@ गांधीनगर गुजरात :-
श्री सोमनाथ मंदिर में इको-फ्रेंड्ली प्रसाद पैकेजिंग की सफलता के बाद गुजरात प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (जीपीसीबी) अब इस मॉडल को आरासुरी अंबाजी माता मंदिर में शीघ्र ही लागू करेगा। इस पहल का उद्देश्य मंदिर में चढ़ाए जाने वाले प्रसाद की पैकेजिंग में सिंगल-यूज प्लास्टिक के उपयोग को कम करना है। जीपीसीबी द्वारा अहमदाबाद स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ डिजाइन (एनआईडी) की मदद से तैयार किए गए विकल्पों में गन्ने के वेस्ट से बनाए गए कंटेनर तथा दोबारा उपयोग में लिए जा सकने वाले टिन के कंटेनर शामिल हैं।

इस पहल का उद्देश्य प्लास्टिक कचरे को समाप्त कर यात्राधामों में इको-फ्रेंड्ली प्रबंधन को प्रोत्साहित करना है। साथ ही, प्रसाद वितरण की परंपरा के सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक महत्त्व को बनाए रखने का भी प्रयास है।
यह पहल प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की पर्यावरण के प्रति जागरूक जीवनशैली, जिम्मेदार उपभोग और जनभागीदारी के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण की परिकल्पना को साकार करने की दिशा में है। उनके इस विजन को मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल के नेतृत्व में राज्यभर में ठोस पर्यावरणीय कदमों के माध्यम से मूर्तरूप दिया जा रहा है।
श्री सोमनाथ मंदिर में अब प्रसाद का वितरण प्लास्टिक-मुक्त कागज के बॉक्स और दोबारा उपयोग में लिए जा सकने वाले टिन के डिब्बों में किया जाता है। इस नई इको-फ्रेंड्ली प्रसाद पैकेजिंग व्यवस्था का उद्घाटन मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल के करकमलों से 17 सितंबर, 2026 को किया गया था।
श्री सोमनाथ मंदिर में प्रतिदिन लगभग 4,200 किलोग्राम प्रसाद का वितरण लगभग 27,700 बॉक्स द्वारा किया जाता है। प्लास्टिक के पात्रों को हटाकर टिकाऊ विकल्पों का उपयोग करने से हर वर्ष 203 टन से अधिक प्लास्टिक के उपयोग को रोका जा सकेगा।
अंबाजी मंदिर में श्री सोमनाथ मॉडल लागू करने की तैयारी
श्री सोमनाथ मंदिर में मिली सफलता के आधार पर जीपीसीबी आरासुरी अंबाजी माता मंदिर में भी इसी तरह की पैकेजिंग व्यवस्था लागू करेगा।
वन एवं पर्यावरण मंत्री अर्जुन मोढवाडिया ने कहा, “अंबाजी मंदिर में सामान्य दिनों में लगभग 15,000 प्लास्टिक के प्रसाद बॉक्स का उपयोग होता है, जबकि त्योहारों एवं विशेष अवसरों पर इसकी मांग में उल्लेखनीय वृद्धि होती है। हर महीने लगभग 10 लाख बॉक्स वितरित किए जाते हैं, जिसके परिणामस्वरूप पैकेजिंग के कारण अनुमानित 11,299.5 किलोग्राम प्लास्टिक कचरा पैदा होता है।”
अर्जुन मोढवाडिया ने आगे कहा, “प्रसाद वितरण में इको-फ्रेंड्ली विकल्प अपनाने से अंबाजी में हर वर्ष लगभग 135.6 टन प्लास्टिक कचरे को रोका जा सकेगा। इन पैकेजिंग विकल्पों को इस तरह तैयार किया गया है कि वे प्रसाद वितरण के लिए आवश्यक स्वच्छता, कार्यक्षमता और सुविधा बनाए रखने के साथ-साथ उसकी सांस्कृतिक पहचान को भी संरक्षित रखें।”
