@ देहरादून उत्तराखंड :-
श्री दिगम्बर जैन पंचायती मंदिर, गांधी रोड में परम पूज्य आर्यिका रत्न 105 श्री पूर्णमति माताजी के मंगल सान्निध्य में प्रातः श्री जी के अभिषेक एवं शांतिधारा के पश्चात भारतीय जैन मिलन क्षेत्र संख्या-14 की सभी 20 मिलन शाखाओं द्वारा भव्य आचार्य श्री पूजन का आयोजन श्रद्धापूर्वक किया गया। कार्यक्रम में जैन मिलन परिवार के राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय पदाधिकारियों सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने सहभागिता की। पदाधिकारियों के मार्गदर्शन में आयोजित पूजन कार्यक्रम अत्यंत भक्तिमय एवं सुंदर रहा।

विद्या समय पूर्ण वर्षायोग समिति एवं सकल दिगम्बर जैन समाज देहरादून के सैकड़ों श्रद्धालुओं ने गुरु माँ का आशीर्वाद प्राप्त कर धर्मलाभ लिया।
धर्मसभा का शुभारंभ णमोकार महामंत्र के शुद्ध उच्चारण के साथ हुआ। इस अवसर पर परम पूज्य आर्यिका रत्न 105 श्री पूर्णमति माताजी ने अपने मंगल प्रवचन में कहा कि जीवन में हमें प्राप्त मनुष्य जन्म और जैन कुल अत्यंत दुर्लभ है। इसका सदुपयोग आत्मकल्याण के लिए करना चाहिए। उन्होंने कहा कि समय निरंतर बीतता जा रहा है और प्रत्येक क्षण भूतकाल बन रहा है। हमें स्वयं से प्रश्न करना चाहिए कि हमने अपने जीवन और परिणामों में कितना परिवर्तन किया है।
गुरु माँ ने आत्मस्वरूप की ओर ध्यान आकर्षित करते हुए कहा कि शरीर नश्वर है, जबकि आत्मा अनंत गुणों से युक्त है। हमें शरीर को अपना मानने के भ्रम से निकलकर अपने शुद्ध आत्मस्वरूप को पहचानने का पुरुषार्थ करना चाहिए। उन्होंने कहा कि “मैं आत्मा हूँ, मैं आत्मा हूँ”—इस संस्कार को निरंतर अपने भीतर दृढ़ करना चाहिए। जिनशासन को कभी नहीं छोड़ना चाहिए तथा बाहरी पदार्थों के आकर्षण से अपने परिणामों को बचाते हुए अपने आत्मिक प्रकाश का अनुभव करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि जब व्यक्ति स्वयं को स्वयं समझता है तो ऐसा अपूर्व आनंद उत्पन्न होता है, जो वाणी से परे है। विचारों की भीड़ आत्मा से मिलने में बाधक बनती है। इसलिए एकत्व-विभक्त आत्मा को पहचानना और अपने शुद्ध स्वरूप में रमण करना ही जीवन का वास्तविक प्रयोजन है।

गुरु माँ ने कहा कि “देह छूटने से पहले देह-दृष्टि छोड़ देना” ही वास्तविक साधना है। मनुष्य, पशु, देव या नारकीय—सभी की देह एक दिन छूट जाती है, लेकिन जिसने देह-दृष्टि का त्याग कर आत्मदृष्टि को धारण कर लिया, उसका जीवन वास्तव में सार्थक हो जाता है। “यह शरीर मैं हूँ और ये कुटुंबजन मेरे हैं”—इस प्रकार की देह एवं पर-पदार्थ केंद्रित दृष्टि को छोड़ना ही जन्म-मरण के अभाव की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
उन्होंने पुण्य और पाप दोनों के बंधन स्वरूप को समझाते हुए कहा कि साधक को अंततः दोनों से ऊपर उठकर शुद्ध आत्मस्वरूप की अनुभूति करनी है। भोगों की चाहत मनुष्य के सुख को नष्ट करती है और तृष्णा को बढ़ाती है। इसलिए बाहरी भोगों के पीछे भागने के बजाय आत्मनिधि को पहचानने का पुरुषार्थ करना चाहिए।
गुरु माँ ने कहा कि “पर की रुचि में आपका नुकसान है और आत्मा की रुचि में आपकी मुक्ति है।” उन्होंने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि किसी के द्वारा अपशब्द कहे जाने पर तुरंत उसके प्रति उत्पन्न नकारात्मक भाव को समाप्त करने का प्रयास करें। हम ज्ञानवान हैं, आत्मस्वरूप से शक्तिशाली हैं; इसलिए विकल्पों के स्वामी बनें, विकल्पों को अपना स्वामी न बनने दें।
उन्होंने कहा कि जीवन बहुत छोटा है, इसलिए इसे आत्मकल्याण और आत्मचिंतन में लगाकर सार्थक एवं शानदार जीवन जीना चाहिए। अनंत बार जन्म लेकर हमने अनेक संबंध बनाए हैं, लेकिन अब आवश्यकता परमात्म स्वरूप की पहचान करने की है। आत्मा सदा से आत्मा ही थी, है और रहेगी; भ्रम केवल उसे शरीर मान लेने का है। इसलिए एकत्व-विभक्त आत्मा को पहचानने का पुरुषार्थ ही वर्तमान और भविष्य दोनों को सुखी बनाने वाला है।
पर्युषण पर्व की भव्य तैयारियां
कार्यक्रम की जानकारी देते हुए मीडिया कोऑर्डिनेटर मधु जैन ने बताया कि मंगलवार से प्रारंभ होने वाले पावन पर्युषण पर्व की भव्य तैयारियां चल रही हैं। आत्मबोध संस्कार शिविर में विभिन्न प्रदेशों एवं नगरों से आए लगभग 600 गुरु भक्त सहभागिता करेंगे तथा दशलक्षण पर्व के माध्यम से आत्मचिंतन, संयम एवं संस्कारों को जीवन में आत्मसात करने का प्रयास करेंगे।
उन्होंने बताया कि प्रतिदिन बाहर से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु गुरु माँ के दर्शन एवं आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए पहुंच रहे हैं। मंदिर परिसर में प्रतिदिन सामायिक, पाठशाला, महाआरती एवं शंका-समाधान सहित विभिन्न धार्मिक एवं आध्यात्मिक कार्यक्रम नियमित रूप से आयोजित किए जा रहे हैं।

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