@ भावनगर गुजरात :-
भावनगर के गारियाधार गांव के किसान हिरेनभाई नाकराणी के पास 12 बीघा जमीन है। वे वर्षों से कपास की खेती कर रहे हैं। कपास की फसल में वे हर वर्ष 400 किलोग्राम यूरिया और 290 किलोग्राम डीएपी का उपयोग करते थे। इससे उनकी खेती की लागत अधिक रहती थी और उत्पादन केवल 200 मन तक ही सीमित रहता था।

हिरेनभाई ने ग्रामसेवक की सलाह पर भावनगर की सॉइल टेस्टिंग प्रयोगशाला में अपने खेत की मिट्टी की जांच करवाई। मिट्टी परीक्षण के बाद सॉइल हेल्थ कार्ड में दी गई सिफारिशों के अनुसार उन्होंने अपने खेत में यूरिया का उपयोग 180 किलोग्राम तथा डीएपी का उपयोग 140 किलोग्राम कर दिया। इस प्रकार 220 किलोग्राम यूरिया और 150 किलोग्राम डीएपी की बचत हुई, जिससे खेती की लागत लगभग आधी हो गई। साथ ही वैज्ञानिक सिफारिशों के अनुसार उर्वरकों के उपयोग से उत्पादन भी 200 मन से बढ़कर 281 मन हो गया।
हिरेनभाई कहते हैं, “पहले हम अंधेरे में तीर चलाते थे। अधिक उत्पादन पाने के लिए अंधाधुंध उर्वरकों की बोरियां खेत में डालते रहते थे और जमीन को नुकसान पहुंचाते थे। लेकिन जब हमारे हाथ में सॉइल हेल्थ कार्ड आया, तब पता चला कि यह तो हमारी जमीन की एक्स-रे रिपोर्ट है। अब हम सिफारिश के अनुसार जितनी आवश्यकता होती है, उतना ही उर्वरक उपयोग करते हैं। इससे लागत आधी हो गई है और फसल भरपूर होने लगी है।”
भावनगर के हिरेनभाई की तरह राज्य के लाखों किसानों ने पिछले दो दशकों में 2.23 करोड़ से अधिक सॉइल हेल्थ कार्ड निःशुल्क बनवाए हैं। चालू वर्ष में भी राज्य और केंद्र सरकार के संयुक्त प्रयासों से जमीन के 2.18 लाख नमूनों की जांच कर सॉइल हेल्थ कार्ड जारी करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।
सॉइल हेल्थ कार्ड से खेती की लागत कम होने और आय बढ़ने के अलावा भूमि अधिक स्वस्थ और उपजाऊ भी बनती है। सुरेंद्रनगर जिले के लिखतर तहसील के किसान अरुणभाई मेणिया ने अपना अनुभव साझा करते हुए कहा, “सॉइल हेल्थ कार्ड के कारण मेरी जमीन की जांच हुई और मैंने जैविक खाद का उपयोग शुरू किया। इसके परिणामस्वरूप मेरे खेत की कठोर हो चुकी जमीन नरम हो गई और मिट्टी की नमी बनाए रखने की क्षमता में वृद्धि हुई।” इस प्रकार हिरेनभाई और अरुणभाई जैसे अनेक किसानों की खेती में सॉइल हेल्थ कार्ड के माध्यम से बड़ा परिवर्तन आया है।
सॉइल टेस्टिंग के लिए मिट्टी का नमूना कैसे लें?
सहायक कृषि निदेशक सापरिया बताते हैं कि सॉइल हेल्थ कार्ड से सटीक परिणाम प्राप्त करने के लिए निर्धारित पद्धति से मिट्टी का नमूना लेना अत्यंत आवश्यक है। खेत की मेड़, रास्ते, पानी भरने वाले क्षेत्र अथवा पेड़ों की छाया से दूर रहकर एक हेक्टेयर क्षेत्र में 10 से 20 अलग-अलग स्थानों से जिग-जैग पद्धति द्वारा 15 से 20 सेंटीमीटर गहरा गड्ढा खोदकर नमूना लेना चाहिए। एकत्रित मिट्टी को अच्छी तरह मिलाकर चार भागों में बांटना चाहिए और उनमें से दो भाग अलग कर देने चाहिए। इसके बाद शेष मिट्टी को पुनः मिलाकर उसमें से 500 ग्राम मिट्टी का नमूना परीक्षण के लिए भेजना चाहिए। इस प्रक्रिया से परीक्षण का परिणाम अधिक सटीक प्राप्त होता है।

सॉइल हेल्थ कार्ड की अवधारणा और विस्तार
वर्ष 2003-04 में गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देखा कि राज्य में रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग के कारण धरती माता अपनी उर्वरता खो रही है। उन्होंने विचार किया कि यदि मनुष्य के शरीर की जांच के लिए प्रयोगशाला परीक्षण किए जा सकते हैं, तो धरती माता के स्वास्थ्य की जांच क्यों नहीं की जा सकती? इसी विचार से ‘सॉइल हेल्थ कार्ड योजना’ का जन्म हुआ।
गुजरात ने देश में सबसे पहले यह प्रयोग किया और इसके सकारात्मक परिणामों को देखते हुए वर्ष 2015 में प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेन्द्र मोदी ने इस योजना को राष्ट्रीय स्तर पर लागू किया। आज यह उनके कार्यकाल की ऐसी मूक क्रांति मानी जाती है, जिसने देश के अनेक किसानों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाया है।
देश के किसी छोटे से गांव में बैठा किसान जब विज्ञान और खेती के इस समन्वय की बात करता है, तब यह समझ में आता है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में ग्रामीण अर्थव्यवस्था में कितना बड़ा परिवर्तन आया है। ‘स्वस्थ धरा, खेत हरा’ का जो नारा वर्षों पहले गुजरात की धरती से गूंजा था, वह आज देश के करोड़ों किसानों के जीवन में बदलाव लाने वाला महामंत्र बन चुका है।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के शासनकाल के वर्ष इस बात का प्रमाण हैं कि वास्तविक क्रांति वही होती है, जो जमीन से जुड़ी होती है। सॉइल हेल्थ कार्ड आज भारतीय कृषि क्षेत्र का एक सुरक्षा कवच बन चुका है। जब देश की भूमि स्वस्थ होती है, तभी किसान समृद्ध बनता है और यही समृद्धि ‘आत्मनिर्भर भारत’ की वास्तविक नींव है।
