@ विरेंद्र सैनी नई दिल्ली :-
दिल्ली हाईकोर्ट ने पत्रकारों के चिकित्सा अधिकारों को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि आपातकालीन परिस्थितियों में सरकारी अस्पतालों में इलाज की सुविधा उपलब्ध नहीं होने पर निजी अस्पताल में उपचार कराने वाले पत्रकारों को चिकित्सा खर्च की प्रतिपूर्ति से वंचित नहीं किया जा सकता। अदालत ने दिल्ली सरकार को पत्रकार रविंदर गुप्ता को 11,83,105.21 रुपये की शेष चिकित्सा राशि आठ सप्ताह के भीतर भुगतान करने का निर्देश दिया है।
न्यायमूर्ति अमित महाजन की एकल पीठ ने ‘रविंदर गुप्ता बनाम स्वास्थ्य सेवाओं के निदेशक, दिल्ली सरकार’ मामले में यह फैसला सुनाया। अदालत ने स्वास्थ्य विभाग द्वारा 21 जुलाई 2025 को प्रतिपूर्ति का दावा खारिज करने संबंधी आदेश को निरस्त कर दिया।

मामले के अनुसार, दिल्ली सरकार से मान्यता प्राप्त पत्रकार रविंदर गुप्ता की पत्नी अगस्त 2021 में दाहिनी फीमोरल धमनी के संक्रमित छद्म-धमनीविस्फार से पीड़ित थीं। उन्हें तत्काल संवहनी सर्जरी की आवश्यकता थी। 4 अगस्त 2021 को उन्हें जीबी पंत अस्पताल ले जाया गया, लेकिन वहां आवश्यक सर्जरी की सुविधा उपलब्ध नहीं होने के कारण उन्हें सर गंगा राम अस्पताल रेफर कर दिया गया। उस समय कई सरकारी अस्पताल कोविड अस्पताल घोषित किए जा चुके थे।
इसके बाद गुप्ता ने दिल्ली प्रेस रिपोर्टर एवं चिकित्सा सहायता नियम, 1955 के तहत इलाज के खर्च की प्रतिपूर्ति का दावा किया। हालांकि, स्वास्थ्य विभाग ने यह कहते हुए दावा खारिज कर दिया कि सर्जरी आपातकालीन नहीं थी और कोविड अस्पताल घोषित किए जाने की स्थिति को सरकारी अस्पताल में हड़ताल के समान नहीं माना जा सकता।
हाईकोर्ट ने सरकार की इस दलील को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि मरीज के दृष्टिकोण से सरकारी अस्पताल में हड़ताल होने और अस्पताल को कोविड उपचार के लिए आरक्षित किए जाने का परिणाम एक जैसा है, क्योंकि दोनों ही परिस्थितियों में सामान्य मरीज को आवश्यक उपचार नहीं मिल पाता। ऐसे में निजी अस्पताल में इलाज कराना उसकी मजबूरी हो सकती है।
अदालत ने आपातकालीन चिकित्सा प्रमाणपत्र और जीबी पंत अस्पताल के रेफरल को भी महत्वपूर्ण साक्ष्य माना। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आपात स्थिति में मरीज की जान बचाना प्राथमिकता होनी चाहिए, न कि कागजी औपचारिकताएं।
इस फैसले का मान्यता प्राप्त पत्रकार कल्याण समिति ने स्वागत किया है। समिति के महासचिव रजनीकांत तिवारी ने कहा कि यह निर्णय केवल एक पत्रकार को चिकित्सा खर्च दिलाने तक सीमित नहीं है, बल्कि पत्रकारों के स्वास्थ्य अधिकारों के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है।
उन्होंने सरकारों से पत्रकारों के लिए स्पष्ट, पारदर्शी और समयबद्ध चिकित्सा सहायता नीति बनाने की मांग की। पत्रकार संगठनों ने सरकारी अस्पतालों में सुविधा नहीं मिलने पर निजी अस्पतालों में इलाज की अनुमति, प्रतिपूर्ति के दावों का शीघ्र निपटारा और अस्वीकृत मामलों के लिए अपीलीय व्यवस्था बनाने पर भी जोर दिया।

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