अखिलेश यादव ने हाल ही में NSG (नेशनल सिक्योरिटी गार्ड) सुरक्षा की मांग की

@ लख़नऊ उत्तरप्रदेश :-

अखिलेश यादव ने हाल ही में NSG (नेशनल सिक्योरिटी गार्ड) सुरक्षा की मांग की है, और इसके पीछे कई अहम कारण हैं। यह सवाल कि “आखिरकार भभकते दीपक को ऐसी क्यों सूझी?” हमें गंभीरता से उन कारणों को समझना होगा जो समाजवादी पार्टी (सपा) और अखिलेश यादव ने सामने रखे हैं। आइए, इसे विस्तार से जानते हैं।
सबसे पहला और प्रमुख कारण है अखिलेश यादव की व्यक्तिगत सुरक्षा को लेकर चिंता को पहले Z+ सुरक्षा के साथ-साथ NSG कवर भी प्रदान किया गया था। यह एक उच्च स्तर की सुरक्षा व्यवस्था थी, जो देश के चुनिंदा लोगों को ही मिलती है। हालांकि, 2019 में केंद्र सरकार ने उनकी NSG सुरक्षा वापस ले ली थी, और इसके बाद उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी उत्तर प्रदेश पुलिस को सौंप दी गई।
समाजवादी पार्टी का कहना है कि मौजूदा सुरक्षा व्यवस्था पर्याप्त नहीं है। पार्टी ने हाल ही में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को पत्र लिखकर दावा किया है कि अखिलेश यादव को लगातार धमकियां मिल रही हैं, और उत्तर प्रदेश पुलिस की सुरक्षा उनके लिए नाकाफी साबित हो रही है। इसीलिए वे NSG सुरक्षा की बहाली चाहते हैं।
दूसरा कारण है सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो, जिनमें अखिलेश यादव को निशाना बनाया जा रहा है। समाजवादी पार्टी ने अपने पत्र में स्पष्ट उल्लेख किया है कि कुछ वीडियो में अखिलेश यादव पर हमले की चेतावनी दी गई है और उनकी जान को खतरा बताया जा रहा है। ये वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से फैल रहे हैं, जिससे उनकी सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ गई है। सपा का मानना है कि ऐसी स्थिति में केवल सामान्य पुलिस सुरक्षा पर्याप्त नहीं है,और NSG जैसी विशेष सुरक्षा बल की जरूरत है,जो ऐसी धमकियों से निपटने में सक्षम हो। हालांकि एक आम आदमी भी आर्म्स लायसेंस के लिए खुद पर हमला का नाटक कराकर दस्तावेज तैयार करवाने की रीति रही हैं। ये तो एक क्षेत्रीय पार्टी के प्रमुख हैं।
तीसरा कारण है राजनीतिक दबाव। समाजवादी पार्टी का आरोप है कि केंद्र और उत्तर प्रदेश की बीजेपी सरकारें विपक्षी नेताओं की सुरक्षा को जानबूझकर कमजोर कर रही हैं, खासकर राजनीतिक मतभेदों के चलते। सपा का कहना है कि अखिलेश यादव एक प्रमुख विपक्षी नेता हैं, और उनकी आवाज को दबाने के लिए उनकी सुरक्षा के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है। पार्टी ने यह भी संकेत दिया है कि उत्तर प्रदेश सरकार ने धमकियों की जानकारी होने के बावजूद कोई ठोस कदम नहीं उठाया, जिससे उन्हें केंद्र से NSG सुरक्षा की मांग करनी पड़ रही है। यहाँ “भभकते दीपक” वाली बात शायद उनके इस कदम को राजनीतिक स्टंट कहने की कोशिश हो, लेकिन सपा इसे अपनी मजबूरी और गंभीरता का मुद्दा मानती है।
चौथा कारण है देश में विपक्षी नेताओं की सुरक्षा को लेकर उठ रहे व्यापक सवाल। समाजवादी पार्टी ने इस मांग को उस संदर्भ में भी रखा है कि पूरे देश में विपक्षी दलों के नेताओं को लगातार निशाना बनाया जा रहा है, और उनकी सुरक्षा को लेकर लापरवाही बरती जा रही है। सपा का कहना है कि यह सिर्फ अखिलेश यादव का मसला नहीं, बल्कि एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा है। ऐसे में NSG सुरक्षा की मांग न केवल उनकी व्यक्तिगत सुरक्षा के लिए है, बल्कि यह विपक्ष के प्रति सरकार के रवैये पर भी सवाल उठाने का एक तरीका है।
अखिलेश यादव और समाजवादी पार्टी ने यह मांग ऐसे समय में उठाई है जब देश में राजनीतिक माहौल गरम है। विपक्षी दलों के कई नेता केंद्र सरकार पर अपनी आवाज दबाने का आरोप लगा रहे हैं। इसके अलावा, सोशल मीडिया पर धमकियों का बढ़ता चलन और उत्तर प्रदेश में कानून-व्यवस्था को लेकर सवाल भी इस मांग को हवा दे रहे हैं। सपा प्रवक्ता फखरुल हसन चांद ने भी गृह मंत्रालय से इस मामले में तुरंत कार्रवाई की अपील की है, जिससे यह साफ है कि पार्टी इसे गंभीरता से ले रही है।
अखिलेश यादव की NSG सुरक्षा की मांग के पीछे उनकी व्यक्तिगत सुरक्षा, सोशल मीडिया पर धमकियां, राजनीतिक दबाव और विपक्षी नेताओं की सुरक्षा पर सवाल जैसे कारण है या नहीं बल्कि अपने स्टेट्स को ऊपर दिखाना एकमात्र लक्ष्य हैं। अपने पिता के बने बनाए राजनीतिक अखाड़े जिसमें जाति और मुस्लिमों का तुष्टीकरण एकमात्र ध्येय बाप और बेटा का रहा हैं। हालांकि मायावती की बसपा और मुलायम का सपा के जड़ में पानी देने का काम भाजपा की रही हैं। बसपा तो समाप्ति के कगार पर हैं। सपा की हालत कोई खास नहीं रही हैं।
मुस्लिमों के दर पर मत्थे टेके मुलायम की तरह अखिलेश को 2029 में भविष्य कुछ खास नहीं दिख रहा हैं। उसी को मद्देनजर, “भभकते दीपक को ऐसी सूझी होंगी” शायद उनके इस कदम को राजनीतिक ड्रामा कहने की कोशिश हो, लेकिन सपा इसे उनकी जान की हिफाजत का मुद्दा मानती है। यह एक राजनीतिक मुद्दा तो है ही, लेकिन यह भी सच है कि अखिलेश यादव एक बड़े नेता की पैंतरेबाजी में लगे हुए हैं,और उनकी सुरक्षा को लेकर चिंता एक नाटक हो सकती है। अब यह केंद्र सरकार पर निर्भर है कि वह इस मांग पर क्या कदम उठाती है।

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