तमिल साहित्यकार पेरुमाल मुरुगन को ‘लहक’ के मानबहादुर लहक सम्मान से नवाजा गया

@ नामक्कल तमिलनाडु :-

तमिल भाषा के प्रतिष्ठित लेखक, कवि एवं कथाकार पेरुमाल मुरुगन को आज नामक्कल में साहित्यिक पत्रिका ‘लहक’ की ओर से मानबहादुर लहक सम्मान प्रदान किया गया। इस अवसर पर उन्हें सम्मानित किए जाने के साथ ही उनके साहित्यिक योगदान पर केंद्रित पत्रिका का विशेषांक भी जारी किया गया। पेरुमाल मुरुगन को इस विशिष्ट सम्मान के लिए साहित्य जगत की ओर से बधाइयां दी जा रही हैं।

इस आयोजन की खास बात यह रही कि ‘लहक’ का यह विशेषांक हिंदी के साथ-साथ तमिल भाषा में भी प्रकाशित किया गया है। इसके माध्यम से पेरुमाल मुरुगन के साहित्य, विचारों और रचनात्मक दृष्टिकोण को दोनों भाषाओं के पाठकों तक पहुंचाने का प्रयास किया गया है।

विशेषांक में कई महत्वपूर्ण लेखों और रचनाओं को शामिल किया गया है। हिंदी संस्करण में डॉ. कारण सिंह चौहान का संपादकीय ‘पेरुमाल मुरुगन : मनुष्यों और ईश्वर पर लिखना काफी खतरनाक हो गया है!’ प्रमुखता से प्रकाशित है। वहीं तमिल संस्करण में डॉ. जय शंकर बाबु छायापुरम के संपादकीय का अनुवाद ‘मिट्टी, मनुष्य और मौन के बीच : पेरुमाल मुरुगन के लेखन के मायने’ शामिल किया गया है।

पत्रिका के संपादक निर्भय देवयांश ने अपने लेख ‘जो लेखक खतरा उठाता है वही जिंदा रहता है, पेरुमाल मुरुगन इनमें से एक हैं’ के माध्यम से लेखक के साहस और साहित्यिक प्रतिबद्धता को रेखांकित किया है। इसके अतिरिक्त उमाशंकर सिंह परमार का शोधपरक लेख ‘पेरुमाल मुरुगन: साहित्य में अस्मितावाद-परम्परा, स्वीकृति और सामूहिकता की अवधारणा’ भी इस अंक का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

कण्णन सुंदरम के अंग्रेजी लेख का हिंदी अनुवाद ‘साहित्य की काँच की छत तोड़कर तमिल साहित्य के लिए खोले वैश्विक द्वार’ भी पाठकों को तमिल साहित्य की अंतरराष्ट्रीय पहचान और विस्तार से परिचित कराता है। इसके साथ ही इवल भारती एवं नाणरकाडन द्वारा पेरुमाल मुरुगन का लिया गया साक्षात्कार भी प्रकाशित किया गया है।

विशेषांक का एक और महत्वपूर्ण आकर्षण स्वयं पेरुमाल मुरुगन का लेख ‘प्रत्येक समाज अपनी पहचान-भूमि और संस्कृति को सुरक्षित रखना चाहता है’ है, जिसमें उन्होंने समाज, सांस्कृतिक पहचान और अपनी जड़ों के संरक्षण से जुड़े विचार प्रस्तुत किए हैं।

इस अंक में पेरुमाल मुरुगन के साहित्यिक व्यक्तित्व और रचनात्मक अवदान पर केंद्रित दो अन्य लेख भी शामिल हैं। इनमें ‘तमिल के वरिष्ठ लेखक, कवि एवं कथाकार पेरुमाल मुरुगन से मेरा परिचय कैसे और क्योंकर हुआ’ तथा ‘पेरुमाल मुरुगन – एक उत्कृष्ट कवि’ प्रमुख हैं। इनके अतिरिक्त उनके द्वारा अनूदित तीन कहानियां ‘नीलअक्का’, ‘बावड़ी और जल क्रीड़ा’ तथा ‘बकरी चोर’ भी प्रकाशित की गई हैं।

विशेषांक में डॉ. जय शंकर बाबु द्वारा लिया गया एक अन्य साक्षात्कार भी शामिल है, जिसका शीर्षक है ‘मुरुगन का निःसंदेह तमिल साहित्य में ही नहीं वरन विश्व साहित्य में भी विशिष्ट स्थान है’। इस साक्षात्कार के जरिए पेरुमाल मुरुगन के साहित्यिक महत्व और वैश्विक साहित्य में उनके स्थान पर विचार प्रस्तुत किए गए हैं।

इस विशेषांक के प्रकाशन को लेकर अपनी प्रसन्नता व्यक्त करते हुए लेखक ने पाठकों से इसे प्राप्त कर पढ़ने का आग्रह किया है। उनका मानना है कि इसमें प्रकाशित लेखों, साक्षात्कारों और अन्य साहित्यिक सामग्री के माध्यम से पाठकों को पेरुमाल मुरुगन के व्यक्तित्व एवं कृतित्व के कई अनछुए पहलुओं को जानने का अवसर मिलेगा।

उन्होंने बताया कि ‘लहक’ के संपादक निर्भय देवयांश लगातार उन्हें सम्मान समारोह में शामिल होने के लिए आमंत्रित करते रहे। उनकी स्वयं की भी इच्छा थी कि वे नामक्कल पहुंचकर पेरुमाल मुरुगन को व्यक्तिगत रूप से बधाई दें, लेकिन स्वास्थ्य संबंधी कारणों से ऐसा संभव नहीं हो सका।

‘लहक’ का यह विशेषांक हिंदी और तमिल साहित्य के बीच संवाद एवं आपसी साहित्यिक संबंधों को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास है।

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