वरद विनायक मन्दिर महाड, महाराष्ट्र भाग : ३०८,पँ० ज्ञानेश्वर हँस “देव” की क़लम से

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भारत के धार्मिक स्थल : वरद विनायक मन्दिर, महाड, महाराष्ट्र भाग : ३०८

आपने पिछले भाग में पढ़ा होगा भारत के धार्मिक स्थल: भारत के धार्मिक स्थल : प्राचीन हनुमान मन्दिर, आईं०पी० एक्सटेंशन, पूर्वी दिल्ली, नई दिल्ली! यदि आपसे उक्त लेख छूट अथवा रह गया हो तो आप प्रजा टुडे की वेबसाईट http://www.prajatoday.com पर जाकर धर्म साहित्य पृष्ठ पर जाकर पढ़ सकते हैं! आज हम प्रजा टुडे के अति विशिष्ट पाठकों के लिए लाए हैं!

भारत के धार्मिक स्थल : वरद विनायक मन्दिर, महाड, महाराष्ट्र भाग : ३०८

भारत वर्ष के महाराष्ट्र के महाड में वरद विनायक मन्दिर महाराष्ट्र में स्थित एक और प्रमुख विख्यात पावन पुनीत अष्टविनायक मन्दिर है। यह अष्टविनायक दर्शन यात्रा के हिस्से के रूप में जाने वाला चौथा गणेश मंदिर है, और महाबलेश्वर के पास घूमने के लिए शीर्ष स्थानों में से एक है।

यहां की मूर्ति स्वयंभू (स्वयं उत्पन्न) है जो १६९० ईस्वी में झील में पाई गई थी और बाद में, १७२५ ए डी में पेशवा जनरल रामजी महादेव बिवलकर द्वारा मन्दिर का पुनः निर्माण (पुनर्स्थापित) किया गया था। यहां, भगवान श्री गणेश को वरद विनायक के रूप में पूजा जाता है जो सभी इच्छाओं को पूरा करते हैं और सभी वरदान देते हैं। इस मन्दिर में गहरे तेल का दीपक जलता है, नंदा है, जिसके बारे में कहा जाता है कि यह १८९२ से लगातार जल रहा है। भक्तजन इस मन्दिर में गर्भगृह में प्रवेश कर सकते हैं और मूर्ति को श्रद्धांजलि और सम्मान दे सकते हैं। हालाँकि, मन्दिर के उत्तर की ओर एक गोमुख दिखाई देता है जहाँ से पवित्र जल बहता है, और मंदिर के पश्चिम की ओर एक पवित्र तालाब भी देखा जा सकता है।

श्री गणपति वरद विनायक स्तुति :

श्री गणपति गणेशजी के स्तोत्र का जाप करने से आपके जीवन मे खुशहाली, सुख शाँति एव समृद्धि आती है। गणपती बाप्पा मोर्या।

श्री गणेश स्तोत्र :

प्रणम्य शिरसा देवं गौरी विनायकम् ।
भक्तावासं स्मेर नित्यमाय्ः कामार्थसिद्धये ॥१॥

प्रथमं वक्रतुडं च एकदंत द्वितीयकम् ।
तृतियं कृष्णपिंगात्क्षं गजववत्रं चतुर्थकम् ॥२॥

लंबोदरं पंचम च पष्ठं विकटमेव च ।
सप्तमं विघ्नराजेंद्रं धूम्रवर्ण तथाष्टमम् ॥३॥

नवमं भाल चंद्रं च दशमं तु विनायकम् ।
एकादशं गणपतिं द्वादशं तु गजानन् ॥४॥

द्वादशैतानि नामानि त्रिसंघ्यंयः पठेन्नरः ।
न च विघ्नभयं तस्य सर्वसिद्धिकरं प्रभो ॥५॥

विद्यार्थी लभते विद्यां धनार्थी लभते धनम् ।
पुत्रार्थी लभते पुत्रान्मो क्षार्थी लभते गतिम् ॥६॥

जपेद्णपतिस्तोत्रं षडिभर्मासैः फलं लभते ।
संवत्सरेण सिद्धिंच लभते नात्र संशयः ॥७॥

अष्टभ्यो ब्राह्मणे भ्यश्र्च लिखित्वा फलं लभते ।
तस्य विद्या भवेत्सर्वा गणेशस्य प्रसादतः ॥८॥

