@ पणजी गोवा :-
56वें भारतीय अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव (इफ्फी) के छठे दिन, दर्शकों को ‘व्हिसपर्स ऑफ द माउंटेंस’ के पीछे की कहानियों को सुनने का मौका मिला, जब निर्देशक जिगर नागदा और निर्माता जितेंद्र मिश्रा गोवा के प्रेस वार्ता हॉल में मीडिया से रूबरू हुए। यह उत्साह तब और बढ़ गया जब मलयालम फिल्म ‘थुदारम’ (आगे जारी रहेगी) के निर्देशक थारुण मूर्ति, निर्माता एम. रंजीत और कार्यकारी निर्माता अवंतिका रंजीत भी इसी कार्यक्रम में शामिल हुए।

अपने उद्घाटन भाषण में निर्देशक जिगर नागदा ने बताया कि कोविड के दौरान राजस्थान में अपने घर पर बिताए समय ने उन्हें इस क्षेत्र में ‘खनन के बढ़ते आर्थिक प्रभाव’ को समझने का मौका दिया। किंतु इसके साथ इस बात का भी एहसास हुआ कि लोग इतने भारी खनन के कारण होने वाले पर्यावरणीय क्षरण के दीर्घकालिक प्रभाव से कैसे अनभिज्ञ हैं। उन्होंने स्पष्ट रूप से बताया कि इसी विषय पर एक वृत्तचित्र बनाने के बाद, उन्हें फीचर शैली के माध्यम से भी लोगों का ध्यान आकर्षित करने की इच्छा हुई।
निर्माता जितेंद्र मिश्रा ने आई एम कलाम से अपने फिल्मी सफर की शुरुआत को याद किया और क्षेत्रीय सिनेमा के प्रति अपने पुराने आकर्षण को साझा किया। उन्होंने बताया कि नागदा की अनूठी कला और कथात्मक संवेदनशीलता ने ही उन्हें अंततः इस फिल्म का निर्माण करने के लिए प्रेरित किया।
निर्देशक थारुण मूर्ति ने ‘थुदारम’ की अपनी शुरुआती पंक्ति के माध्यम से मंच का माहौल तैयार करते हुए कहा, एक नागरिक होने के नाते, मैं अपनी कला के माध्यम से अपनी चिंताओं को व्यक्त करने के लिए बाध्य महसूस करता हूं। मुझे सिनेमाई मनोरंजन के साथ सामाजिक चिंतन का मिश्रण पसंद है।

कार्यकारी निर्माता सुश्री अवंतिका ने बताया कि थुडारम की कहानी उनके प्रोडक्शन हाउस तक 12 साल पहले पहुंची थी, लेकिन उन्होंने इसे साकार करने के लिए सही निर्देशक का इंतजार किया। थारुण की पहली फिल्म देखने के बाद ही उनके पिता – निर्माता एम. रंजीत उनके विजन से इतने प्रभावित हुए कि आखिरकार इस प्रोजेक्ट पर काम शुरू हो गया। उन्होंने मुस्कुराते हुए बताया कि उनके पिता और निर्देशक, दोनों ही मोहनलाल के सबसे बड़े प्रशंसकों में से हैं।
एक सवाल का जवाब देते हुए श्री मूर्ति ने कहा, हमारी ताकत भावनाओं में है। भव्य दृश्यों या बड़े बजट में नहीं, बल्कि उन किरदारों में जिनके साथ हम सचमुच जीते हैं। यही बात फिल्म को वैश्विक स्तर पर जुड़ने में मदद करती है, भले ही इसका बजट बड़े उद्योगों के बजट का एक छोटा सा हिस्सा हो। सिर्फ मलयाली ही नहीं, बल्कि हर जगह के दर्शक अब बड़े-बड़े चित्रणों के बजाय जमीनी, ईमानदार कहानी कहने की ओर आकर्षित हो रहे हैं। और, यही वह क्षेत्र है जिसे हम आगे बढ़ाने के लिए उत्साहित हैं।

निर्देशक नागदा ने सत्र का समापन एक टिप्पणी का जवाब देते हुए किया, मैं सचमुच सम्मानित महसूस कर रहा हूं कि मेरी फिल्म की तुलना माजिद मजीदी के काम से की जा रही है। मैंने उनके माध्यम से विश्व सिनेमा — बरन, द विलो ट्री और कई अन्य फिल्में देखी, जो मेरे स्कूल की पसंदीदा फिल्में बन गईं। ईरानी सिनेमा ने कहानी कहने के मेरे नजरिए को आकार दिया और इसका ताना-बाना स्वाभाविक रूप से मेरी फिल्म में भी समाहित है। लॉन्ग शॉट्स के प्रति मेरा प्रेम भी उसी प्रभाव से उपजा है। भारत में यह कोई व्यापक रूप से प्रचलित शैली नहीं है, लेकिन मेरे लिए, लॉन्ग टेक में सबसे सरल गति भी भावनात्मक अर्थ रखती है। मैं आभारी हूं कि आपने इस पर ध्यान दिया।
‘व्हिसपर्स ऑफ द माउंटेंस’ का सारांश
अरावली की कठोर सुंदरता में रची-बसी यह फिल्म सिलिकोसिस से जूझ रहे एक पिता और खनन से तबाह हुए पहाड़ों के लिए विलाप करते एक बेटे की कहानी है। जैसे-जैसे लड़के के छोटे-छोटे उपचार परिवार के जीवित रहने के संघर्ष से टकराते हैं, उनकी कहानी प्रेम, क्षति और मनुष्य तथा पृथ्वी के बीच के नाजुक बंधन का एक मार्मिक प्रतिबिंब बन जाती है।
‘थुडारम’ का सारांश
रन्नी की शांत पहाड़ियों में, पूर्व फाइट कोरियोग्राफर षणमुगम, जिन्हें प्यार से बेंज कहा जाता है। वे अपने परिवार और अपनी प्यारी काली एम्बेसडर के साथ एक शांत जीवन जी रहे हैं। लेकिन जब तीन पुलिसवाले उन्हें एक भयावह कवर-अप में घसीट लेते हैं, तो उनकी शांत दुनिया बिखर जाती है। इसके बाद एक ऐसे परिवार की दिलचस्प कहानी सामने आती है जो डर, विश्वासघात और एक-दूसरे को थामे रखने की जद्दोजहद में अपनी हदें पार कर चुका है।
प्रेस कॉन्फ्रेंस देखने के लिए लिंक:

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