@ नई दिल्ली :-
संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार के अंतर्गत राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) द्वारा ‘नक्सल मुक्त भारत’ शीर्षक से एक भव्य नाट्य प्रस्तुति का मंचन किया गया। इस विशेष प्रस्तुति के माध्यम से नक्सल हिंसा से प्रभावित क्षेत्रों की संघर्षपूर्ण परिस्थितियों से लेकर शांति, सुरक्षा, विकास और नई उम्मीदों की ओर बढ़ते भारत की यात्रा को प्रभावशाली ढंग से दर्शाया गया। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के निदेशक चित्तरंजन त्रिपाठी की परिकल्पना, पटकथा एवं निर्देशन में तैयार इस प्रस्तुति ने भारतीय समाज के संघर्ष, साहस और सामूहिक संकल्प की कहानी को मंच पर साकार किया।

इस भव्य आयोजन में करीब 2,000 कलाकारों ने हिस्सा लिया, जिनमें अधिकांश नक्सल प्रभावित राज्यों से आए कलाकार शामिल थे। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के कलाकारों के साथ समकालीन नृत्य कलाकारों तथा नौ राज्यों के आदिवासी और लोक कलाकारों ने अपनी प्रस्तुतियों के माध्यम से इस आयोजन को विशेष स्वरूप प्रदान किया। नाटकीय दृश्यों, सामूहिक अभिनय, प्रभावशाली वाचन, लोक संगीत, पारंपरिक नृत्य और समकालीन नृत्य शैलियों के समन्वय ने दर्शकों के सामने एक व्यापक सांस्कृतिक और सामाजिक चित्र प्रस्तुत किया।
प्रस्तुति का केंद्र भारत के वे वनांचल और आदिवासी क्षेत्र रहे, जहां के लोगों ने वर्षों तक हिंसा और अस्थिरता के बीच अपनी सांस्कृतिक पहचान, परंपराओं और प्रकृति से जुड़े जीवन को संजोकर रखा है। नाटक की कथा जल, जमीन और जंगल के प्रतीकात्मक स्वरूपों के माध्यम से आगे बढ़ती है। ये तीनों तत्व उस धरती की पीड़ा, संघर्ष और जीवटता के साक्षी बनकर सामने आते हैं, जहां कठिन परिस्थितियों के बावजूद लोगों ने बेहतर भविष्य की उम्मीद नहीं छोड़ी।
नाट्य प्रस्तुति में नक्सलवाद के विस्तार और उससे उत्पन्न सामाजिक चुनौतियों को भी प्रमुखता से दिखाया गया। भय, जबरन वसूली, हिंसा, शिक्षा में बाधा, बुनियादी सुविधाओं का अभाव, विस्थापन और कमजोर वर्गों, विशेषकर बच्चों के शोषण जैसी परिस्थितियों को मंच पर प्रभावशाली ढंग से उकेरा गया। इसके साथ ही देश की सुरक्षा में तैनात जवानों के साहस, बलिदान और कर्तव्यनिष्ठा को भी विशेष स्थान दिया गया।
प्रस्तुति में ग्रेहाउंड्स, डीआरजी, एसटीएफ, सी-60 कमांडो, एसओजी, झारखंड जगुआर और हॉक फोर्स जैसी विशेष सुरक्षा इकाइयों के योगदान को दर्शाया गया। इसके अतिरिक्त केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) और उसकी कोबरा इकाई, सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ), भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी), सशस्त्र सीमा बल (एसएसबी) तथा केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (सीआईएसएफ) की भूमिका को भी रेखांकित किया गया। व्यापक सुरक्षा अभियानों के संदर्भ में भारतीय वायु सेना के योगदान का भी उल्लेख किया गया।

