CSIR और दक्षिण-RIS विकासशील देशों में विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार को आगे बढ़ाने पर सहमत

@ नई दिल्ली :-

विकासशील देशों की उन्नति के लिए क्षमता निर्माण, अनुसंधान सहयोग, प्रौद्योगिकी साझेदारी को मजबूत करने के साझा दृष्टिकोण के साथ, वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद (CSIR) और विकासशील देशों के लिए अनुसंधान और सूचना प्रणाली (RIS) में दक्षिण- ग्लोबल साउथ सेंटर ऑफ एक्सीलेंस ने 3 नवंबर 2026 को एक संबद्धता पत्र (एलओए) पर हस्ताक्षर किए।

दक्षिण का उद्देश्य सतत, किफायती एवं स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप समाधान विकसित करने को प्रोत्साहित करते हुए विकासशील देशों के बीच ज्ञान साझा करने तथा पारस्परिक सीखने की प्रक्रिया को बढ़ावा देना है। संसाधनों की साझेदारी, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण, अनुभवों के आदान-प्रदान तथा सहयोगात्मक रणनीतियों के माध्यम से दक्षिण का लक्ष्य साझा विकासात्मक चुनौतियों का समाधान करना और सतत विकास लक्ष्यों की प्राप्ति की दिशा में प्रगति को गति प्रदान करना है।

इस संदर्भ में, CSIR अपनी व्यापक वैज्ञानिक एवं तकनीकी ज्ञान-संपदा के साथ-साथ ऐसी प्रौद्योगिकियों का एक समृद्ध संग्रह इस साझेदारी में उपलब्ध करा रहा है, जिन्हें तत्काल उपयोग में लाया जा सकता है तथा जो किफायती और अनुकूलनीय हैं। ये प्रौद्योगिकियाँ विकासशील देशों की विकासात्मक आवश्यकताओं के लिए विशेष रूप से प्रासंगिक हैं। इन प्रौद्योगिकियों में व्यापक स्तर पर प्रसार, उद्योग-आधारित कार्यान्वयन तथा सहभागी देशों में उद्यमिता को प्रोत्साहित करने की पर्याप्त संभावनाएँ निहित हैं।

इस अवसर पर CSIR के अंतरराष्ट्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी कार्य निदेशालय के प्रमुख डॉ. रामा स्वामी बंसल ने विकासशील देशों के बीच अंतरराष्ट्रीय सहभागिता के महत्त्व का जिक्र किया। उन्होंने साझा विकासात्मक प्राथमिकताओं के समाधान के लिए सहयोगात्मक साझेदारी के नवोन्मेषी मॉडल विकसित करने की संभावनाओं पर भी प्रकाश डाला।

RIS के महानिदेशक प्रोफेसर सचिन कुमार शर्मा ने कहा कि CSIR के साथ यह सहयोग विकासशील देशों के लिए वैज्ञानिक विशेषज्ञता एवं तकनीकी नवाचारों को सहयोगात्मक और प्रभावशाली समाधानों में परिवर्तित करने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि सिद्ध होगी। उन्होंने विशेष रूप से स्वास्थ्य सेवा, अवसंरचना, कृषि, नीली अर्थव्यवस्था  तथा डिजिटल अर्थव्यवस्था जैसे प्रमुख क्षेत्रों में सहयोग की संभावनाओं को रेखांकित किया।

संबद्धता पत्र के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं:

  1. विकासात्मक चुनौतियों के समाधान हेतु नवोन्मेषी एवं स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप समाधान तलाशने के लिए संयुक्त नीतिगत अध्ययन को प्रोत्साहित करना।
  2. विकासात्मक हस्‍तक्षेपों को व्यापक स्तर पर लागू करने की सुविधा प्रदान करने के लिए संबंधित संस्थानों एवं एजेंसियों की सहभागिता सुनिश्चित करना।
  3. क्षमता निर्माण, मानव संसाधन विकास तथा कौशल उन्नयन को बढ़ावा देना।
  4. विकासशील देशों के बीच सामूहिक आत्मनिर्भरता को मजबूत करने के लिए विकास संबंधी अनुभवों, सर्वोत्तम कार्यप्रणालियों एवं सफलता की कहानियों का दस्तावेजीकरण और साझा करना।

इस सहयोग से दक्षिण-दक्षिण सहयोग को मजबूत करने, अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों को प्रोत्साहित करने तथा उपयुक्त विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी समाधानों के हस्तांतरण, अनुकूलन एवं कार्यान्वयन को सुगम बनाने के लिए एक सार्थक मंच उपलब्ध होने की उम्‍मीद है। CSIR की वैज्ञानिक एवं तकनीकी विशेषज्ञता तथा दक्षिण के वैश्विक सहभागिता मंच का लाभ उठाते हुए इस सहयोग का उद्देश्य किफायती, टिकाउ और स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप प्रौद्योगिकी समाधानों एवं उत्पादों के विकास तथा प्रसार को बढ़ावा देना है। इसके माध्यम से विकासशील देशों में समावेशी विकास एवं सतत विकास के लक्ष्यों की प्राप्ति में योगदान दिया जा सकेगा।

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