@ गांधीनगर गुजरात :-
गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री तथा देश के वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के कार्यकाल में गुजरात का कृषि एवं बागवानी क्षेत्र अभूतपूर्व परिवर्तन का साक्षी बना है। किसान-केंद्रित नीतियों, सिंचाई सुविधाओं तथा टेक्नोलॉजी के समन्वय से राज्य में विशेषकर बागवानी खेती को बहुत प्रोत्साहन मिला है। किसान परंपरागत खेती के बजाय बागवानी फसलों की खेती कर मोटी कमाई कर रहे हैं। गुजरात के स्ट्रॉबेरी हब के रूप में उभरे डांग जिले ने इस परिवर्तन का उत्तम उदाहरण प्रस्तुत किया है। अनुकूल जलवायु, प्राकृतिक खेती और बढ़ती बाजार मांग के कारण जिले में स्ट्रॉबेरी की खेती में लगातार वृद्धि हुई है। वर्ष 2022-23 में जहाँ 20 हेक्टेयर में स्ट्रॉबेरी की खेती होती थी, वहीं 2025-26 में बढ़कर 33 हेक्टेयर तक पहुँचने की संभावना है।

वर्ष 2025-26 में स्ट्रॉबेरी का उत्पादन 233 मीट्रिक टन पहुंचने की संभावना
मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल के नेतृत्व में डांग को देश का पहला प्राकृतिक (खेती करने वाला) जिला घोषित किया गया था। प्राकृतिक खेती को प्रोत्साहन मिलने से किसानों ने स्ट्रॉबेरी उत्पादन में उल्लेखनीय सफलता पाई है। स्ट्रॉबेरी का उत्पादन वर्ष 2022-23 में 140 मीट्रिक टन से बढ़कर 2024-25 में 196 मीट्रिक टन तक पहुँचा है, जबकि वर्ष 2025-26 में यह आँकड़ा 233 मीट्रिक टन तक पहुँचने का अनुमान है।
डांग जिले की जलवायु तथा भूमि स्ट्रॉबेरी की खेती के लिए अनुकूल मानी जाती है। स्ट्रॉबेरी की फसल पानी की उचित निकासी कर सकने वाली, जैविक तत्वों से भरपूर, रेतीली एवं दोमट भूमि में बढ़िया तरीके से होती है। इस जमीन का पीएच 5.5 से 7.0 के बीच होता है और यह हानिकारक सूक्ष्मजीवों से मुक्त मानी जाती है। इसके अलावा; अनुकूल वर्षा एवं शीतल वातावरण स्ट्रॉबेरी की खेती के लिए अधिक लाभदायी बनते हैं। स्ट्रॉबेरी अल्पकालिक फसल होने के कारण उसमें फल आने में तथा फल बनने के लिए 8 से 12 घण्टे सूर्य प्रकाश आवश्यक है, जबकि दिन में 22 से 25 और रात में 7 से 13 डिग्री सेल्सियस तापमान इस फसल के लिए आदर्श माना जाता है।
प्राकृतिक खेती से किसान आनंद ले रहे हैं स्ट्रॉबेरी की मिठास का
गुजरात सरकार के बागवानी विभाग द्वारा प्रशिक्षण शिविरों के आयोजन और मार्गदर्शन मिलने के कारण किसान प्राकृतिक खेती की ओर मुड़ रहे हैं। डांग को प्राकृतिक जिला घोषित किए जाने के बाद यहाँ प्राकृतिक पद्धति से होने वाली स्ट्रॉबेरी की खेती को नई पहचान मिली है। यहाँ किसान विंटर डॉन, अर्ली विंटर, कैमेरोजा, स्वीट चार्ली, नाभिला, नाबाडी, सेल्वा, बेलरूबी तथा पजेरो जैसी 9 किस्मों की स्ट्रॉबेरी की खेती कर रहे हैं। इसमें भी विंटर डॉन किसानों में सबसे लोकप्रिय है, क्योंकि दिसंबर से फरवरी-मार्च तक उसकी अच्छी उपज मिलती है।
डांग में ग्रामीण स्तर पर स्ट्रॉबेरी की खेती के विशिष्ट क्लस्टर विकसित हुए हैं। जिला मुख्यालय आहवा तहसील में भूरापाणी, बोरीगवठा, गलकुंड, कोटमदार, मालेगाँव, डभास, सोनुनिया तथा वनर गाँवों में बड़े पैमाने पर स्ट्रॉबेरी की खेती होती है, जबकि वघई तहसील में कंचनपाडा, घोडवहाल, मुरंबी एवं आसपास के गाँवों में स्ट्रॉबेरी की खेती उल्लेखनीय प्रमाण में हो रही है।
सरकार किसानों को देती है 55 से 75 प्रतिशत तक की सहायता
केन्द्र तथा राज्य सरकार द्वारा स्ट्रॉबेरी के पौधे तथा अन्य कृषि खर्च पर 55 से 75 प्रतिशत तक सहायता दी जाती है। इसके अलावा; प्लास्टिक कवर, मल्चिंग मटीरियल, प्लास्टिक क्रेट, पैकिंग मटीरियल तथा मिनी ट्रैक्टर, रोटावेटर, कल्टिवेटर एवं ट्रॉली जैसे कृषि मशीनरी-उपकरण के लिए भी सहायता उपलब्ध कराई जाती है। बागवानी विभाग द्वारा आयोजित होने वाले कार्यक्रमों तथा शैक्षणिक यात्राओं से किसान आधुनिक कृषि पद्धतियाँ अपनाकर अधिक उत्पादन प्राप्त कर रहे हैं।
स्ट्रॉबेरी की खेती से किसानों को प्रति हेक्टेयर 7 से 8 लाख रुपए तक की आय हो रही है
डांग के कई किसान आज स्ट्रॉबेरी की खेती कर आर्थिक प्रगति कर रहे हैं। पहले ये किसान समीपस्थ औद्योगिक क्षेत्रों तथा महाराष्ट्र के खेतों में मजदूरी करके जीवन निर्वाह करते थे। स्थानीय स्तर पर वे डांग, नागली, उड़द तथा वराई जैसी परंपरागत फसलों की खेती करते थे, जिसमें आय सीमित थी, लेकिन स्ट्रॉबेरी की खेती की ओर मुड़ने के बाद किसानों को अब प्रति हेक्टेयर वार्षिक लगभग 7 से 8 लाख रुपए तक की कमाई हो रही है। शुरुआत में सापुतारा तथा आहवा जैसे स्थानीय बाजारों में बिकने वाली स्ट्रॉबेरी अब अहमदाबाद, सूरत तथा भरूच जैसे बड़े बाजारों तक पहुँच रही है और साथ ही स्थानीय लोगों को मौसमी रोजगार के अवसर भी मिल रहे हैं।