॥ इति श्री नारद पुराणे संकष्टनाशनं नाम श्री गणपति स्तोत्रं संपूर्णम् ॥

श्री गणेश स्तोत्र पाठ कैसे करें :

गणेश स्तोत्र का जाप कैसे करे? यूँ तो शास्त्रानुसार श्री गणपति गणेश का शुभ दिवस बुद्धवार कहा गया है! परन्तु बुद्ध से पहले मंगलवार को श्री गणेश स्तोत्र का जाप करना उत्तम माना जाता है। जाप के वस्र भी अलग होने चाहिएँ, जाप के लिए कपडे के आसन पर पूर्व दिशा की तरफ मुँह करके बैठे।

आसन पर ज़मीन पर पानी से स्वस्तिक बनाये। पानी से भरा हुआ तांबे का गिलास उस पर रखें। आप श्री गणपति स्तोत्र का जाप अपनी सुविधा अनुसार ५/७/११/२१ अथवा १०८ बार कर सकते है। जाप के बाद भगवान श्री गणेश को सम्मुख मान पुर्वक प्रणाम करें एवँ तांबे के गिलास का पानी पुरे परिवार को तीर्थ स्वरूप प्राशन करने दें। मंगलमय वातावरण के लिए तीर्थ का पुरे घर मे करे। अर्थात बुद्धवार से पूर्व ही घर का वातावरण गणेशमय होने देना चाहिए!

श्री गणपति का सिद्ध शाबर मन्त्र :

सभी विघ्नों को हरने वाले, रिद्धि -सिद्धि को प्रदान करने वाले भगवान श्री गणेश देवों में सबसे पहले पूजे जाते है इनकी आराधना करने से घर में धन की वृद्धि होने के साथ साथ बुद्धि का भी विकास होता है सभी प्रकार के सुख एश्वर्य प्राप्त करने के लिए इनकी पूजा करना विशेष फलदायी माना गया है।

कार्य सिद्धि हेतु गणेश शाबर मन्त्र साधना:

“ॐ गनपत वीर, भूखे मसान, जो फल मांगू, सो फल आन। गनपत देखे, गनपत के छत्र से बादशाह डरे। राजा के मुख से प्रजा डरे, हाथा चढ़े सिन्दूर। औलिया गौरी का पूत गनेश, गुग्गुल की धरुँ ढेरी, रिद्धि-सिद्धि गनपत धनेरी। जय गिरनार-पति। ॐ नमो स्वाहा।”

श्री गणेश शाबर मन्त्र विधि :

सामग्रीः- धूप या गुग्गुल, दीपक, घी, सिन्दूर, बेसन का लड्डू। दिनः- बुधवार। निर्दिष्ट वारों में यदि ग्रहण, पर्व, पुष्य नक्षत्र, सर्वार्थ-सिद्धि योग हो तो उत्तम। समयः- रात्रि १० बजे। जप संख्या-१२५। अवधिः- ४० दिन।

किसी एकान्त स्थान में या देवालय में, जहाँ लोगों का आवागमन कम हो, भगवान् गणेश की षोडशोपचार से पूजा करे। घी का दीपक जलाकर, अपने सामने, एक फुट की ऊँचाई पर रखे। सिन्दूर और लड्डू के प्रसाद का भोग लगाए और प्रतिदिन १२५ बार उक्त मन्त्र का जप करें। प्रतिदिन के प्रसाद को बच्चों में बाँट दे। चालीसवें दिन सवा सेर लडडू के प्रसाद का भोग लगाए और मन्त्र का जप समाप्त होने पर तीन बालकों को भोजन कराकर उन्हें कुछ द्रव्य-दक्षिणा में दे। सिन्दूर को एक डिब्बी में सुरक्षित रखे। एक सप्ताह तक इस सिन्दूर को न छूए। उसके बाद जब कभी कोई कार्य या समस्या आ पड़े, तो सिन्दूर को सात बार उक्त मन्त्र से अभिमन्त्रित कर अपने माथे पर टीका लगाए। कार्य सफल होगा।

श्री गणेश मन्त्र :

“ॐ नमो सिद्ध-विनायकाय सर्व-कार्य-कर्त्रे सर्व-विघ्न-प्रशमनाय सर्व-राज्य-वश्य-करणाय सर्व-जन-सर्व-स्त्री-पुरुष-आकर्षणाय श्रीं ॐ स्वाहा।”

