गुजरात में नीम के बीज एकत्रित कर सालाना 60 हजार रुपए तक कमा रही हैं ग्रामीण महिलाएं

@ गांधीनगर गुजरात

यूरिया के औद्योगिक या गैर-कृषि कार्यों में उपयोग को रोकने और किसानों को पर्याप्त मात्रा में यूरिया उपलब्ध कराने के उद्देश्य से प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने 15 अगस्त, 2015 को यूरिया को अनिवार्य रूप से नीम लेपित यानी नीम कोटेड करने का ऐतिहासिक निर्णय किया था। इससे पूर्व, यूरिया के औद्योगिक इस्तेमाल के कारण किसानों को सीजन के दौरान यूरिया खाद के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ती थी। इतना ही नहीं, यूरिया की कालाबाजारी भी एक बड़ी समस्या बन गई थी। यूरिया की अनिवार्य नीम कोटिंग के प्रधानमंत्री के निर्णय से आज किसानों को बड़ी राहत मिली है। मुख्यमंत्री श्री भूपेन्द्र पटेल के नेतृत्व में गुजरात में भी नीम कोटेड युरिया के उत्पादन एवं खपत पर ज़ोर दिया जा रहा है। नीम कोटेड युरिया के उत्पादन में गुजरात का हिस्सा 14% है।

देश के कुल उत्पादन में गुजरात का 14 फीसदी योगदान

गुजरात नीम कोटेड यूरिया के उत्पादन के मामले में देश का एक अग्रणी राज्य है। देश के कुल उत्पादन में गुजरात का योगदान 14 फीसदी है, जबकि खपत के मामले में गुजरात की हिस्सेदारी 9 फीसदी है। गुजरात नर्मदा वैली फर्टिलाइजर्स एंड केमिकल्स लिमिटेड (GNFC) भरूच स्थित अपने प्लांट में नीम कोटेड यूरिया का उत्पादन करता है। इसके अलावा, जीएसएफसी, इफको और कृभको भी नीम कोटेड यूरिया का उत्पादन करते हैं।

गुजरात में वर्ष 2021-22 में 37,76,000 मीट्रिक टन उत्पादन के मुकाबले 2022-23 में 38,92,000 मीट्रिक टन और 2023-24 में 39,73,000 मीट्रिक टन नीम कोटेड यूरिया का उत्पादन हुआ। नीम कोटेड यूरिया के फायदों के मद्देनजर इसकी मांग में लगातार इजाफा हो रहा है।

सालाना 60 हजार रुपए तक कमा रही हैं महिलाएं

पहले नीम के बीज व्यर्थ चले जाते थे। किसी ने सोचा न था कि जमीन पर यूं बिखरे पड़े ये बीज आगे चलकर हजारों महिलाओं के जीवन में मिठास घोलने वाले हैं। GNFC ने यूरिया को नीम लेपित करने के लिए जरूरी नीम के बीज यानी निंबोली के एकत्रीकरण के लिए एक ढांचागत व्यवस्था स्थापित की। इसके तहत सखी मंडलों और सहकारी समितियों के माध्यम से ग्रामीण महिलाएं और आवासहीन श्रमिक नीम के बीज एकत्रित करते हैं। इस कार्य के लिए राज्य में ग्रामीण स्तर पर 4000 खरीद केंद्र (ग्राम स्तरीय संग्रहण केंद्र-वीएलसीसी) स्थापित किए गए।

गुजरात में प्रोजेक्ट के शुरुआती दौर में सालाना 15,000 मीट्रिक टन निंबोली एकत्रित की जाती थी, जबकि आज यह आंकड़ा बढ़कर लगभग 50,000 मीट्रिक टन तक पहुंच गया है। प्रतिवर्ष सीजन के तीन महीनों के दौरान हर महिला लगभग 60,000 रुपए की आय अर्जित कर लेती है। इस प्रकार निंबोली एकत्रीकरण के जरिए आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ती महिलाओं के जीवन में एक बड़ा बदलाव आया है।

सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़ी महिलाओं को इस प्रोजेक्ट से काफी फायदा हुआ है। निंबोली एकत्रित करने के कार्य से उनकी आय में वृद्धि तो हुई ही है, साथ ही उनके पलायन और संपत्ति आदि गिरवी रखने जैसी समस्याओं में भी कमी आई है।

मिट्टी की सेहत में सुधार

खेतों में रासायनिक खाद के अत्यधिक इस्तेमाल से जमीन के नीचे नाइट्रोजन की एक परत बन जाती है। इसके चलते फसल मिट्टी में मौजूद पोषक तत्वों को अवशोषित नहीं कर पाती। वहीं, नीम कोटेड यूरिया से नाइट्रोजन की परत नहीं बनती, इसलिए मिट्टी का स्वास्थ्य बेहतर रहता है। इतना ही नहीं, नीम कोटेड यूरिया जमीन में मौजूद कीटकों को नष्ट करता है और मिट्टी की उर्वरा शक्ति को भी बढ़ाता है। इसके उपयोग से न केवल किसानों की कृषि लागत में कमी आती है, बल्कि फसलों की पैदावार भी बढ़ती है। नीम कोटेड यूरिया को सादे यूरिया के ऊपर नीम के तेल की परत चढ़ाकर तैयार किया जाता है।

राजस्व में वृद्धि, नए बाजार में प्रवेश

प्रधानमंत्री के विजन को साकार कर GNFC ने सफलता की एक नई इबारत लिखी है। यूरिया को नीम कोटेड करने से कंपनी को प्रथम वर्ष 20.68 करोड़ रुपए का अतिरिक्त राजस्व प्राप्त हुआ। वहीं, पिछले तीन वर्षों में राजस्व में औसतन 19.40 करोड़ रुपए प्रतिवर्ष की वृद्धि दर्ज की गई है।

निंबोली से निकले तेल की बड़े पैमाने पर उपलब्धता के चलते GNFC ने बाजार में नीम साबुन, नीम हैंड वॉश, नीम हेयर ऑयल और नीम कीटनाशक जैसे उत्पादों की एक नई श्रेणी प्रस्तुत की है। नीम के औषधीय गुणों वाले सौंदर्य प्रसाधन एवं व्यक्तिगत देखभाल उत्पाद आज शहरी उपभोक्ताओं के बीच काफी लोकप्रिय हैं।

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