उत्तराखंड के चमोली जिले में स्थित फूलों की घाटी सतीश डबराल की कलम से
कश्मीर की खूबसूरती को देखकर कभी अमीर खुसरो के मुँह से निकला था – ‘गर फिरदौस बर रूये ज़मीं अस्त, अमी अस्तो अमी अस्तो’ यानि जमीं पर यदि कहीं स्वर्ग है तो यहीं है यहीं है. ..कश्मीर तो अब तक नहीं देखा पर चिर प्रतीक्षित ट्रैक फूलों की घाटी जाना हुआ तो उसी हिमालय की गोद में एक स्वर्ग यह अवश्य है ऐसा आभास हुआ।

उत्तराखंड के चमोली जिले में स्थित फूलों की घाटी (Valley of Flowers) अपनी अद्भुत प्राकृतिक सुंदरता और समृद्ध जैव विविधता के लिए पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। यूनेस्को (UNESCO) द्वारा विश्व धरोहर स्थल (World Heritage Site) की सूची में शामिल यह घाटी केवल एक ट्रैक नहीं, एक अनुभव है। समुद्र तल से लगभग 3,600 मीटर की ऊँचाई पर लगभग 87.5 वर्ग किलोमीटर में फैली इस घाटी में जुलाई से सितंबर के बीच 500 से अधिक प्रजातियों के फूल एक साथ खिलते हैं। हिमाच्छादित यह घाटी जून से अक्टूबर तक सैलानियों के लिए खुलती है व ट्रैकर्स की पसंदीदा जगह है।
देहरादून- बद्रीनाथ मार्ग पर गोबिन्दघाट से दाहिने हाथ को अलकनंदा नदी को पार कर बाऐं किनारे पर पहुँचना होता है। गोविंदघाट से घांघरिया तक का रास्ता पुष्पावती नदी के किनारे-किनारे चलता है। पहले गोबिन्दघाट से 18 किमी पैदल चलने के बाद घांघरिया पहुँचा जाता था परंतु अब गोबिन्दघाट से पुलना गाँव तक 4 किमी सड़क बन गई है जिस पर आपको लोकल टैक्सी लेकर ही जाना पड़ता है। अपना चार पहिया वाहन ले जाने की स्वीकृति नहीं है।

यहाँ से 14 किमी की पैदल यात्रा शुरू होती है। 2 किमी बाद जंगलचट्टी व उसके बाद 1-2 किमी के अंतराल पर डाडीताल, थेलाचट्टी व भ्यूँडार गाँव है जो रास्ते में खाने पीने की व्यवस्था रखते हैं। भ्यूँडार में रुकने की भी व्यवस्था है। यहाँ से 6-7 किमी चलकर घांघरिया पहुँचा जाता है। यह स्थान फूलों की घाटी व श्री हेमकुण्ड साहिब का बेस कैंप है। यहां पर रहने खाने की सारी सुविधाएं उपलब्ध हैं।
धार्मिक मान्यताओं और पौराणिक कथाओं के अनुसार रामायण में इस क्षेत्र का विशेष उल्लेख मिलता है। ऐसा माना जाता है कि जब लक्ष्मण जी मूर्छित हो गए थे तो सुषैन वैद्य के बताए अनुसार हनुमान जी उनके लिए संजीवनी बूटी की तलाश में इसी हिमालयी क्षेत्र में आए थे। यहाँ मिलने वाली दुर्लभ जड़ी-बूटियाँ और औषधीय पौधे पौराणिक कथाओं की संजीवनी बूटी की अवधारणा से मेल खाते हैं। प्राचीन ग्रंथों और स्थानीय लोक कथाओं में इस घाटी को ‘नंदन कानन’ (देवताओं का बगीचा) भी कहा गया है।
स्थानीय लोग और गढ़वाल के चरवाहे इस रहस्यमयी घाटी और इसके फूलों के बारे में सदियों से जानते थे, लेकिन वे यहाँ जाने से बचते थे क्योंकि इसे पवित्र और देवताओं का वास माना जाता था।

1931 में ब्रिटिश पर्वतारोही और वनस्पतिशास्त्री फ्रैंक एस. स्माइथ (Frank S. Smythe) अपने साथी आर. एल. होल्डसवर्थ के साथ माउंट कामेट के अभियान से लौटते समय गलती से इस घाटी तक पहुँचे। इस घाटी की सुंदरता से प्रभावित होकर फ्रैंक स्माइथ 1937 में दोबारा यहाँ आए और 1938 में ‘The Valley of Flowers’ नाम से एक प्रसिद्ध पुस्तक प्रकाशित की, जिसके बाद यह पूरी दुनिया की नजरों में आई।
सन 1982 में इसे राष्ट्रीय उद्यान (National Park) घोषित किया गया व 1988 में इसे नंदा देवी राष्ट्रीय उद्यान के साथ मिलाकर नंदा देवी बायोस्फीयर रिजर्व बनाया गया। वर्ष 2005 में यूनेस्को (UNESCO) ने इसे आधिकारिक तौर पर विश्व धरोहर स्थल (World Heritage Site) की सूची में शामिल किया।
फूलों की घाटी ट्रैक सिर्फ पैरों की यात्रा नहीं, मन की शांति की यात्रा है। जहाँ मोबाइल नेटवर्क खत्म होता है, वहाँ प्रकृति से आपका मन जुड़ता है। घाटी में जाते समय वन विभाग की चौकी है जहाँ निर्धारित शुल्क देय होता है व निर्देश मिलता है कि घाटी में रात में रुकना मना है और शाम 5 बजे तक घांघरिया लौटना होता है। फूलों की घाटी में प्लास्टिक ले जाना प्रतिबंधित है व फूलों को तोड़ना व छूना सख्त मना है। जंगली जानवरों की सुरक्षा व संवर्धन हेतु निर्देश रास्तों पर लिखे हैं।