विधि- नित्य-कर्म से निवृत्त होकर उक्त मन्त्र का निश्चित संख्या में नित्य १ से १० माला ‘जप’ करे। बाद में जब घर से निकले, तब अपने अभीष्ट कार्य का चिन्तन करे। इससे अभीष्ट कार्व सुगमता से पूरे हो जाते हैं।

सर्व कामना-सिद्धि स्तोत्र :

श्री हिरण्य-मयी हस्ति-वाहिनी, सम्पत्ति-शक्ति-दायिनी।
मोक्ष-मुक्ति-प्रदायिनी, सद्-बुद्धि-शक्ति-दात्रिणी।।१

सन्तति-सम्वृद्धि-दायिनी, शुभ-शिष्य-वृन्द-प्रदायिनी।
नव-रत्ना नारायणी, भगवती भद्र-कारिणी।।२

धर्म-न्याय-नीतिदा, विद्या-कला-कौशल्यदा।
प्रेम-भक्ति-वर-सेवा-प्रदा, राज-द्वार-यश-विजयदा।।३

धन-द्रव्य-अन्न-वस्त्रदा, प्रकृति पद्मा कीर्तिदा।
सुख-भोग-वैभव-शान्तिदा, साहित्य-सौरभ-दायिका।।४

वँश-वेलि-वृद्धिका, कुल-कुटुम्ब-पौरुष-प्रचारिका।
स्व-ज्ञाति-प्रतिष्ठा-प्रसारिका, स्व-जाति-प्रसिद्धि-प्राप्तिका।।५

भव्य-भाग्योदय-कारिका, रम्य-देशोदय-उद्भाषिका।
सर्व-कार्य-सिद्धि-कारिका, भूत-प्रेत-बाधा-नाशिका।

अनाथ-अधमोद्धारिका, पतित-पावन-कारिका।
मन-वाञ्छित॒फल-दायिका, सर्व-नर-नारी-मोहनेच्छा-पूर्णिका।।७

साधन-ज्ञान-संरक्षिका, मुमुक्षु-भाव-समर्थिका।
जिज्ञासु-जन-ज्योतिर्धरा, सुपात्र-मान-सम्वर्द्धिका।।८

अक्षर-ज्ञान-सङ्गतिका, स्वात्म-ज्ञान-सन्तुष्टिका।
पुरुषार्थ-प्रताप-अर्पिता, पराक्रम-प्रभाव-समर्पिता।।९

स्वावलम्बन-वृत्ति-वृद्धिका, स्वाश्रय-प्रवृत्ति-पुष्टिका।
प्रति-स्पर्द्धी-शत्रु-नाशिका, सर्व-ऐक्य-मार्ग-प्रकाशिका।।१०

जाज्वल्य-जीवन-ज्योतिदा, षड्-रिपु-दल-संहारिका।
भव-सिन्धु-भय-विदारिका, संसार-नाव-सुकानिका।।११

चौर-नाम-स्थान-दर्शिका, रोग-औषधी-प्रदर्शिका।
इच्छित-वस्तु-प्राप्तिका, उर-अभिलाषा-पूर्णिका।।१२

श्री देवी मङ्गला, गुरु-देव-शाप-निर्मूलिका।
आद्य-शक्ति इन्दिरा, ऋद्धि-सिद्धिदा रमा।।१३

सिन्धु-सुता विष्णु-प्रिया, पूर्व-जन्म-पाप-विमोचना।
दुःख-सैन्य-विघ्न-विमोचना, नव-ग्रह-दोष-निवारणा।।१४

ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं श्रीसर्व-कामना-सिद्धि महा-यन्त्र-देवता-स्वरुपिणी श्रीमहा-माया महा-देवी महा-शक्ति महालक्ष्म्ये नमो नमः।

ॐ ह्रीं श्रीपर-ब्रह्म परमेश्वरी। भाग्य-विधाता भाग्योदय-कर्त्ता भाग्य-लेखा भगवती भाग्येश्वरी ॐ ह्रीं।

