बेंगलुरु में उपराष्ट्रपति ने मानवीय मूल्यों के प्रसार के लिए आर्ट ऑफ लिविंग की प्रशंसा की

@ नई दिल्ली :-

बेंगलुरु में उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन ने आर्ट ऑफ लिविंग फाउंडेशन के 45 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में आयोजित वैश्विक समारोह में भाग लिया और शांति, सद्भाव, सेवा और आध्यात्मिक जागरूकता के मूल्यों को विश्व भर में फैलाने के लिए संगठन की प्रशंसा की।

उपराष्ट्रपति ने उपस्थित जनसमूह को संबोधित करते हुए कहा कि आर्ट ऑफ लिविंग आंदोलन ने महाद्वीपों, संस्कृतियों और पीढ़ियों में लाखों लोगों के जीवन को छुआ है। संगठन की वैश्विक पहुंच की सराहना करते हुए उन्होंने बताया कि आर्ट ऑफ लिविंग के लगभग 180 देशों में केंद्र हैं।

उपराष्ट्रपति ने कहा कि साढ़े चार दशक पहले “आंतरिक शांति ही बाहरी सद्भाव की नींव है” के सिद्धांत पर स्थापित यह आंदोलन करुणा, सहनशीलता और आनंद को बढ़ावा देने वाली एक प्रमुख मानवीय और आध्यात्मिक शक्ति के रूप में विकसित हुआ है।

उपराष्ट्रपति ने भक्ति के गहरे अर्थ पर विचार करते हुए कहा कि भक्ति केवल समर्पण नहीं है, बल्कि स्वयं, परिवार, समाज, राष्ट्र और मानवता के प्रति समर्पण है। उन्होंने कहा कि आध्यात्मिकता लोगों को दूसरों के साथ शांतिपूर्वक रहना सिखाती है और जीवन को सार्थक और परिपूर्ण बनाती है।

उपराष्ट्रपति ने गुरुदेव श्री श्री रवि शंकर की प्रशंसा करते हुए कहा कि संघर्ष और अनिश्चितता से भरे इस संसार में गुरुदेव ज्ञान, जागरूकता, शांति और सद्भाव के मूल्यों से मानवता को प्रेरित करते रहते हैं। उन्होंने कहा कि गुरुदेव की सरलता, विनम्रता और करुणा ने विश्व भर में लाखों लोगों को प्रभावित किया है।

उपराष्ट्रपति ने कहा कि ध्यान, सेवा, शिक्षा, ग्रामीण विकास, पर्यावरण संबंधी पहलों और अंतरधार्मिक संवाद के माध्यम से आर्ट ऑफ लिविंग ने सामाजिक परिवर्तन में आध्यात्मिकता की महत्वपूर्ण भूमिका को प्रदर्शित किया है। ध्यान और एकाग्रता के महत्व पर बल देते हुए उन्होंने कहा कि एकाग्र मन असाधारण उपलब्धियां प्राप्त कर सकता है।

उपराष्ट्रपति ने कहा कि गुरुदेव ने समाज के समक्ष एक प्रेरणादायक आदर्श प्रस्तुत किया है जिसमें युवा प्राचीन और आधुनिक को साथ लेकर चल सकते हैं। आधुनिकता और प्राचीन विरासत के गहरे पूरक होने पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने संगठन की सेवा-उन्मुख पहलों में युवाओं की बढ़ती भागीदारी की सराहना की।

उन्‍होंने रॉक सत्संग और भजन क्लबिंग जैसी पहलों का उल्लेख करते हुए कहा कि ये प्रयास भारत की प्राचीन ज्ञान परंपराओं को समकालीन रूप में पुनर्जीवित कर रहे हैं जो विश्व भर की युवा पीढ़ी के साथ प्रतिध्वनित होते हैं।

उपराष्ट्रपति ने आर्ट ऑफ लिविंग फाउंडेशन के नशामुक्त भारत अभियान की भी प्रशंसा की और इस बात पर बल दिया कि युवाओं को हानिकारक व्यसनों के बजाय आत्म-संयम और सकारात्मक मूल्यों द्वारा निर्देशित होना चाहिए।

उपराष्ट्रपति ने भारत की बढ़ती वैश्विक प्रतिष्ठा पर प्रकाश डालते हुए कहा कि देश आज इतिहास के एक अद्वितीय मोड़ पर खड़ा है, आत्मविश्वास से भरपूर, महत्वाकांक्षी और वैश्विक स्तर पर नेतृत्वकारी भूमिका निभा रहा है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी द्वारा सभ्यतागत ज्ञान, योग, स्वास्थ्य, स्थिरता और ‘वसुधैव कुटुंबकम’ पर दिया गया जो आर्ट ऑफ लिविंग फाउंडेशन द्वारा प्रचारित मूल्यों के साथ पूरी तरह मेल खाता है।

उपराष्ट्रपति ने आंदोलन के स्वयंसेवकों की प्रशंसा करते हुए उन्हें “सेवा के मौन शिल्‍पकार” बताया, जिन्होंने इस मिशन को विश्व के कोने-कोने तक पहुंचाया है। उन्होंने कहा कि एक व्यक्ति का रूपांतरण भी पूरे परिवार को सशक्त बनाता है और अंततः पूरे समुदायों को शक्ति प्रदान करता है।

उपराष्ट्रपति ने आर्ट ऑफ लिविंग परिसर में स्थित गणपति मंदिर में प्रार्थना भी की और आर्ट ऑफ लिविंग फाउंडेशन का एक स्मारक डाक टिकट जारी किया।

इस अवसर पर कर्नाटक के राज्यपाल थावरचंद गहलोत, गुरुदेव श्री श्री रवि शंकर, आर्ट ऑफ लिविंग फाउंडेशन के सदस्य, भारत और विदेश के गणमान्य व्यक्ति और हजारों भक्त एवं स्वयंसेवक उपस्थित थे।

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