गुवा में भूख हड़ताल तेज, मधु कोड़ा की चेतावनी और 20 अप्रैल से चक्का जाम

@ सिद्धार्थ पाण्डेय /चाईबासा (पश्चिम सिंहभूम ) झारखंड  :-

गुवा क्षेत्र में सेल प्रबंधन के खिलाफ ग्रामीणों का आंदोलन लगातार तेज होता जा रहा है। 12 गांव के ग्रामीणों द्वारा चलाए जा रहे 72 घंटे के भूख हड़ताल में शामिल होकर पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा ने कड़ा रुख अपनाते हुए स्पष्ट चेतावनी दी कि यदि स्थानीय लगभग 500 ग्रामीणों को बहाली में प्राथमिकता नहीं दी गई, तो 20 अप्रैल से अनिश्चितकालीन चक्का जाम किया जाएगा।

उन्होंने कहा कि इस आंदोलन के तहत सेल का उत्पादन पूरी तरह प्रभावित किया जाएगा और डिस्पैच भी रोक दिया जाएगा। मधु कोड़ा ने सेल प्रबंधन पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि कंपनी बड़े-बड़े वादे तो करती है, लेकिन धरातल पर उनका कोई असर नजर नहीं आता। उन्होंने कहा कि भोले-भाले ग्रामीणों को गुमराह कर उनकी जमीन पर खनन कार्य किया जा रहा है और उनके ही अधिकारों को उनसे छीना जा रहा है।

उन्होंने दो टूक कहा कि अब ग्रामीण अपने हक के लिए निर्णायक लड़ाई लड़ेंगे और किसी भी तरह का अन्याय बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। ग्रामीणों ने खदानों से निकलने वाले लाल पानी को लेकर भी नाराजगी जताई। उनका कहना है कि इस प्रदूषित पानी से उनके खेत पूरी तरह बर्बाद हो चुके हैं और अब खेती के योग्य नहीं बचे हैं। इसके साथ ही कारो नदी का पानी भी दूषित हो रहा है, जिससे पीने के पानी और सिंचाई दोनों पर संकट गहराता जा रहा है। बावजूद इसके, सेल प्रबंधन प्रभावित किसानों को न तो मुआवजा दे रहा है और न ही कोई ठोस समाधान उपलब्ध करा रहा है।

बहाली प्रक्रिया को लेकर भी ग्रामीणों में भारी आक्रोश है। उनका आरोप है कि स्थानीय युवाओं की अनदेखी कर बाहरी लोगों को नौकरी दी जा रही है। ठेकेदार भी बाहर से मजदूर लाकर काम करवा रहे हैं, जिससे क्षेत्र के शिक्षित और बेरोजगार युवक-युवतियां रोजगार के लिए दूसरे राज्यों में पलायन करने को मजबूर हैं। यह स्थिति तब और विडंबनापूर्ण हो जाती है जब क्षेत्र में बड़े पैमाने पर खनन गतिविधियां चल रही हैं, फिर भी स्थानीय लोगों को उसका लाभ नहीं मिल पा रहा। मुंडा-मानकी के नेतृत्व में चल रहे इस भूख हड़ताल को अब 48 घंटे से अधिक समय बीत चुका है।

आंदोलनकारियों का आरोप है कि अब तक न तो प्रशासन के कोई अधिकारी और न ही सेल प्रबंधन के प्रतिनिधि उनकी सुध लेने पहुंचे हैं। यहां तक कि आंदोलन स्थल पर शुद्ध पेयजल की भी कोई व्यवस्था नहीं की गई है। ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि इस दौरान किसी भी आंदोलनकारी की तबीयत बिगड़ती है या कोई अनहोनी होती है, तो इसकी पूरी जिम्मेदारी गुवा सेल प्रबंधन की होगी। इस दौरान कासिया पेचा के मुंडा सिंगा सुरीन ने पर्यावरणीय नुकसान का मुद्दा उठाते हुए कहा कि पहले उनके जंगल क्षेत्र में कई प्राकृतिक झरने हुआ करते थे, लेकिन जब से सेल की खदानें शुरू हुई हैं, मोरम और मिट्टी के कारण वे झरने पूरी तरह बंद हो गए हैं।

इसका सीधा असर ग्रामीणों के जीवन पर पड़ा है और अब उन्हें पीने के पानी के लिए लंबी दूरी तय कर कारो नदी तक जाना पड़ता है, जहां वे चुंआ बनाकर पानी लाने को मजबूर हैं। ग्रामीणों ने साफ कर दिया है कि यदि उनकी मांगों पर जल्द कार्रवाई नहीं हुई, तो आंदोलन को और उग्र रूप दिया जाएगा, जिससे क्षेत्र में औद्योगिक गतिविधियां पूरी तरह प्रभावित हो सकती हैं।

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