@ गांधीनगर गुजरात :-
अनुशासन, खेल भावना और टीम वर्क– ये ऐसे मूल्य हैं, जो कोई पाठ्यपुस्तक नहीं, बल्कि खेल का मैदान सिखाता है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, जो दृढ़तापूर्वक यह मानते हैं कि खेल व्यक्ति के समग्र विकास के लिए अत्यंत आवश्यक है, ने गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री के रूप में जिला स्तरीय स्पोर्ट्स स्कूल (डीएलएसएस) योजना शुरू की थी। आज, मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल के मार्गदर्शन में यह योजना प्रतिभाशाली खिलाड़ियों को निःशुल्क शिक्षा के साथ–साथ खेल का प्रशिक्षण प्रदान कर उनकी प्रतिभा को तराशने में अहम भूमिका निभा रही है।

खेल, युवा और सांस्कृतिक गतिविधियां विभाग के अधीन कार्यरत गुजरात खेल प्राधिकरण (एसएजी) ने खेल प्रशिक्षण और स्कूली शिक्षा के दोहरे लक्ष्यों को पूरा करने के लिए वर्ष 2013-14 में जिला स्तरीय स्पोर्ट्स स्कूल योजना शुरू की थी। टैलेंट आइडेंटिफिकेशन (प्रतिभा खोज) की प्रक्रिया के अंतर्गत खिलाड़ियों का चयन दो श्रेणियों में किया जाता है, एक यंग टैलेंट और दूसरा प्रूवन टैलेंट (किसी खेल में उपलब्धि हासिल करने वाले)। चयनित खिलाड़ियों को निःशुल्क शिक्षा, पुस्तकें और स्टेशनरी, निवास, भोजन, स्कूल गणवेश, स्पोर्ट्स किट, गहन प्रशिक्षण और स्टाइपैंड जैसे लाभ दिए जाते हैं। डीएलएसएस योजना के अंतर्गत खिलाड़ियों को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से प्रशिक्षण दिया जाता है। राज्य से राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी तैयार करने में जिला स्तरीय स्पोर्ट्स स्कूल की भूमिका उल्लेखनीय रही है।
पिछले 2 वर्षों के दौरान राज्य स्तर पर आयोजित विभिन्न खेल प्रतियोगिताओं में डीएलएसएस स्कूल के खिलाड़ियों ने कुल 3444 मेडल और राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित प्रतियोगिताओं में कुल 335 मेडल जीते हैं। वहीं, अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में 4 खिलाड़ियों ने हिस्सा लिया और 1 कांस्य पदक जीता है।
गुजरात में 39 जिला स्तरीय स्पोर्ट्स स्कूल संचालित, योजना के तहत 2025-26 में कुल 95.75 करोड़ रुपए खर्च किए गए
राज्य में जिला स्तरीय स्पोर्ट्स स्कूल योजना की शुरुआत से लेकर अब तक 12,000 से अधिक खिलाड़यों ने इसका लाभ उठाया है। वर्ष 2025-26 की स्थिति के अनुसार राज्य के 29 जिलों में 39 स्पोर्ट्स स्कूल संचालित हैं और 21 विभिन्न खेलों में 5300 से अधिक खिलाड़ी प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे हैं। जिला स्तरीय स्पोर्ट्स स्कूल में खिलाड़ियों को विशेषज्ञ कोच, ट्रेनर और योग ट्रेनर द्वारा वैज्ञानिक तरीके से प्रशिक्षण दिया जाता है, और खिलाड़ियों की फिटनेस एवं रिकवरी के लिए फिजियोथेरेपिस्ट भी उपलब्ध होते हैं। इस योजना के तहत राज्य सरकार द्वारा प्रति खिलाड़ी सालाना 1.68 लाख रुपए का अनुमानित खर्च किया जाता है। वर्ष 2025-26 में इस योजना के अंतर्गत कुल 95.75 करोड़ रुपए खर्च किए गए हैं।
