@ नई दिल्ली :-
एक साफ-सुथरे शहर की पहचान अक्सर उन चीज़ों से होती है, जो अब दिखाई नहीं देतीं। सड़कों पर अब कचरा नहीं पड़ा होता। नालियाँ अब बंद नहीं रहतीं। ज़रूरत पड़ने पर साफ-सफाई की सुविधाएँ उपलब्ध होती हैं। लेकिन स्वच्छता तक के इस सफर के बदलाव के पीछे ऐसी कहानियाँ भी हैं, जिन्हें जानना ज़रूरी है। ये उन महिलाओं की कहानियाँ हैं, जो कचरे से रोज़गार पैदा कर रही हैं, अपने समुदायों में साफ-सफाई के कामों की अगुवाई कर रही हैं और रोज़मर्रा की चुनौतियों को अवसरों में बदल रही हैं। उनके साथ ट्रांसजेंडर समुदाय के लोग भी हैं, जो साफ-सफाई की सेवाओं में पेशेवर भूमिकाएँ और पहचान पा रहे हैं। अलग-अलग शहरों में, स्वच्छता अब सिर्फ एक सरकारी सेवा नहीं रह गई है। यह सम्मान, उद्यम, भागीदारी और अवसरों का ज़रिया बन रही है।

भागीदारी की इस भावना को स्वच्छता ही सेवा 2026 में एक राष्ट्रीय मंच मिला, जिसे 17 सितंबर 2026 को शुरू किया गया था। हर साल, यह अभियान नागरिकों, संस्थाओं और नेताओं को एक साथ लाता है, ताकि स्वच्छता के लिए स्वैच्छिक काम और सामूहिक प्रयासों को मज़बूत किया जा सके।
ऐसी सामूहिक भावना उत्तर प्रदेश के लोनी में साफ तौर पर दिखाई देती है, जहाँ कभी कचरा समझी जाने वाली चीज़ें अब रोज़गार का ज़रिया बन रही है।
जब कचरा बन जाए रोज़गार का ज़रिया
गौशालाओं और डेयरियों के आस-पास गाय का गोबर कचरा प्रबंधन की एक बड़ी चुनौती बन सकता है, क्योंकि यह नालियों और सीवेज चैनलों को जाम कर देता है। लेकिन लोनी की कृष्णा विहार कॉलोनी में महिलाओं के एक समूह ने आगे बढ़ने का एक अलग रास्ता चुना। उन्होंने गाय के गोबर से अगरबत्ती और लोबान कप बनाना शुरू किया।
गर्मियों के महीनों में, जब अगरबत्ती का उत्पादन सबसे ज़्यादा होता है, तो इस पहल से लगभग 40-50 महिलाओं को रोज़गार मिलता है। इन महिलाओं के लिए, यह काम सिर्फ कोई उत्पाद बनाने से कहीं ज़्यादा है। यह रोज़गार, सम्मान और कचरे को किसी उपयोगी चीज़ में बदलने की संतुष्टि को एक साथ लाता है। नगर पालिका परिषद भी इन उत्पादों की बिक्री से 25 प्रतिशत तक कमाई करती है। इससे कचरा प्रबंधन, स्थानीय उद्यम और नगरपालिका की कमाई के बीच एक कड़ी बनती है।

इन उत्पादों में ही दोबारा इस्तेमाल की कहानी छिपी है। आम तौर पर, अगरबत्ती जैसे उत्पादों को बनाने के लिए लकड़ी के बुरादे का इस्तेमाल बेस मटीरियल के तौर पर किया जाता है। इसमें लगभग 30-35 प्रतिशत सूखे गोबर का पाउडर मिलाने से लकड़ी के बुरादे की ज़रूरत कम हो जाती है। यह पर्यावरण के लिहाज़ से एक टिकाऊ समाधान बनकर उभरा है, जिससे स्वच्छता भी सुनिश्चित होती है।
