
गौतम बुद्ध की जीवन कथा : प्रकरण 13-16 तक,सूरज पाण्डेय /सिद्धार्थ पाण्डेय की कलम से

प्रकरण-13
राजसी वस्त्र एवं अलंकरण उतारकर सिद्धार्थ का गृह त्याग
सुबह होते-होते सिद्धार्थ चन्न के साथ तीन राज्य पार कर अनोमा (औमी) नदी के तट पर जा पहुँचा। नदी के तट पर उतरकर उसने कंटक को संतुष्टि से देखा तथा मन ही मन उसकी प्रशंसा की। फिर चन्न के मित्र भाव को मुक्त कण्ठ से सराहा। उसके निःस्वार्थ सेवा की प्रशंसा की तथा कंटक के साथ लौट जाने का आग्रह किया। उसने पिता, ममतामयी मौसी, स्नेहसिक्त यशोधरा सबको संदेश देने के लिए कहा।

चन्न ने सिद्धार्थ से बार-बार आग्रह किया कि वह भी लौट जाय किन्तु सब व्यर्थ गया। कुमार ने देखा कि कंटक की आँखे भी आँसू टपका रही थी।
सिद्धार्थ ने म्यान से तलवार निकालकर केश तथा मुकुट को काटकर फेंक दिया। अपने राजसी वस्त्र एवं अलंकरण उतारकर चन्न को दे दिए। उसका भाव जानकर विशुद्ध भाव देवता व्याध के रूप में काषाय वस्त्र पहने हुए, उसके समीप गया। उसे देखकर शाक्य राज के पुत्र ने कहा-‘‘इस हिंसक धनुष के साथ तुम्हारा यह मंगलमय काषाय वस्त्र, जो ऋषियों का चिन्ह है, मेल नहीं खाता। इसलिए हे सौम्य, यदि इसमें आसक्ति न हो, ये वस्त्र मुझे दे दो’’। व्याध ने वे वस्त्र सिद्धार्थ को दे दिए और अन्तर्धान हो गया।
अश्रुमुख (छन्दक) चन्न कंटक को लकर न चाहते हुए भी बिलखता हुआ लौट पड़ा। जब वह कपिलवस्तु पहुँचा तो उसे सारा नगर अंधकारवृत प्रतीत हुआ।

कंटक और चन्न को लौटकर आता देखकर राज-परिवार बिलख उठा। कंटक ने हिनहिनाकर अपनी संवेदना व्यक्त की। सारा संयम भूलकर गौतमी चिल्ला उठी और विक्षिप्त सी प्रलाप करने लगी। वियोगाहत यशोधरा भी भूमि पर गिर पड़ी और अर्द्धचेतन सी विलाप करने लगी।
चन्न और कंटक दोनों के वापस लौट आने और सिद्धार्थ के प्रव्रजित होने की बात सुनकर शुद्धोदन का हिया फट सा गया। उसे सेवकों ने पृथ्वी पर गिरने से बचा लिया। वह बिलख-बिलख कर रोने लगा और कुमार के लौट आने हेतु ईश्वर से प्रार्थना करने लगा।

प्रकरण-14
सिद्धार्थ सबसे पहले राजगृह गए,उन्हें लौटाने का यथा-शक्ति प्रयत्न राजा शुद्धोदन ने किया
सिद्धार्थ राजगृह की ओर चल पड़ा। मार्ग में उसे सकी,पद्मा ब्राहमण स्त्रियों एवं रैवत नामक ब्राहमण ऋषि के आश्रम पर रूकना पड़ा। मार्ग में जो भी उसे देखता वह मंत्रमुग्ध सा देखता ही रह जाता । शुद्धोदन पुत्र वियोग से विहवल हो उठा।

उसने पुरोहित एवं महामात्य उदायी को कुमार-अन्वेशणार्थ भेजा। उन्हें सकी, पद्मा एवं रैवत से पता चला कि सिद्धार्थ राजगृह की ओर गया है तो वे उसे ढूँढ़ते हुए आगे बढ़े। उन्हें एक वृक्ष के नीचे कुमार दिखाई दिया। पुरोहित एवं महामात्य ने उसे लौटाने का यथा-शक्ति प्रयत्न किया किन्तु वह अपने निश्चय पर अड़ा रहा।

प्रकरण-15
बिम्बिसार में की दृष्टि सिद्धार्थ पर पड़ी, सिद्धार्थ भिक्षा प्राप्त कर पाण्डव-पहाड़ी पर चढ़ गया
कठिन यात्रा के पश्चात सिद्धार्थ राजगृह पहुँचा। उसने पाण्डव-पर्वत पर एक झोपड़ी बनाई। रात-भर वन्य-पशुओं की डरावनी आवाजों से उसे नींद नहीं आई।

दूसरे दिन वह नगर में भिक्षार्थ घूम रहा था कि बिम्बिसार की दृष्टि उस पर पड़ी। राजा ने एक दूत को सिद्धार्थ के पीछे भेजा। सिद्धार्थ भिक्षा प्राप्त कर पाण्डव-पहाड़ी पर चढ़ गया।

प्रकरण-16
सिद्धार्थ ने सन्यास का मार्ग छोड़, राज-सुख भोगने का प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया
दूत द्वारा समाचार जानकर विम्बिसार कुछ राज-पुरुषों को साथ लेकर पाण्डव-पहाड़ी पर गए। राजा ने कुमार को हर प्रकार से समझाने का प्रयत्न किया कि वह सन्यास का मार्ग छोड़ कर राज-सुख भोगे किन्तु सिद्धार्थ ने विनम्र वाणी में उनका प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया तथा अपनी प्रव्रज्या का उदेश्य उन्हें समझाया।

