ए आई पर्सनलाइज़्ड थेरेपी के लिए कैंसर के राज़ खोलता है

@ नई दिल्ली :-

एक नये अध्ययन में एक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस फ्रेमवर्क पेश किया गया है। यह कैंसर को समझने और उसका इलाज करने के हमारे तरीके को बदल सकता है। यह फ्रेमवर्क हमें कैंसर को देखने का एक नया नज़रिया देता है—सिर्फ़ उसके साइज़ या फैलाव से नहीं, बल्कि उसकी मॉलिक्यूलर पर्सनैलिटी से।

कैंसर सिर्फ़ बढ़ते ट्यूमर की बीमारी नहीं है—यह कैंसर के हॉलमार्क कहे जाने वाले छिपे हुए बायोलॉजिकल प्रोग्राम के एक सेट से चलता है। ये हॉलमार्क बताते हैं कि हेल्दी सेल्स कैसे मैलिग्नेंट बन जाते हैं: वे कैसे फैलते हैं, इम्यून सिस्टम से बचते हैं और इलाज का विरोध करते हैं।

दशकों से डॉक्टर टीएनएम जैसे स्टेजिंग सिस्टम पर भरोसा करते रहे हैं। यह ट्यूमर के साइज़ और फैलाव को बताते हैं। लेकिन ऐसे सिस्टम अक्सर गहरी मॉलिक्यूलर को नज़रअंदाज़ कर देते हैं—क्यों “एक ही” कैंसर स्टेज वाले दो मरीज़ों के नतीजे बहुत अलग हो सकते हैं।

अशोका यूनिवर्सिटी के साथ काम कर रहे डिपार्टमेंट ऑफ़ साइंस एंड टेक्नोलॉजी के एक ऑटोनॉमस इंस्टीट्यूट एस एन बोस नेशनल सेंटर फॉर बेसिक साइंसेज के साइंटिस्ट्स ने पहला ए आई फ्रेमवर्क पेश किया है। यह कैंसर के मॉलिक्यूलर “माइंड” को पढ़ सकता है और उसके बिहेवियर का अनुमान लगा सकता है।

डॉ. शुभाशीष हलदर और डॉ. देबयान गुप्ता की टीम ने ओन्कोमार्क नाम के फ्रेमवर्क को लीड किया। इसने 14 तरह के कैंसर में 3.1 मिलियन सिंगल सेल्स को एनालाइज़ किया और सिंथेटिक “स्यूडो-बायोप्सी” बनाईं जो हॉलमार्क-ड्रिवन ट्यूमर स्टेट्स को दिखाती हैं। इस बड़े डेटासेट ने ए आई को यह सीखने में मदद की कि मेटास्टेसिस, इम्यून इवेजन और जीनोमिक इनस्टेबिलिटी जैसे हॉलमार्क्स ट्यूमर ग्रोथ और थेरेपी रेजिस्टेंस को बढ़ावा देने के लिए एक साथ कैसे काम करते हैं।

ओन्कोमार्क ने इंटरनल टेस्टिंग में 99 प्रतिशत से ज़्यादा एक्यूरेसी हासिल की और पाँच इंडिपेंडेंट कोहोर्ट्स में 96प्र तिशत से ऊपर रहा। इसे आठ बड़े डेटासेट से 20,000 असल दुनिया के मरीज़ों के सैंपल पर वैलिडेट किया गया। इससे यह बड़े पैमाने पर इस्तेमाल हो सकता है। पहली बार वैज्ञानिक असल में यह देख पाए कि कैंसर की स्टेज बढ़ने के साथ हॉलमार्क एक्टिविटी कैसे बढ़ती है।

कम्युनिकेशंस बायोलॉजी (नेचर पब्लिशिंग ग्रुप) में पब्लिश हुआ नया फ्रेमवर्क यह बता सकता है कि मरीज़ के ट्यूमर में कौन से हॉलमार्क एक्टिव हैं, जिससे डॉक्टरों को उन दवाओं की ओर इशारा मिलता है जो सीधे उन प्रोसेस को टारगेट करती हैं। यह उन एग्रेसिव कैंसर की पहचान करने में भी मदद कर सकता है जो स्टैंडर्ड स्टेजिंग में कम नुकसानदायक लग सकते हैं। इससे पहले इलाज में मदद मिलती है।

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