पहले खुद बनाया आधार, अब दूसरों के लिए बने तारनहार

@ कमल उनियाल उत्तराखंड :-

उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में शुद्ध कृषि आधारित जीवन पद्धति थी। जिस कारण गम्भीर से गम्भीर बीमारियों का नामोनिशान दूर तक नहीं था। इसका मुख्य कारण था पारम्परिक शूद्ध जैविक खेती और इसका खाना कभी यहाँ खेतो में कोदा, धान, झंगोरा, चौलाई, पहाड़ी दाल गहत, तोर, भट्ट, मसूर, सब्जियों में तोरी लोकी, परमल स्कोश, भिन्डी,अदरक हल्दी, अरबी मूली प्रयाप्त मात्रा होती थी।

लेकिन अब पलायन और जंगली जानवरों के कारण यहाँ की खेती विलुप्त के कगार पर खडी है। क्योंकि यहाँ की कृषि को सम्भालने और संवर्द्धन करने वाले पलायन कर गये। पर कुछ माटी के लाल अभी भी है जिन्हें अपनी मिट्टी से प्यार है और वे अपने पुरखो की भूमी को हरियाली में तब्दील कर रहे हैं।

ऐंसी ही माटी के लाल है ग्राम सभा भदाली खाल के उपग्राम भ्युँलेत विकास खंड दुगड्डा निवासी प्रेम सिंह रावत जिनकी मेहनत ने भूमी की शक्ल बदल दी और बेकार पडी भूमी हरियाली में तब्दील हो गयी। उनकी मेहनत की पसीना की धार रंग लायी उन्के खेतो में चबूतरा, माल्टा, मौसमी, नींबू के पेड़ की बागवानी लहलहा रही है। साथ में उन्होने पारम्परिक सब्जी गीँठी, अरबी, प्याज लहसुन, कटहल, मैथी, बैंगन, सीताफल, लौकी परमल, आलू गोभी का उत्पादन करके स्वरोजगार के क्षेत्र में मेहनत और कर्मठता की कहानी गढ डाली।

बागवानी और स्वरोजगार को बढावा देने के लिए प्रेम सिंह रावत ने बिना बीज वाली शीड लैस नीबू के 300 पौधा झारखंड से मंगाये अपनी मिट्टी से अगाध प्रेम करने वाले प्रेम सिंह रावत ने काष्ठ कला तथा लेडीज कपड़े सीलने में भी महारत हासिल किया है। खेती के काम से निपट कर वे कपड़े सीलते है और जरूरतमंद महिलाओं को सिलाई प्रशिक्षण भी देते हैं। हुनर के धनी प्रेम रावत सीमेंट आदि के खाली कट्टो के रेशो से कालीन, गुलदस्ता, मेजपोश, बैग बनाते हैं जिनकी बाजार में काफी माँग है।

प्रेम सिंह रावत के दो पुत्र सरकारी सेवा में कार्यरत है पर अपनी माटी से प्रेम करने वाले प्रेम सिंह रावत युवाओ के लिए प्रेरणासोत्र है और यूवाओ को संदेश दे रहे हैं कि पहाडों में रोजगार की अपार सम्भावना है। मछली पालन, पशुपालन, बकरी पालन, मधुमक्खी पालन करके पहाडो में ही रह कर खुशाल जीवन बनाया जा सकता है।

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