कुतूहल-दर्शक, पूर्व-जन्म-दर्शक, भूत-वर्तमान-भविष्य-दर्शक, पुनर्जन्म-दर्शक, त्रिकाल-ज्ञान-प्रदर्शक, दैवी-ज्योतिष-महा-विद्या-भाषिणी त्रिपुरेश्वरी। अद्भुत, अपुर्व, अलौकिक, अनुपम, अद्वितीय, सामुद्रिक-विज्ञान-रहस्य-रागिनी, श्री-सिद्धि-दायिनी। सर्वोपरि सर्व-कौतुकानि दर्शय-दर्शय, हृदयेच्छित सर्व-इच्छा पूरय-पूरय ॐ स्वाहा।

ॐ नमो नारायणी नव-दुर्गेश्वरी। कमला, कमल-शायिनी, कर्ण-स्वर-दायिनी, कर्णेश्वरी, अगम्य-अदृश्य-अगोचर-अकल्प्य-अमोघ-अधारे, सत्य-वादिनी, आकर्षण-मुखी, अवनी-आकर्षिणी, मोहन-मुखी, महि-मोहिनी, वश्य-मुखी, विश्व-वशीकरणी, राज-मुखी, जग-जादूगरणी, सर्व-नर-नारी-मोहन-वश्य-कारिणी, मम करणे अवतर अवतर, नग्न-सत्य कथय-कथय।

अतीत अनाम वर्तनम्। मातृ मम नयने दर्शन। ॐ नमो श्रीकर्णेश्वरी देवी सुरा शक्ति-दायिनी। मम सर्वेप्सित-सर्व-कार्य-सिद्धि कुरु-कुरु स्वाहा। ॐ श्रीं ऐं ह्रीं क्लीं श्रीमहा-माया महा-शक्ति महा-लक्ष्मी महा-देव्यै विच्चे-विच्चे श्रीमहा-देवी महा-लक्ष्मी महा-माया महा-शक्त्यै क्लीं ह्रीं ऐं श्रीं ॐ।

ॐ श्रीपारिजात-पुष्प-गुच्छ-धरिण्यै नमः। ॐ श्री ऐरावत-हस्ति-वाहिन्यै नमः। ॐ श्री कल्प-वृक्ष-फल-भक्षिण्यै नमः। ॐ श्री काम-दुर्गा पयः-पान-कारिण्यै नमः। ॐ श्री नन्दन-वन-विलासिन्यै नमः। ॐ श्री सुर-गंगा-जल-विहारिण्यै नमः। ॐ श्री मन्दार-सुमन-हार-शोभिन्यै नमः। ॐ श्री देवराज-हंस-लालिन्यै नमः। ॐ श्री अष्ट-दल-कमल-यन्त्र-रुपिण्यै नमः। ॐ श्री वसन्त-विहारिण्यै नमः। ॐ श्री सुमन-सरोज-निवासिन्यै नमः। ॐ श्री कुसुम-कुञ्ज-भोगिन्यै नमः। ॐ श्री पुष्प-पुञ्ज-वासिन्यै नमः। ॐ श्री रति-रुप-गर्व-गञ्हनायै नमः। ॐ श्री त्रिलोक-पालिन्यै नमः। ॐ श्री स्वर्ग-मृत्यु-पाताल-भूमि-राज-कर्त्र्यै नमः।