हालांकि, ‘नक्सल मुक्त भारत’ की कहानी केवल संघर्ष और सुरक्षा अभियानों तक सीमित नहीं है। प्रस्तुति में विकास, पुनर्वास और सामाजिक बदलाव को भी उतनी ही प्रमुखता दी गई है। दूर-दराज के गांवों तक पहुंचती सड़कें, दोबारा खुलते विद्यालय, बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं और रोजगार के नए अवसर उन बदलावों को दर्शाते हैं, जो प्रभावित क्षेत्रों में नई संभावनाओं के द्वार खोल रहे हैं। हिंसा का रास्ता छोड़कर मुख्यधारा में लौटने वाले लोगों के पुनर्वास और उन्हें समाज में दोबारा सम्मानजनक स्थान दिलाने के प्रयासों को भी इस प्रस्तुति का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया गया है।
इस आयोजन की एक विशेष उपलब्धि भारत की विविध लोक एवं जनजातीय कलाओं का संगम रहा। महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, केरल, झारखंड, पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़ और ओडिशा के कलाकारों ने अपनी पारंपरिक कला शैलियों के माध्यम से भारतीय संस्कृति की समृद्ध विविधता को मंच पर प्रस्तुत किया। इसमें सोंगी मुखवटे, तारपा, गुडुम्बाजा, सैला, करमा, किसान, गुसाड़ी, लंबाड़ी, कोम्मू कोया, धीमसा, मंगाकाली, इरुला परंपराएं, मुंडारी, झुमैर, पुरुलिया छऊ, बेगा और नटुआ जैसी लोक एवं जनजातीय शैलियां शामिल रहीं। इन प्रस्तुतियों ने विभिन्न समुदायों की सांस्कृतिक पहचान, परंपराओं और जीवनशैली को जीवंत रूप में सामने रखा।

इतने बड़े स्तर पर इस नाट्य प्रस्तुति को साकार करने में कोरियोग्राफरों, कला निर्देशकों, सहायक निर्देशकों, समन्वयकों, स्वयंसेवकों, कंप्यूटर ग्राफिक्स विशेषज्ञों और तकनीकी टीम के सदस्यों की महत्वपूर्ण भूमिका रही। सभी के सामूहिक प्रयासों ने इस आयोजन की रचनात्मक परिकल्पना को भव्य मंचीय स्वरूप प्रदान किया।
प्रस्तुति के अंतिम चरण में संघर्ष और अनिश्चितता से निकलकर आशा, विश्वास और विकास की ओर बढ़ते समाज की तस्वीर दिखाई गई। जहां कभी भय और सन्नाटा था, वहां अब आत्मविश्वास, लोकगीतों और नई गतिविधियों की गूंज सुनाई देती है। जल, जमीन और जंगल को जीवन, सम्मान और सामूहिक भविष्य के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत करते हुए एक ऐसे भारत की कल्पना सामने रखी गई, जहां हर नागरिक को सुरक्षित और सम्मानजनक जीवन जीने का अवसर मिले।

राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के निदेशक चित्तरंजन त्रिपाठी ने कहा, “नक्सल मुक्त भारत उन समुदायों की यात्रा को मंच पर जीवंत करने का एक प्रयास है, जिन्होंने लंबे समय तक संघर्ष और हिंसा का सामना किया है और आज शांति, सम्मान तथा विकास पर आधारित भविष्य की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। जल, जमीन और जंगल के प्रतीकात्मक स्वरूपों के माध्यम से हमने ऐसी कहानी कहने का प्रयास किया है, जो हमारे सुरक्षा बलों के साहस और बलिदान का सम्मान करती है, आदिवासी समुदायों की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का उत्सव मनाती है और विकास, अवसर तथा पुनर्वास की परिवर्तनकारी शक्ति को सामने लाती है। विभिन्न सांस्कृतिक पृष्ठभूमियों से आए करीब 2,000 कलाकारों को एक साथ लाना अपने आप में एक उल्लेखनीय सामूहिक प्रयास रहा है। इस प्रस्तुति का मूल संदेश यही है कि स्थायी शांति केवल सुरक्षा से नहीं, बल्कि विश्वास, समावेशिता और प्रत्येक नागरिक के बेहतर भविष्य की उम्मीद से निर्मित होती है।”
‘नक्सल मुक्त भारत’ केवल एक नाट्य प्रस्तुति नहीं, बल्कि देश की सुरक्षा में जुटे जवानों के साहस, संघर्ष प्रभावित समुदायों के धैर्य और एक समावेशी समाज के निर्माण के संकल्प को समर्पित एक सांस्कृतिक अभिव्यक्ति है। संघर्ष की चुनौतियों से विकास की संभावनाओं तक की इस यात्रा के माध्यम से राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय ने एक ऐसे भारत की परिकल्पना प्रस्तुत की, जो एकता, शांति, समृद्धि और सामूहिक प्रगति के संकल्प के साथ आगे बढ़ रहा है।