और ये महिलाएं यहीं नहीं रुक रही हैं। गोबर से ईंधन के तौर पर जलने वाली लकड़ी बनाने की योजना पर भी काम हो रहा है, जिसका इस्तेमाल श्मशान घाटों, हवन और दूसरे कामों में किया जा सके। इस पहल के तहत गोबर से बने फूलों के गमलों पर भी विचार किया जा रहा है, जो बाद में खाद बनकर मिट्टी में मिल सकते हैं। यहां, स्वच्छता का मतलब सिर्फ कचरा हटाना नहीं है। इसका मतलब यह सोचना भी है कि उस कचरे से और क्या-क्या बनाया जा सकता है।
कचरा उठाने वालों से कचरा प्रबंधन के लीडर्स तक
बिहार के पटना में भी ऐसी ही सोच देखने को मिलती है, जहां महिलाएं पुरानी परंपराओं को तोड़ रही हैं और स्वच्छता को एक नया, समावेशी रूप दे रही हैं। शहर की पिंक मटीरियल रिकवरी फैसिलिटी (एमआरएफ) में कचरा प्रबंधन की प्रक्रिया में महिलाएं मुख्य भूमिका निभाती हैं। मुख्य रूप से महिलाओं द्वारा संचालित और एक महिला सुपरवाइज़र के नेतृत्व वाली यह फैसिलिटी सूखे और गीले कचरे को प्रोसेस करती है। यह हर दिन 2 टन सूखा कचरा और 1.5 टन गीला कचरा प्रबंधित कर सकती है।
पिंक एमआरएफ और मोबाइल पिंक टॉयलेट मिलकर सामाजिक न्याय, पर्यावरण के प्रति जागरूकता और आर्थिक अवसर को दर्शाते हैं। सबसे बड़ी बात, वे एक सरल संदेश देते हैं: जब महिलाओं को स्वच्छता के काम में जगह दी जाती है, तो वे सिर्फ व्यवस्था का हिस्सा नहीं बनतीं, बल्कि इसे नया रूप देने में मदद करती हैं।
अपने समुदाय को स्वच्छ करने वाली महिलाएँ
महिलाओं और स्वच्छता की कहानी सिर्फ कचरा संभालने तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह उन समुदायों तक भी पहुँचती है, जिनसे वे जुड़ी हैं। भोपाल में, 250 महिला ब्रांड एंबेसडर के एक समूह ने नगर निगम के साथ मिलकर सफाई और कचरा प्रबंधन पर काम किया है। इस समूह की सदस्यों ने सिंगल-यूज़ प्लास्टिक के इस्तेमाल को खत्म करने के लिए 25 वार्डों में ‘बर्तन बैंक’ भी शुरू किए हैं। सामुदायिक कार्यक्रमों और आयोजनों के लिए दोबारा इस्तेमाल होने वाले बर्तनों के सेट उपलब्ध कराकर, ये बैंक यह सुनिश्चित करते हैं कि स्थानीय कार्यक्रम कचरा पैदा किए बगैर आयोजित हों।
उत्तराखंड में, इस भावना को ‘बैनी सेना’ यानी ‘बहनों की सेना’ का नाम दिया गया है। 57 समूहों में बँटी 570 महिलाएँ अपने-अपने वार्डों में सफाई गतिविधियों पर नज़र रखती हैं। वे नागरिकों से बातचीत करती हैं, शिकायतों को पहुँचाने में मदद करती हैं, जागरूकता कार्यक्रम चलाती हैं और नगर प्रशासन तथा सफाई कर्मचारियों के बीच तालमेल बिठाने में सहयोग करती हैं। उनका काम वहाँ होता है, जहाँ वास्तव में किसी शहर की सफाई तय होती है। यह काम मोहल्लों में, बातचीत में और उन छोटे-छोटे पलों में आकार लेता है, जब कोई परवाह करने का फ़ैसला करता है।

