भारत में बच्चों की मृत्यु दर में उल्लेखनीय गिरावट आई : UNIGME

@ नई दिल्ली :-

भारत ने बाल स्वास्थ्य के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल करते हुए वैश्विक स्तर पर अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई है। संयुक्त राष्ट्र की इंटर-एजेंसी ग्रुप फॉर चाइल्ड मॉर्टेलिटी एस्टीमेशन (UNIGME) रिपोर्ट 2025 के अनुसार, देश में बच्चों की मृत्यु दर में उल्लेखनीय गिरावट आई है, जो सरकार के निरंतर और व्यापक प्रयासों का परिणाम है।

रिपोर्ट के मुताबिक, दक्षिण एशिया क्षेत्र में वर्ष 1990 के बाद से पाँच वर्ष से कम आयु के बच्चों की मृत्यु दर में 76 प्रतिशत और वर्ष 2000 के बाद से 68 प्रतिशत की कमी आई है। इस उपलब्धि में भारत की भूमिका बेहद अहम रही है। वर्ष 2000 में जहाँ प्रति 1,000 जीवित जन्मों पर 92 बच्चों की मृत्यु होती थी, वहीं 2024 तक यह संख्या घटकर लगभग 32 रह गई है।

भारत में बाल मृत्यु दर में कमी लाने के पीछे कई प्रमुख स्वास्थ्य पहलों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। सार्वभौमिक टीकाकरण कार्यक्रम (UIP), नवजात शिशुओं की देखभाल के लिए विशेष सुविधाएँ, और IMNCI (Integrated Management of Neonatal and Childhood Illnesses) जैसी योजनाओं ने बच्चों की जीवन रक्षा दर को बेहतर बनाया है।

इन प्रयासों के चलते निमोनिया, डायरिया, मलेरिया और जन्म से जुड़ी जटिलताओं जैसी रोके जा सकने वाली बीमारियों से होने वाली मौतों में भी उल्लेखनीय कमी आई है। विशेषज्ञों का मानना है कि अधिकांश बाल मृत्यु को समय पर उपचार और सही देखभाल से रोका जा सकता है।दक्षिण एशिया में वर्ष 2000 के बाद से नवजात मृत्यु दर में करीब 60 प्रतिशत और 1 से 59 महीने के बच्चों की मृत्यु दर में 75 प्रतिशत से अधिक की कमी दर्ज की गई है। इसमें भारत द्वारा किए गए प्रयास—जैसे कुशल प्रसव सहायता, स्पेशल न्यूबॉर्न केयर यूनिट्स (SNCUs) का विस्तार, तथा गर्भावस्था और प्रसव के बाद की देखभाल—अहम साबित हुए हैं।

हालाँकि क्षेत्र में प्रगति तेज रही है, फिर भी वैश्विक स्तर पर होने वाली कुल बाल मृत्यु में लगभग 25 प्रतिशत हिस्सेदारी दक्षिण एशिया की है। ऐसे में भारत अब नवजात मृत्यु दर, समय से पहले जन्म (प्रीमैच्योरिटी), और जन्म से जुड़ी जटिलताओं जैसी चुनौतियों पर विशेष ध्यान दे रहा है। साथ ही शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों तथा राज्यों के बीच असमानताओं को दूर करने पर भी जोर दिया जा रहा है।

भारत सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) को हासिल करने के लिए प्रतिबद्ध है। इसके तहत वर्ष 2030 तक पाँच वर्ष से कम आयु के बच्चों की मृत्यु दर को 25 प्रति 1,000 और नवजात मृत्यु दर को 12 प्रति 1,000 तक लाने का लक्ष्य रखा गया है।

भारत की यह सफलता दर्शाती है कि बड़े और विविध देश में भी योजनाबद्ध रणनीति, मजबूत नीतियाँ और निरंतर प्रयासों से बड़े बदलाव संभव हैं। वैश्विक स्तर पर जहाँ बाल मृत्यु दर में कमी की रफ्तार धीमी हो रही है, वहीं भारत का मॉडल अन्य देशों के लिए प्रेरणा बनकर उभर रहा है।
स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार और जन-जागरूकता के साथ, भारत आने वाले वर्षों में बाल स्वास्थ्य के क्षेत्र में और भी बड़ी उपलब्धियाँ हासिल करने की दिशा में अग्रसर है।

भारत ने बाल जीवन रक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति हासिल की है। यह उपलब्धि संयुक्त राष्ट्र की इंटर-एजेंसी ग्रुप फॉर चाइल्ड मॉर्टेलिटी एस्टिमेशन (UNIGME) की नवीनतम रिपोर्ट में सामने आई है।

रिपोर्ट के अनुसार, नवजात मृत्यु दर (NMR) में लगभग 70 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है। वर्ष 1990 में प्रति 1,000 जीवित जन्मों पर 57 मौतों के मुकाबले यह दर वर्ष 2024 में घटकर 17 रह गई है। यह मातृ एवं नवजात स्वास्थ्य सेवाओं में लगातार सुधार का परिणाम है। पांच वर्ष से कम आयु के बच्चों की मृत्यु दर (U5MR) में भी उल्लेखनीय गिरावट आई है। यह दर 1990 में 127 से घटकर 2024 में 27 पर पहुंच गई है, जो लगभग 79 प्रतिशत की कमी को दर्शाती है।

ये उपलब्धियां मजबूत होते स्वास्थ्य तंत्र, टीकाकरण के दायरे के विस्तार, संस्थागत प्रसव में वृद्धि और बच्चों के लिए लक्षित स्वास्थ्य कार्यक्रमों के प्रभाव को दर्शाती हैं। इन प्रयासों के चलते भारत वैश्विक स्तर पर बाल मृत्यु दर में कमी लाने में एक महत्वपूर्ण योगदानकर्ता के रूप में उभरकर सामने आया है।

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