श्री लक्ष्मी-यन्त्रेभ्यो नमः। श्रीशक्ति-यन्त्रेभ्यो नमः। श्रीदेवी-यन्त्रेभ्यो नमः।
श्री रसेश्वरी-यन्त्रेभ्यो नमः।
श्री ऋद्धि-यन्त्रेभ्यो नमः।
श्री सिद्धि-यन्त्रेभ्यो नमः।
श्री कीर्तिदा-यन्त्रेभ्यो नमः। श्रीप्रीतिदा-यन्त्रेभ्यो नमः। श्रीइन्दिरा-यन्त्रेभ्यो नमः।
श्री कमला-यन्त्रेभ्यो नमः। श्रीहिरण्य-वर्णा-यन्त्रेभ्यो नमः।
श्रीरत्न-गर्भा-यन्त्रेभ्यो नमः। श्रीसुवर्ण-यन्त्रेभ्यो नमः। श्रीसुप्रभा-यन्त्रेभ्यो नमः। श्रीपङ्कनी-यन्त्रेभ्यो नमः। श्रीराधिका-यन्त्रेभ्यो नमः। श्रीपद्म-यन्त्रेभ्यो नमः। श्रीरमा-यन्त्रेभ्यो नमः। श्रीलज्जा-यन्त्रेभ्यो नमः। श्रीजया-यन्त्रेभ्यो नमः। श्रीपोषिणी-यन्त्रेभ्यो नमः। श्रीसरोजिनी-यन्त्रेभ्यो नमः। श्रीहस्तिवाहिनी-यन्त्रेभ्यो नमः। श्रीगरुड़-वाहिनी-यन्त्रेभ्यो नमः। श्रीसिंहासन-यन्त्रेभ्यो नमः। श्रीकमलासन-यन्त्रेभ्यो नमः। श्रीरुष्टिणी-यन्त्रेभ्यो नमः। श्रीपुष्टिणी-यन्त्रेभ्यो नमः। श्रीतुष्टिनी-यन्त्रेभ्यो नमः। श्रीवृद्धिनी-यन्त्रेभ्यो नमः। श्रीपालिनी-यन्त्रेभ्यो नमः। श्रीतोषिणी-यन्त्रेभ्यो नमः। श्रीरक्षिणी-यन्त्रेभ्यो नमः। श्रीवैष्णवी-यन्त्रेभ्यो नमः। श्रीमानवेष्टाभ्यो नमः। श्रीसुरेष्टाभ्यो नमः। श्रीकुबेराष्टाभ्यो नमः। श्रीत्रिलोकीष्टाभ्यो नमः। श्रीमोक्ष-यन्त्रेभ्यो नमः। श्रीभुक्ति-यन्त्रेभ्यो नमः। श्रीकल्याण-यन्त्रेभ्यो नमः।

वरद विनायक मन्दिर का पता:

पता: वरद विनायक अष्टविनायक मन्दिर अम्बराज, महाराष्ट्र ४१५१०९७ कैसे पहुंचा जाये :-

 हवाई मार्ग से कैसे पहुँचें :

वरद विनायक महाड मन्दिर तक पहुंचने के लिए मुंबई और पुणे हवाई अड्डा निकटतम हवाई अड्डा है। इनमें से किसी भी हवाई अड्डे से राज्य परिवहन की बसें ले सकते हैं या इस अष्टविनायक मन्दिर तक पहुँचने के लिए टैक्सी किराए पर ले सकते हैं। बाय एयर निकटतम कामकाजी हवाई मार्ग यानी वायुयान मार्ग से निकटतम घरेलू हवाई अड्डा मुम्बई हवाईअड्डे के बाहर से कैब द्वारा यात्रा करके आप आसानी से पहुँच सकते हैं।

लोहपथगामिनी मार्ग से कैसे पहुँचें :

ट्रेन से: महाड़ का निकटतम रेलवे स्टेशन खोपोली है, जो लगभग ४ किलोमीटर दूर है वरद विनायक मंदिर से। कर्जत रेलवे स्टेशन पर भी उतर सकते हैं जो लगभग १६ किलोमीटर दूर है इस अष्ट विनायक मंदिर से।

सड़क मार्ग से कैसे पहुँचें :

आप ISBT से बस द्वारा अथवा अपनी कार से NH: ४८ से पँहुँच सकते है मन्दिर। इस मन्दिर की निकटवर्ती सड़कें यहाँ की सड़कें बेहतर है! आप २७ घण्टों में पहुँच सकते हैं। दिलो से १,४७४.४ किलोमीटर में पहुँचोगे इस मन्दिर! महाराष्ट्र राज्य परिवहन की बस द्वारा: खोपोली, महाबलेश्वर, कर्जत और अलीबाग जैसे प्रमुख शहरों से महाड बस स्टेशन के लिए MSRTC (महाराष्ट्र राज्य सड़क परिवहन निगम) की बसें अक्सर चलती हैं। वरद विनायक महाड़ का अष्टविनायक मन्दिर मुम्बई से ६८ किलोमीटर, पुणे से ८६ किलोमीटर, कर्जत से १७ किलोमीटर, लोनावाला से २१ किलोमीटर और खोपोली से ६ किलोमीटर दूर है। मन्दिर मुंबई-पुणे पुराने राजमार्ग से १.५ किलोमीटर दूर है।मुंबई-पनवेल-खोपोली रोड से भी महाड़ पहुंचा जा सकता है। 

श्री गणेश जी की जय हो। जयघोष होII

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