डीएलएसएस योजना मेरे करियर के लिए टर्निंग पॉइंट बनी : अर्जुन अवॉर्डी इलावेनिल वालरीवन
निशानेबाजी में गुजरात का प्रतिनिधित्व करने वाली और अर्जुन अवॉर्ड से सम्मानित इलावेनिल वालरीवन पूर्व डीएलएसएस खिलाड़ी हैं। इलावेनिल ने अहमदाबाद के साणंद में स्थित लक्ष्मण ज्ञानपीठ स्कूल में प्रशिक्षण प्राप्त किया है और आज राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय मंच पर गुजरात का नाम रोशन कर रही हैं।
जिला स्तरीय स्पोर्ट्स स्कूल में प्रशिक्षण के दौरान प्राप्त अपने अनुभवों को साझा करते हुए इलावेनिल वालरीवन ने कहा, “मैंने वर्ष 2014 से 2017 के दौरान साणंद के लक्ष्मण ज्ञानपीठ स्कूल में प्रशिक्षण प्राप्त किया, जिसने एक निशानेबाज के तौर पर मेरी प्रतिभा को निखारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यहां मिली आधुनिक सुविधाओं, स्पोर्ट्स इक्विपमेंट्स, विशेषज्ञ कोचिंग और निशानेबाजी के लिए उपलब्ध रेंज सेटअप से मुझे काफी मदद मिली। जिला स्तरीय स्पोर्ट्स स्कूल योजना मेरे करियर के लिए एक टर्निंग पॉइंट सिद्ध हुई।”
उल्लेखनीय है कि इलावेनिल ने 2025 की एशियन चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक, 2025 वर्ल्ड चैंपियनशिप में कांस्य पदक, 2024 के रियो डी जेनेरियो वर्ल्ड कप में स्वर्ण पदक और 2024 की जकार्ता एशियन चैंपियनशिप में रजत पदक जीता है। इसके अलावा, उन्होंने टोक्यो ओलंपिक 2020 और पेरिस ओलंपिक 2024 में भी भारत का प्रतिनिधित्व किया है।
डीएलएसएस योजना की लाभार्थी डांग की ओपिनाबेन ने खो–खो विश्व कप में दिखाया कमाल
डांग जिले के बिलीआंबा गांव की रहने वाली और खो–खो खिलाड़ी ओपिनाबेन देवजीभाई भिलार भी जिला स्तरीय स्पोर्ट्स स्कूल (डीएलएसएस) की खिलाड़ी रह चुकी हैं। उन्होंने खो–खो विश्व कप 2025 (भारत) में स्वर्ण पदक, 56वीं सीनियर नेशनल खो–खो चैंपियनशिप 2024 दिल्ली में स्वर्ण पदक और प्रथम जनजातीय खेल महोत्सव ओडिशा 2023-24 में रजत पदक जीता है। वे 55वीं सीनियर राष्ट्रीय खो–खो चैंपियनशिप 2023 (महाराष्ट्र) तथा गोवा में 2023 में आयोजित में 37वें राष्ट्रीय खेलों में खो–खो चैंपियनशिप में भी हिस्सा ले चुकी हैं।
डांग से लेकर विश्व कप तक का सफर तय करने वाली ओपिनाबेन कहती हैं, “राज्य स्तर की खो–खो प्रतियोगिता में हिस्सा लेने के बाद मेरे शिक्षक ने मुझे जिला स्तरीय स्पोर्ट्स स्कूल (डीएलएसएस) योजना की जानकारी दी और उनके मार्गदर्शन से मैं वर्ष 2014 में डीएलएसएस से जुड़ गई। यहां मुझे विशेषज्ञ कोच द्वारा सुबह–शाम गहन प्रशिक्षण प्राप्त हुआ। इसके बाद मुझे वर्ष 2015 और 2016 के दौरान वडोदरा की एथलेटिक्स एकेडमी में प्रशिक्षण प्राप्त करने का अवसर मिला। राज्य सरकार की डीएलएसएस जैसी योजना के कारण ही मैं खो–खो के खेल में आगे बढ़ पाई और विश्व कप तक पहुंचने का मौका मिला। आज मैं पंचमहाल जिले में कोच के रूप में काम कर रही हूं और उभरते खिलाड़ियों को मार्गदर्शन दे रही हूं।”
