@ कमल उनियाल उत्तराखंड :-
उत्तराखंड की भूमी देवभूमी ही नहीं वीरभूमी भी है यहाँ के वीरो ने देश ही नहीं विदेशो में भी अपनी वीरता का लोहा मनवाया। देवभूमी उत्तराखंड ने वीरो को ही नहीं वीरागंनो को भी जन्म दिया ऐसी ही वीरांगना थी तीलू रौतेली जिसे उत्तराखंड की लक्ष्मीबाई के नाम से भी जाना जाता है। 8 अगस्त को उनका जन्मदिन मनाया जाता है इसी दिन अपने क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने वाली महिलाओं को तीलू रौतेली पुरस्कार से सम्मानित किया जाता है।

सत्रहवीं शताब्दी में वीरांगना तीलू रौतेली ने 15 साल की उम्र से लगातार 7वर्ष युद्ध लडकर 13गढो़ पर विजय पायी बाल उम्र में सात साल युद्ध लडने वाली तीलू रौतेली विश्व की एक मात्र वीरांगना थी। यह वह दौर था जब कन्तयूरों राजवंश ने जगह जगह लूटपाट करके अंशाति फैला रखी थी उन्होने खैरागढ पर आक्रमण कर अपना कब्जा कर लिया था। इस गढ़ को मुक्त कराने के लिए युद्ध में तीलू रौतेली के पिता और भाई मारे गए थे। इस घटना ने नाबालिग बच्ची को वीरांगना बनाने की नींव डाली।
तीलू रौतेली का जन्म पौड़ी जिला के गुराड़ गाँव में हुआ पर उन्का अधिकाँश जीवन कांडा मल्ला गाँव बीरोखाल में बीता। पहले तीलू रौतेली ने खैरागढ़ उसके बाद उमटागढ़ को कन्तयूरों के कुशासन से मुक्त कराया अपनी सेना के साथ सल्ट महादेव को भी मुक्त कराया।
कलिंगा खाल में शत्रुओं से घमासान युद्ध के बाद कन्तयूरों को परास्त कर अपने पिता और भाई के बलिदान का बदला लिया इस जगह उनकी घोडी बिंदुली शत्रुओ के घातक वार से घायल होकर वीरगति को प्राप्त हुयी। जिससे उन्हें बहुत दुख हुआ।

शत्रुओ को परास्त कर जब तीलू रौतेली लौट रही थी तो उन्हें प्यास लगी वह जल श्रोत में पानी पीने गयी जैसे ही वह पानी पीने को झुकी वैसे ही पराजय से छुपा दुश्मन रामू रजवार ने उन पर पीछे से हमला कर दिया। निहत्थी तीलू रौतेली पर पीछे से छुपकर किया हमला प्राणघातक साबित हुआ मरने से पहले अपनी कटार से दुश्मन को भी मार दिया था। उत्तराखंड सरकार उन्के जन्मदिन पर अपने क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने वाली महिलाओं को इस दिन तीलू रौतेली पुरस्कार से सम्मानित करती है।
