@ कमल उनियाल उत्तराखंड :-
उत्तराखंड के वनो में चीड के पेड भारी मात्रा में पाये जाते हैं। गर्मीयो में चीड की पत्तियाँ पिरुल जब सूखकर गिरता है तो यह आग लगने का मुख्य कारण होताहै। पिरुल वन संपदा के लिए अभिशाप के रुप में देखा जाता है लेकिन अब यही पिरुल अब ग्रामीणो की आर्थिकी को मजबूत करेगा, अब इसके बने उत्पाद से ग्रामीण इसे बेचकर धन अर्जित करेगे और वनाग्नि की घटनाओं पर भी अंकुश लगेगा।

चीड के पिरुल से कोयला से लेकर घरेलू उत्पाद के लिए बने सामान सबको भा रहे हैं। इससे टोकरी, गुलदस्ता, टेवल फैन, बेग, राखी, झाडू बनाया जा रहा है।
इसी के तहत सामाजिक सरोकारो को समर्पित द हंस फाउंडेशन मशरुम प्रशिक्षण के बाद बेकार पडा पिरूल को एकत्रित कर घरेलू उत्पाद वस्तुओं को बनाकर रोजगार देने का पहल कर रहा है। द हंस फाउंडेशन द्वारा संचालित वन अग्नि शमन एवम रोकथाम परियोजना के अंतर्गत द हंस वनाग्नी प्रबंधन समिति के सदस्यों द्वारा गाँव के अति संवेदनशील वन क्षेत्रों से पिरुल इकठ्ठा किया गया।
जिसमे दिउसा के सदस्यों द्वारा 15.98 Kgतथा लंगूरी सदस्यों द्वारा 14,89 kg पिरुल इकठ्ठा किया गया। द हंस फाउंडेशन के सीडीस सतीश चंद्र बहुगुणा तथा मोटिवेटर नीलम रावत ने बताया पिरुल से घरेलू उत्पाद वस्तुओं का प्रशिक्षण देकर रोजगार के अवसर खोलने का पहल की जायेगी।