शिलांग में, इन्नेहस्खेम सेल्फ-हेल्प ग्रुप ने कचरे के ज़रिए रोज़ी-रोटी का एक नया ज़रिया खोजा है। ये महिलाएँ घरों से गीला कचरा इकट्ठा करती हैं और बायोडिग्रेडेबल कचरे को खाद में बदलती हैं। पहले कचरा बीनने का काम करने वाली इन महिलाओं ने एक पुनर्वास पहल के तहत प्रशिक्षण लिया और खाद बनाने के काम को अपनी आजीविका का साधन बनाया। उनकी एकता की वजह से उन्हें प्यार से ‘मेरी मेडन्स ऑफ मार्टन’ नाम दिया गया।
अपनी रोज़मर्रा की कोशिशों से, ये महिलाएँ स्वच्छता को सिर्फ एक ज़िम्मेदारी के बजाय देखभाल की एक साझा संस्कृति में बदल रही हैं।
समावेशिता से बदला स्वच्छता का स्वरूप
ओडिशा में, ट्रांसजेंडर लोग ऐसी भूमिकाएँ निभा रहे हैं, जो उन्हें शहरी स्वच्छता व्यवस्था के केंद्र में लाती हैं। यह बदलाव कटक से शुरू हुआ, जहाँ म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन ने ट्रांसजेंडर लोगों को एक सेल्फ-हेल्प ग्रुप में संगठित किया। उन्हें प्रशिक्षण दिया गया और सेप्टेज ट्रीटमेंट प्लांट के संचालन और रखरखाव की ज़िम्मेदारी सौंपी गई।

बाद में यह मॉडल पूरे ओडिशा में फैल गया। शहरी स्थानीय निकायों ने मल-कीचड़ और सेप्टेज प्रबंधन (एफएसएसएम) और ठोस कचरा प्रबंधन के कामों में स्वयं सहायता समूहों के साथ मिलकर काम करना शुरू किया।
भुवनेश्वर में, स्वयं सहायता समूह स्वीकृति ने बसुआघाई में 75-केएलडी वाले फीकल स्लज ट्रीटमेंट प्लांट (एफएसटीपी) को चलाने और उसकी देखभाल करने की ज़िम्मेदारी ली। अपनी ज़िम्मेदारियाँ संभालने से पहले सदस्यों को ओरिएंटेशन और तकनीकी तथा प्रबंधन से जुड़ी ट्रेनिंग दी गई।
स्वीकृति की अध्यक्ष मेघना साहू के लिए यह बदलाव बहुत खास है। वह कहती हैं, “अब हम गर्व के साथ अपनी पहचान अपना सकते हैं और प्रोफेशनल क्षेत्र में हिस्सा ले सकते हैं।” वह उस गर्व के बारे में बताती हैं, जो उन्हें तब महसूस होता है, जब उनके समूह के सदस्य राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संस्थानों के छात्रों और आने वाले लोगों को अपने काम के बारे में बताते हैं। अहम बात सिर्फ नौकरी ही नहीं है, बल्कि यह भी है कि यह काम क्या-क्या मुमकिन बनाता है: प्रोफेशनल पहचान, आत्मविश्वास और पहचान मिलना।
भुवनेश्वर म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन ने सात सेसपूल वाहनों के संचालन और रखरखाव में भी ट्रांसजेंडर समूहों को शामिल किया है। ड्राइवरों और हेल्पर्स को कम से कम लागू मजदूरी पर काम पर रखा जाएगा। उन्हें स्वास्थ्य, साफ-सफाई, निजी सुरक्षा से जुड़े उपकरण और स्लज हटाने के तरीकों के बारे में प्रशिक्षण भी दिया जाएगा। ट्रांसजेंडरों के लिए रोज़गार के अवसर बढ़ाने की ओडिशा की इस नई पहल की काफा तारीफ हुई है। इसने दूसरों के लिए भी एक मिसाल कायम की है, जिससे साफ होता है कि कैसे सबकी भागीदारी बेहतर साफ-सफाई का रास्ता बना सकती है।
