@ कमल उनियाल उत्तराखंड :-
उत्तराखंड अपनी लोक संस्कृति लोकपर्व, त्यौहारो के लिए जाना जाता है। हर पर्व यहाँ धूमधाम से मनाया जाता है संस्कृति और विरासत के अनोखे संगम मकर संक्रांति 14जनवरी के दिन यहाँ पर विभिन्न स्थानो पर गेंद का मेला का आयोजन होता है मकर संक्रांति मकरेण को आज के दिन पावन पर्व गेंद का मेला का इन्तजार सभी को साल भर से रहता है।

मकर संक्रांति को विकास खंड द्वारीखाल में डाडामंडी, देवीखेत, दालिमसेण, कटघर तथा यमकेश्वर के थलनदी में भव्य मेला लगता है।
कभी इन मेलो से पुरानी यादें ताजी हो जाती है मेला का अर्थ अपनो से मिलन होता था इस दिन का दूर दूर विवाहिता बेटियों को बेसब्री से इन्तजार रहता था। ये बेटियाँ अपने परिजनो से मिलने के लिए व्याकुल रहती थी क्योंकि उस जमाने में यातायात, दूरसंचार की व्यवस्था नहीं थी जिससे परिजन बडे अरसे बाद अपनो से मिलकर भावुक हो जाते थे तब के जमाने में यह बहुत कारुणिक क्षण होता था।
गेंद का मेला थलनदी से ही गिंदी कौथिक तथा इसमे खेला जाने वाला गिंदी का प्रचलन यहीं थलनदी से ही हुआ है यहाँ राजस्थान के उदयपुर और अजमेर के लोग मुगलो के अत्याचार से तंग होकर यहाँ बस गये थे ।

पौराणिक कथानुसार गिंदोरी नामक लडकी अपने सुसराल से नाराज होकर अपने मायका आ गयी जिस कारण नालीगाँव और कस्याली में भंयकर झगड़ा हुआ क्योंकि मायका वाले गिंदोरो को सुसराल नहीं भेजना चहाते थे तो सुसराल वाले उसे अपने यहाँ ले जाने चहाते थे इस लिए दोनो गाँवो में संघर्ष हुआ इसी छीना झपटी में गिंदोरी की मौत हो गयी तब से इस मेले का प्रचलन इस बेटी की याद में किया गया।
जिसमे दस से पन्द्रह किलो बारह इन्च व्यास चपटी चमडे के गेंद में गिंदोड नामक फल की सिलाई से बनी गेंद को अपने पाले में ले जाने के लिए जोर अजमाईश होती है जिसके पाले में गेंद जाती है वही विजयी होता है मैदान में जाते वक्त अपनी अपनी पट्टी के लोग अपने ध्वज और ढोल दमाउ के साथ समर्थक अपने पाले के लोगों का उत्साहवर्धन करते हैं।
इस तरह गेंद को अपने पाले करने के लिए थलनदी में उदयपुर पट्टी और अजमेर पट्टी, डाडामंडी में लंगूरपट्टी और भटपुडी, देवीखेत में ढौंरी और दिखेत के बीच कडा संघर्ष देखने को मिलता है।


