उत्तर प्रदेश के उन्नाव रेप कांड: सुप्रीम कोर्ट का सख़्त संदेश, हाईकोर्ट की जमानत पर रोक 

@ लख़नऊ उत्तरप्रदेश :-

उत्तर प्रदेश का बहुचर्चित उन्नाव रेप कांड में सुप्रीम कोर्ट का ताज़ा हस्तक्षेप न केवल एक दोषी की जमानत पर रोक है, बल्कि यह न्यायिक प्रक्रिया, जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही और पीड़ितों के अधिकारों पर एक निर्णायक टिप्पणी भी है।
29 दिसंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के 15 दिसंबर के उस फैसले पर रोक लगा दी, जिसमें पूर्व भाजपा विधायक कुलदीप सिंह सेंगर को जमानत दी गई थी। सेंगर को वर्ष 2017 के उन्नाव रेप कांड में दोषी ठहराया गया है और उन्हें रेप के मामले में 10 वर्ष की सजा तथा पीड़िता के पिता की हत्या की साजिश में उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी।
दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा सजा को कम कर जमानत दिए जाने पर पीड़िता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता महमूद प्राचा ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। उन्होंने तर्क दिया कि सेंगर ने अपनी सजा पूरी नहीं की है और ऐसे गंभीर अपराध में जमानत न्याय के मूल सिद्धांतों के विरुद्ध है। सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट के आदेश को स्थगित कर दिया।
इस मामले का एक अहम कानूनी पहलू यह था कि क्या विधायक को “लोक सेवक” माना जा सकता है या नहीं। सेंगर के वकीलों ने दलील दी कि वह अब विधायक नहीं हैं, इसलिए उन्हें लोक सेवक की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को सिरे से खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि विधायक निर्वाचित जनप्रतिनिधि होते हैं और दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 21 के तहत वे लोक सेवक की श्रेणी में आते हैं। इस व्याख्या से यह भी साफ हो गया कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम और गंभीर आपराधिक मामलों में जनप्रतिनिधियों को अतिरिक्त जवाबदेही से मुक्त नहीं किया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस संजय करोल की अध्यक्षता वाली पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि हाईकोर्ट का फैसला “अनुचित” था, लेकिन उन्होंने यह कहते हुए संयम दिखाया कि जजों की मंशा पर कोई सवाल नहीं उठाया जाना चाहिए। यह टिप्पणी न्यायपालिका के भीतर संतुलन और संस्थागत सम्मान को बनाए रखने का संकेत देती है।
राजनीतिक दृष्टि से यह फैसला सत्ताधारी भाजपा के लिए असहज करने वाला माना जा रहा है। हालांकि पार्टी ने 2019 में सेंगर के खिलाफ कार्रवाई कर दी थी, लेकिन यह मामला एक बार फिर विपक्ष (सपा और कांग्रेस) के लिए सरकार पर हमला बोलने का मुद्दा बन गया है। उत्तर प्रदेश में महिला सुरक्षा और किसान जैसे संवेदनशील मुद्दों पर भाजपा की छवि पर इसका असर पड़ता दिख रहा है। कानूनी और सामाजिक दृष्टि से देखें तो सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश न्यायपालिका की स्वतंत्रता और पीड़िता-केंद्रित न्याय की मिसाल है। यह फैसला यह संदेश देता है कि रेप और पॉक्सो जैसे गंभीर मामलों में रसूख, पद या राजनीतिक हैसियत कोई ढाल नहीं बन सकती।
आगामी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों को देखते हुए, सेंगर की अपील अभी सुप्रीम कोर्ट में लंबित है, वहीं पीड़िता पक्ष की ओर से सजा बढ़ाने की मांग भी की गई है। ऐसे में यह मामला आने वाले समय में राजनीतिक बहस को और तेज़ कर सकता है। उन्नाव रेप कांड में सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला न्यायिक सक्रियता का प्रतीक है, जो यह दर्शाता है कि कानून के सामने सब बराबर हैं और पीड़ित के अधिकार सर्वोपरि हैं।

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