साहित्य अकादमी ने विश्व पुस्तक मेला-2026 में कहानी पठन कार्यक्रमों का आयोजन किया

@ नई दिल्ली :-

साहित्य अकादमी ने 15 जनवरी 2026 को नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेला 2026 के दौरान हॉल नंबर 2, भारत मंडपम, नई दिल्ली में भारत की बौद्धिक परंपराओं पर एक फेस-टू-फेस कार्यक्रम और एक पैनल चर्चा का आयोजन किया।

फेस-टू-फेस कार्यक्रम में प्रख्यात मलयालम लेखक और साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता केपी रामानुन्नी ने भाग लिया और अपने साहित्यिक जीवन और कार्यों से जुड़े अनुभव साझा किए। उन्होंने बताया कि वे कोझिकोड शहर से हैं, जिसे यूनेस्को द्वारा भारत का पहला और एकमात्र साहित्य नगर घोषित किया गया है। सत्र के दौरान, उन्होंने अपनी मलयालम लघु कहानी ‘एमटीपी’ (गर्भाधान की चिकित्सा पद्धति) के कुछ अंश पढ़े, जिसका अंग्रेजी अनुवाद अबू बकर काबा ने किया है।

नाटक के रूप में लिखी गई और सात भागों में विभाजित यह कहानी, लेखक के अपने जीवन के अनुभवों से प्रेरित होकर, गर्भपात की चिकित्सा प्रक्रिया से जुड़े गहन मानवीय नाटक का चित्रण करती है। अपने साहित्यिक सफर पर विचार करते हुए, रामानुन्नी ने अपने प्रारंभिक वर्षों के बारे में बताया कि किशोरावस्था में वे एक साथ आध्यात्मिक और साम्यवादी साहित्य पढ़ रहे थे, जिससे उन्हें आंतरिक संघर्ष का सामना करना पड़ा और उन्होंने मनोचिकित्सक से परामर्श लिया। हालांकि यह उपचार निरथर्क साबित हुआ, लेकिन इस अनुभव ने उन्हें लेखन के माध्यम से सुकून और अभिव्यक्ति पाने के लिए प्रेरित किया।

फेस-टू-फेस कार्यक्रम के बाद भारत की बौद्धिक परंपराओं पर एक पैनल चर्चा हुई, जिसमें प्रो. रवैल सिंह, प्रो. हरेकृष्ण सतपथी और प्रो. बसवराज कालगुडी ने भाग लिया। रवैल सिंह ने पंजाब की बौद्धिक विरासत पर चर्चा करते हुए तक्षशिला के प्राचीन शिक्षा केंद्र से लेकर नाथ योगी, सूफीवाद और सिख धर्म तक के इतिहास का वर्णन किया।

प्रो. हरेकृष्ण सतपथी ने प्राचीन और समकालीन शिक्षा प्रणालियों की तुलना करते हुए ब्रह्मा, विष्णु और महेश को आदिगुरु बताया और वेदों का एक श्लोक सुनाया। प्रो. बसवराज कालगुडी ने परिधीय ज्ञान प्रणालियों पर बात करते हुए, उन्हें मौखिक और लिखित परंपराओं में वर्गीकृत किया और प्राचीन भारत में जनजातीय और कृषि संबंधी ज्ञान परंपराओं के महत्व पर प्रकाश डाला।

दोनों कार्यक्रमों को दर्शकों द्वारा खूब सराहा गया, जिनमें विद्यार्थी, शिक्षक, लेखक और साहित्य प्रेमी शामिल थे, और इनमें सार्थक संवाद और चर्चा देखने को मिली। साहित्य अकादमी की ओर से सहायक संपादक डॉ. संदीप कौर ने धन्यवाद प्रस्ताव दिया।

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