क्रोध अपारा।बढ़ी अगारी करत संहारा॥
देख दशा सब सुर घबड़ाये।पास शम्भू के हैं फिर धाये॥विनय करी शंकर की जा के।हाल युद्ध का दियो बता के॥
तब शिव दियो देह विस्तारी।गयो लेट आगे त्रिपुरारी॥ज्यों ही काली बढ़ी अंगारी।खड़ा पैर उर दियो निहारी॥
देखा महादेव को जबही।जीभ काढ़ि लज्जित भई तबही॥भई शान्ति चहुँ आनन्द छायो। नभ से सुरन सुमन बरसायो॥
जयजयजय ध्वनि भई आकाशा।सुर नर मुनि सब हुए हुलाशा॥दुष्टन के तुम मारन कारण।
कीन्हा चार रूप निज धारण॥चण्डी दुर्गा काली माई।और महा काली कहलाई॥पूजत तुमहि सकल संसारा।
करत सदा डर ध्यान तुम्हारा॥ज्ञानेश्वर शरणागत मात तिहारी।करौं आय अब मोहि सुखारी॥सुमिरौ महा कालिका माई।
होउ सहाय मात तुम आई॥धरूँ ध्यान निश दिन तब माता। सकल दुःख मातु करहु निपाता॥आओ मात ना देर लगाओ।
मम शत्रुघ्न को पकड़ नशाओ॥सुनहु मात यह विनय हमारी। पूरण हो अभिलाषा सारी॥मात करहु तुम रक्षा आके।
मम शत्रुघ्न को देव मिटा को॥निश वासर मैं तुम्हें मनाऊं।सदा तुम्हारे ही गुण गाउं॥दया दृष्टि अब मोपर कीजै।
रहूँ सुखी ये ही वर दीजै॥नमो नमो निज काज सैवारनि। नमो नमो हे खलन विदारनि॥नमो नमो जन बाधा हरनी।
नमो नमो दुष्टन मद छरनी॥नमो नमो जय काली महारानी। त्रिभुवन में नहिं तुम्हरी सानी॥भक्तन पे हो मात दयाला।
काटहु आय सकल भव जाला॥मैं हूँ शरण तुम्हारी अम्बा।आवहू बेगि न करहु विलम्बा॥मुझ पर होके मात दयाला।
सब विधि कीजै मोहि निहाला॥करे नित्य जो तुम्हरो पूजन।ताके काज होय सब पूरन॥

निर्धन हो जो बहु धन पावै । दुश्मन हो सो मित्र हो जावै ॥जिन घर हो भूत बैताला ।भागि जाय घर से तत्काला ॥
रहे नही फिर दुःख लवलेशा । मिट जाय जो होय कलेशा ॥जो कुछ इच्छा होवें मन में । सशय नहिं पूरन हो क्षण में ॥
औरहु फल संसारिक जेते ।तेरी कृपा मिलैं सब तेते ॥

॥ दोहा ॥

दोहा महाकलिका कीपढ़ै,नित चालीसा जोय ।
मनवांछित फल पावहि,गोविन्द जानौ सोय ॥

इति श्री महाकाली चालीसा

हवाई मार्ग से कैसे पहुँचें :

बाय एयर, निकटतम हवाई अड्डा दिल्ली का इन्दिरगाँधी एयरपोर्ट है, जो ५२.६ किलोमीटर दूर है! यहाँ पर आंतरराष्ट्रीय जेवर हवाई अड्डा घरेलू यातायात के लिए अभी तक खुला नहीं है।

लोहपथगामिनी मार्ग से कैसे पहुँचें :

ट्रेन द्वारा गाज़ियाबाद रेलवे स्टेशन से डासना का यह चण्डी मन्दिर ९.७ किलोमीटर दूर है। रेलवेस्टेशन से मन्दिर आने के लिए आप ऑटो से या कैब से भी २५ मिनट्स में पहुँच सकते हो चण्डी देवी मन्दिर!

सड़क मार्ग से कैसे पहुँचें :

आप ISBT से बस द्वारा अथवा अपनी कार से NH: ३ से पँहुँच सकते है चण्डी देवी मन्दिर, डासना जाना पड़ेगा। इस मन्दिर की निकटवर्ती सड़कें बेहतर है! डासना बस स्थानक से ५२.६ किलोमीटर दूर है! आप एक घण्टा नौ मिनट्स में पहुँच सकते हैं चण्डी देवी मन्दिर, डासना!

चण्डी देवी की जय हो। जयघोष होII

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