धार्मिक संस्थाएँ लोगों के व्यवहार को प्रभावित करने की क्षमता रखती हैं। इस बात को ध्यान में रखते हुए जीपीसीबी ने अध्ययन किया कि प्रसाद रखने और ले जाने की परंपरागत पद्धति में पर्यावरणीय जिम्मेदारी को किस प्रकार शामिल किया जा सकता है। इस पहल का उद्देश्य पारंपरिक प्लास्टिक के पात्रों को ऐसी पैकेजिंग से बदलना है, जो पर्यावरण के अनुकूल, सांस्कृतिक रूप से उपयुक्त और मंदिर की कार्यप्रणाली के लिए व्यावहारिक हो।
एनआईडी द्वारा पर्यावरण-मित्र पैकेजिंग के विकल्प तैयार
उपयुक्त विकल्प विकसित करने के लिए जीपीसीबी ने अहमदाबाद स्थित एनआईडी की इंटीग्रेटेड डिजाइन सर्विसेज की पेशेवर डिजाइन कंसल्टेंसी के अंतर्गत सहायता ली थी।
श्री सोमनाथ मंदिर और आरासुरी अंबाजी माता मंदिर में स्थल पर अध्ययन किया गया था। इस अध्ययन में श्रद्धालुओं की आवाजाही, प्रसाद की मात्रा, प्रसाद बनाने और पैक करने की प्रक्रिया, भंडारण की स्थिति, वितरण की पद्धतियों तथा वर्तमान में उत्पन्न होने वाले कचरे की स्थिति का मूल्यांकन किया गया था।
अध्ययन में पाया गया कि सभी आवश्यकताओं के लिए एक ही प्रकार की पैकेजिंग उपयुक्त नहीं हो सकती। तत्काल उपयोग के लिए प्रसाद की पैकेजिंग हल्की और जैव-विघटनीय होनी आवश्यक थी, जबकि घर ले जाने या लंबी दूरी तक ले जाने वाले प्रसाद के लिए अधिक मजबूत और टिकाऊ पात्रों की आवश्यकता थी। इसलिए तत्काल उपयोग, सामान्य रूप से घर ले जाने और बार-बार उपयोग में लिए जा सकने वाली पैकेजिंग के लिए अलग-अलग विकल्प तैयार किए गए थे।
इस प्रक्रिया के परिणामस्वरूप प्लास्टिक-मुक्त कागज के बॉक्स, मोल्डेड गन्ने के बगास से बने कंटेनर और दोबारा उपयोग में लिए जा सकने वाले टिन के डिब्बों सहित विभिन्न विकल्प तैयार किए गए थे। कागज और बगास से बनी पैकेजिंग को इस तरह विकसित किया गया है कि कम अवधि तक उपयोग के बाद उसका पर्यावरण के अनुकूल तरीके से निपटान किया जा सके, जबकि टिन के डिब्बों को टिकाऊ पात्रों के रूप में तैयार किया गया है, जिन्हें श्रद्धालु अपने पास रखकर दोबारा उपयोग में ले सकते हैं।
वन एवं पर्यावरण राज्य मंत्री प्रवीण माळी ने कहा, “यह पहल केवल पारंपरिक पैकेजिंग को बदलने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य पर्यावरणीय जिम्मेदारी को धार्मिक आचरण का अभिन्न हिस्सा बनाना है। प्रमुख यात्राधामों पर जैव-विघटनीय और दोबारा उपयोग में लिए जा सकने वाले विकल्प प्रस्तुत करके जीपीसीबी यह दिखाना चाहता है कि सोच-समझकर किए गए डिजाइन, संस्थागत कदमों और जनभागीदारी के माध्यम से पर्यावरण को उल्लेखनीय लाभ पहुँचाया जा सकता है।”
यह पहल श्रद्धालुओं को अधिक टिकाऊ पद्धतियाँ अपनाने के लिए प्रोत्साहित करने के साथ-साथ यह भी दर्शाती है कि धार्मिक परंपराएँ पर्यावरण संरक्षण में किस प्रकार योगदान दे सकती हैं।
