‘मोमाकू’ : लालच, समाज और मानवीय मूल्यों की गहरी पड़ताल करती फिल्म

@ मुंबई महाराष्ट्र :-

आज 4 जून को ओटीटी प्लेटफॉर्म Kable One पर रिलीज होने जा रही फिल्म “मोमाकू” एक ऐसी कहानी लेकर आई है, जो मनोरंजन के साथ-साथ समाज और मानवीय कमजोरियों पर भी गंभीर सवाल उठाती है। यह फिल्म एक रात की घटनाओं पर आधारित है, लेकिन इसके भीतर लालच, प्रेम, सामाजिक पाखंड, महिलाओं के सम्मान, आस्था और आत्मबोध जैसे कई महत्वपूर्ण विषयों को प्रभावशाली ढंग से पिरोया गया है।

यह फिल्म हिंदी, अंग्रेजी, तमिल, तेलुगु, मलयालम, स्पेनिश, फ्रेंच, अरबी, चीनी और रूसी सहित 10 भाषाओं में रिलीज की गई है।

फिल्म की कहानी एक ग्रामीण इलाके में स्थापित नए एटीएम की चोरी से शुरू होती है। कुछ लोग आसान पैसे की चाह में पूरे एटीएम मशीन को उखाड़कर ले जाते हैं, लेकिन असली संघर्ष तब शुरू होता है जब वे उसे खोलकर पैसे निकालने की कोशिश करते हैं। यह एटीएम केवल एक मशीन नहीं, बल्कि मानवीय लालच और इच्छाओं का प्रतीक बन जाता है। जैसे-जैसे रात आगे बढ़ती है, पात्रों की कमजोरियां, डर, रिश्ते और नैतिक संघर्ष सामने आने लगते हैं।

फिल्म का भावनात्मक पक्ष तब और मजबूत हो जाता है जब एक व्यक्ति की धन पाने की चाह उसके पिता बनने जैसे जीवन के सबसे महत्वपूर्ण क्षण पर भारी पड़ने लगती है। एक ओर नवजात बच्ची का जन्म आशा और प्रेम का संदेश देता है, वहीं दूसरी ओर उसके आसपास मौजूद लोग लालच और स्वार्थ में उलझे दिखाई देते हैं।

फिल्म समाज में महिलाओं की स्थिति पर भी तीखी टिप्पणी करती है। एक युवती, जो परिस्थितिवश घटनाओं के बीच फंस जाती है, समाज की संकीर्ण सोच और आरोपों का सामना करती है। फिल्म यह संदेश देती है कि बेटियों का सम्मान केवल जन्म के समय नहीं, बल्कि उनके पूरे जीवन में होना चाहिए।

निर्देशक और लेखक कुलदीप कुणाल ने कहानी को रोचक मोड़ों, भावनात्मक गहराई और सामाजिक संदेशों के साथ प्रस्तुत किया है। फिल्म में जागरण, भजन और रागिनी के माध्यम से आस्था और नैतिकता का प्रभावशाली ताना-बाना भी बुना गया है।

इस फिल्म के निर्माता सुमीत सिंह, हैरी भट्टी और सतेन्द्र सत्या हैं।

यशपाल शर्मा, अपूर्वा अरोड़ा,जतिन सरना, टी.जे. दत्त, गौरव शर्मा, श्रीकांत वर्मा, सुखविंदर चहल, रोनझिया सोनूजीत अमर, बलजिंदर कौर, अंबालिका सप्रा, राजिंदर मोहन नानू, सतीश जॉर्ज कश्यप और मुसाफिर मुकेश ने अपने किरदारों को पूरी ईमानदारी से निभाया है। ग्रामीण परिवेश, सशक्त संवाद और प्रभावशाली संगीत फिल्म को और भी जीवंत बनाते हैं।

“मोमाकू” केवल एटीएम चोरी की कहानी नहीं है, बल्कि यह दिखाती है कि पैसा इंसान से क्या-क्या छीन सकता है और प्रेम, सम्मान तथा ईमानदारी किस तरह उसे वापस सही रास्ते पर ला सकते हैं। यह एक ऐसी फिल्म है जो दर्शकों का मनोरंजन करने के साथ उन्हें सोचने पर भी मजबूर करती है।

11 thoughts on “‘मोमाकू’ : लालच, समाज और मानवीय मूल्यों की गहरी पड़ताल करती फिल्म

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