फूलों की घाटी राष्ट्रीय उद्यान क्षेत्र में मुख्य रूप से गौरी पर्वत सबसे ऊँचा और प्रमुख पर्वत है, जो लगभग 6,719 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। इसके अलावा यहाँ से नीलगिरि पर्वत और सप्तश्रृंग जैसी बर्फीली हिमालयी चोटियाँ भी साफ़ दिखाई देती हैं। पुष्पावती नदी इसी क्षेत्र में स्थित टिपरा ग्लेशियर (गौरी पर्वत के पास) से निकलती है जो गोबिंदघाट पहुँचकर अलकनंदा नदी में मिल जाती है।
जुलाई-अगस्त में घाटी का नजारा सबसे अद्भुत होता है। ब्लू पॉपी, प्रिमुला, एनीमोन, जैस्मीन जैसे फूलों की चादर बिछी होती है। यहाँ हिमालयी काला भालू, कस्तूरी मृग, भरल और कई दुर्लभ तितलियाँ भी देखने को मिलती हैं। पुष्पावती नदी, बर्फ से ढके पहाड़ और बादलों के बीच से गुजरते हुए पहाड़ की ढलानों पर पुष्पों की छटा देख ऐसा लगता है जैसे प्रकृति ने खुद कैनवास पर रंग बिखेरे हों।

पुष्पावटी नदी को पार कर उसके दाहिने तट से घने जंगलों के बीच से कैंचीनुमा रास्ते पर ढाई तीन किमी सीधे चढाई चढने के बाद रास्ता कई जगहों पर खतरनाक भूस्खलन क्षेत्रों से गुजरते हुए वामणधौड़ तक जाता है। यहाँ से 1.5 किमी की दूरी तय करने के बाद माग्रेट लेगी ग्रेव तक जाया जाता है। फूलों की घाटी के मुख्य मार्ग से आधे किमी नीचे की ओर चलने पर यह जगह आती है।
लेडी जोआन मार्गरेट लेग्गी (Lady Joan Margaret Legge) इंग्लैंड की एक प्रसिद्ध वनस्पति वैज्ञानिक (Botanist) थी। पर्वतारोही फ्रैंक एस. स्माइथ (Frank S. Smythe) की पुस्तक “द वैली ऑफ फ्लावर्स” से प्रेरित होकर लेडी जोआन 1939 में भारत आई थीं। उन्हें लंदन के रॉयल बॉटैनिक गार्डन्स, क्यू (Royal Botanic Gardens, Kew) की ओर से इस घाटी की वनस्पतियों और दुर्लभ फूलों की प्रजातियों का अध्ययन करने व उनके नमूने (Samples) एकत्र करने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी।
4 जुलाई 1939 को फूलों की घाटी की खड़ी और पथरीली ढलानों पर फूल इकट्ठा करते समय अचानक उनका पैर फिसल गया। इस गहरी खाई में गिरने के कारण 54 वर्ष की उम्र में उनकी मृत्यु हो गई। स्थानीय लोगों की मदद से उनके शव को निकाला गया और उनकी बड़ी बहन डोरोथी (Dorothy) की इच्छा के अनुसार उन्हें उसी खूबसूरत घाटी में दफनाया गया। वर्ष 1943 में उनकी बहन ने उसी स्थान पर एक स्मारक (Tomb/Memorial) बनवाया जो आज भी फूलों की घाटी में मौजूद है। इस पर एक सुंदर पंक्ति लिखी है: “I will lift up mine eyes unto the hills, From whence cometh my help”.

“मेरी दृष्टि हिमालय के उन शिखरों तक जाएगी जहाँ से मुझे शक्ति आई है।” फूलों की घाटी आने वाले ट्रेकर्स और प्रकृति प्रेमी आज भी उन्हें श्रद्धांजलि देने वहाँ जाते हैं।
इस स्थान से आगे 2-3 किमी चलने के उपरान्त गौरी पर्वत की तलहटी में पुष्पावती नदी का समतल तल नजर आता है। इसके आगे आम पर्यटकों के लिए जाना वर्जित रहता है।
